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ब्लॉग: लुट गए 'धन की बात' पर मोदी कब करेंगे 'मन की बात'

By Bbc Hindi
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    नरेंद्र मोदी
    EPA/JAGADEESH NV
    नरेंद्र मोदी

    पिछले पीएम चुप रहकर 'मौनमोहन' कहलाए, मौजूदा पीएम इतना बोलते हैं और इतना बढ़िया बोलते हैं फिर भी लोगों को उनसे शिकायत है कि वे सिर्फ़ अपने 'मन की बात' करते हैं, जन के मन की बात कभी नहीं करते.

    पीएम मोदी अब भी लगातार बोल रहे हैं, वे मनमोहन की तरह मौन नहीं होते. जब पूरा देश लुट गए 'धन की बात' कर रहा है, देश के प्रधानमंत्री साल-दो साल में वोटर बनने वाले बच्चों को स्टेडियम में ट्यूशन दे रहे हैं. ये ज्ञान तो उन्होंने बिल्कुल सही दिया कि 'आत्मविश्वास सबसे बड़ी चीज़ है'.

    अख़लाक़ की हत्या, गोरखपुर में बच्चों की मौत, राफ़ेल डील हो या पीएनबी घोटाला, 'नेशन वांट्स टू नो' कि मोदी जी उस मुद्दे पर क्या सोचते हैं, लेकिन ऐसे में रामकृष्ण परमहंस पर एक घंटा बोल के निकल लेना, वाक़ई आत्मविश्वास का काम है.

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    नीरव मोदी के ख़िलाफ़ प्रदशर्न
    REUTERS/Saumya Khandelwal
    नीरव मोदी के ख़िलाफ़ प्रदशर्न

    'छोटे मोदी' के 'बड़े कारनामे' पर विपक्ष की खिंचाई को नज़रअंदाज़ करके बाद बच्चों को पढ़ाने के अलावा, पीएम ने रविवार को मुंबई में कहा कि उनकी सरकार ने कामकाज की संस्कृति बदल डाली है, तुकबंदी में उनका कोई सानी नहीं है. उन्होंने कहा, "पिछली सरकार केवल लटकाना, अटकाना और भटकाना जानती थी." लेकिन उनके विरोधी लटकाना, अटकाना और भटकाना का तुक 'भगाना' से जोड़ रहे हैं.

    मोदी लोगों से ही पूछते हैं कि 'मन की बात' में उन्हें किस मुद्दे पर बोलना चाहिए. अगर जनता 'सत्य का महत्व', 'चरित्र पर चर्चा', 'सदाचार पर विचार' और 'संघर्ष से मिलने वाली सफलता' के बारे में सुनना चाहती है तो फिर ये पूछने का क्या मतलब है कि फलाँ मुद्दे पर क्यों नहीं बोले पीएम.

    अफ़सोस या सहानुभूति जताना या जिस मुद्दे पर आलोचना हो रही हो, उस पर बोलने को दोष स्वीकार करने के बराबर समझा जाना लगा है. राहुल गांधी को भी कहने का मौक़ा मिल गया है कि "प्रधानमंत्री जी बोलिए, ऐसे व्यवहार मत करिए मानो आप दोषी हों."

    लेकिन पीएम शायद इससे उलट सोचते हैं, उन्हें लगता है कि विवाद वाले मुद्दे पर बोलना दोषी होने की ओर इशारा करता है.

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    दलित छात्र रोहित वेमुला की आत्महत्या के बाद प्रदर्शन
    MANJUNATH KIRAN/AFP/Getty Images
    दलित छात्र रोहित वेमुला की आत्महत्या के बाद प्रदर्शन

    मोदी प्रधानमंत्री हैं, ज़ाहिर है कि उनके कुछ भी कहने को बहुत गंभीरता से लिया जाएगा, उनकी हर बात से देश में एक संदेश जाता है. गोरक्षकों की हिंसा, दलित छात्र रोहित वेमुला की आत्महत्या, नोटबंदी और जैसे अनेक मुद्दे हैं जिन पर पीएम मोदी बहुत देर से बोले, अपनी मर्ज़ी से बोले और खुलकर नहीं बोले.

    मोदी शायद ये भी समझने लगे हैं कि इस डिजिटल दौर में उनकी कही बातें ग़लत वक़्त पर लौट आती हैं. "न खाऊँगा, न खाने दूँगा", "मैं दिल्ली में आपका चौकीदार हूँ"... आज लौट आए हैं और सता रहे हैं.

    मोदी से बीसियों बार माँग हुई है कि वे किसी ख़ास मुद्दे पर अपनी राय ज़ाहिर करें, उन्होंने एक बार भी माँगने पर प्रतिक्रिया नहीं दी है, यही वजह है कि सत्ता में आने के बाद उन्होंने एक बार भी प्रेस कॉन्फ़्रेंस नहीं की है.

    उन्हें लगता है कि जवाब देने को दबाव में आना माना जाएगा, वैसे भी मोदी तो क्या बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर तक लड़कियों पर लाठी चलवाने के बाद भी दबाव में नहीं आते.

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    रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण
    RAKESH BAKSHI/AFP/Getty Images
    रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण

    एक और मज़ेदार बात ये है कि पीएनबी घोटाले पर रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण बोल रही हैं, जब राफ़ेल सौदे पर सवाल उठे तो वित्त मंत्री अरुण जेटली बोलने आए. ये संयोग नहीं है कि जिस मंत्री के विभाग का मामला है उसके बदले कोई और मंत्री बयान जारी करता है, यह सोच-समझकर किया गया है, ये ज़िम्मेदार मंत्री को जवाबदेही से बचाने की कोशिश ही है.

    अब तो बाबा रामदेव बोल रहे हैं कि बैंकिंग व्यवस्था को ठीक करने के लिए मोदी सबसे योग्य व्यक्ति हैं, ये वो बात है जो मोदी जी को अरुण जेटली के बारे में कहनी चाहिए थी, लेकिन न जाने क्यों नहीं कह पा रहे हैं?

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    स्कूली छात्र
    REUTERS/Jayanta Dey
    स्कूली छात्र

    वैसे तो सभी सरकारें असली मुद्दों पर चर्चा नहीं चाहतीं, लेकिन इस सरकार ने इसे ललित कला का रूप दे दिया है.

    मसलन, शिक्षा पर दुनिया के देश अपने जीडीपी का लगभग पाँच प्रतिशत ख़र्च करते हैं वहीं भारत में ये 3.3 प्रतिशत है, यह किसी से छिपा नहीं है कि सरकारी स्कूल-कॉलेजों की हालत कैसी है, प्राइवेट शिक्षण संस्थान माँ-बाप को लूट रहे हैं लेकिन सरकार इसके बारे में कभी कुछ नहीं कहती, बच्चों को आत्मविश्वास का पाठ पढ़ाने से आसान और क्या हो सकता है?

    मोदी तक बात सीमित नहीं है, ये एक राष्ट्रीय समस्या बन चुकी है, जिसे बोलना चाहिए वह नहीं बोलता, जिसे नहीं बोलना चाहिए वो बोलता है, जिस मुद्दे पर जिसे बोलना चाहिए उसके अलावा सब बोलते हैं. ताज़ा मिसाल है, राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (एनआइए) जो बता रही है कि पत्रकार को सरकारी विकास की रिपोर्टिंग करनी चाहिए, प्रेस काउंसिल आयुर्वेद के लाभ पर बोले तो ताज्जुब नहीं होना चाहिए.

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    BBC Hindi
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    English summary
    Blog When will Modi talk about money talk

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