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ब्लॉग: यूपी के 'रामभक्त' डीजी और 'सिकुलर' डीएम

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    सूर्यकुमार शुक्ला को शपथ लेते वक़्त अपनी बांह सीधे सामने फैलाने के बजाय कोहनी से तीस अंश पर मोड़ लेनी चाहिए थी. संघ के ध्वज-प्रणाम की असली विधि यही है.

    टाई-कोट में सजे धजे उत्तर प्रदेश में होमगार्ड के महानिदेशक शुक्ला जी आख़िर जल्द से जल्द राम मंदिर बनाने का संकल्प ही तो ले रहे थे. उन्होंने बाद में कहा भी- "इसमें क्या ग़लत है? मैं राम मंदिर बनाने की बात ही तो कर रहा था."

    क़िस्सा आप सब जानते ही हैं- 28 जनवरी को लखनऊ विश्वविद्यालय में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कुछ आनुषांगिक संगठनों ने एक सेमिनार करवाया, जिसका विषय था: राम मंदिर- समस्या और समाधान. पुलिस के सीनियर अफ़सर सूर्यकुमार शुक्ला को इस सेमिनार में आमंत्रित किया गया था. उन्होंने सेमिनार में शामिल लोगों के साथ ऊँची आवाज़ में संकल्प लिया कि जल्द से जल्द राम मंदिर का भव्य निर्माण करवाया जाए. जय श्रीराम !

    प्रणाम से प्रार्थना तक!

    उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ
    Getty Images
    उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ

    इस सेमिनार में आमंत्रित शुक्ला जी अगर वहाँ संघ के स्वयंसेवकों की तरह ध्वज-प्रणाम कर भी लेते तो कौन सा आसमान टूट पड़ता? भगवा वस्त्र-धारी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जब पूरे प्रदेश की हर दीवार पोतकर भगवा करवाना चाह रहे हैं तो फिर रामभक्त होने का शौर्य सिर्फ़ सूर्यकुमार शुक्ला को ही क्यों मिले? क्या ये अवसर पुलिस की वर्दी पहने दूसरे अधिकारियों और सिपाहियों को नहीं मिलना चाहिए?

    सोचिए क्या दिव्य दृश्य होगा कि हर थाने में रोज़ाना सुबह तमाम अधिकारीगण और सिपाही अपने अपने हथियार लेकर भगवा ध्वज के सामने संघ-प्रणाम की मुद्रा में खड़े हों और समवेत स्वर में संघ की प्रार्थना गाएं: नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे…. !

    शुरुआत में कुछ 'सिकुलर' मीडिया वाले लोग ऐतराज़-आलोचना करेंगे पर उनसे पलट कर सवाल किया जा सकता है कि समाज की रक्षा में लगे पुलिसकर्मी भाइयों को क्या वत्सला मातृभूमि की आराधना करने का अधिकार नहीं है? संघ की प्रार्थना में ऐसा है ही क्या कि उसे थानों, सरकारी दफ़्तरों, सीआरपीएफ़ और सेना के बैरकों में नहीं गाया जा सकता? क्या राष्ट्र की आराधना करना कोई पाप है?

    एक और सवाल पूछा जा सकता है- अगर कोई सरकारी कर्मचारी या अधिकारी हिंदुओं के समर्थन में अपनी बात रखना चाहता है तो उसे क्यों रोका जाना चाहिए? अगर वो हिंदुओं की बात भारत में नहीं करेंगे तो क्या पाकिस्तान में करेंगे?

    पर दूसरे अधिकारी भी हैं

    पर ये असली समस्या नहीं है. असली समस्या राघवेंद्र विक्रम सिंह जैसे कुछ अधिकारी हैं जिन्हें सोशल मीडिया में 'सिकुलर' नाम से जाना जाता है.

    बरेली के ज़िला मजिस्ट्रेट सिंह आज भी मुसलमानों के तुष्टीकरण जैसे पुराने और अनफ़ैशनेबल नेहरू-गाँधीवादी विचारों पर चल रहे हैं. कासगंज में हुई हिंसा पर उन्होंने लिखा - "यहाँ रह रहे मुसलमान हमारे भाई हैं. हमारी रगों में एक सा ख़ून बह रहा है. हमारा डीएनए एक है."

    ऐसा सोचने पर तो महात्मा गाँधी को नहीं बख़्शा गया, फिर राघवेंद्र विक्रम सिंह क्या चीज़ हैं!

    कौन हैं बरेली के डीएम राघवेंद्र विक्रम सिंह?

    कासगंज की फ़िज़ा में कैसे घुला 'सांप्रदायिकता' का ज़हर!

    'पार्टी प्रवक्ता की तरह'

    उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य
    Getty Images
    उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य

    ज़ाहिर है उत्तर प्रदेश के उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य को विक्रम सिंह की ये 'विकृत धर्मनिरपेक्षता' पसंद नहीं आई और उन्होंने रिपोर्टरों से कहा- "वो (राघवेंद्र विक्रम सिंह) किसी पार्टी प्रवक्ता की तरह बोलते दिख रहे हैं, जबकि सरकारी कर्मचारी कुछ नियमों से बँधे हैं."

    ठीक बात है. सरकारी कर्मचारी नियमों से बँधे हैं पर हिंदुत्व की बात करने वाले सरकारी कर्मचारी नहीं. अगर सरकारी कर्मचारी या अधिकारी होते हुए आप ध्वज-प्रणाम कर लें, संघ की प्रार्थना गा लें या राम मंदिर बनाने का संकल्प लेते हुए अंत में हिंदुत्व का नारा लगाएँ 'जय श्री राम' तो कोई सेवा-शर्तें आप पर लागू नहीं होंगी क्योंकि ये सब कहते हुए आप सदावत्सला मातृभूमि की भक्ति कर रहे होंगे और क्या अपने राष्ट्र का गौरवगान करना कोई अपराध है?

    पर अगर क़ानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए ज़िम्मेदार कोई आईएएस अधिकारी हिंदू-मुस्लिम एकता की बात करे तो उसे उपमुख्यमंत्री सेवा शर्तों की याद दिलाते हैं. क्योंकि हिंदू-मुस्लिम एकता वो लाल कपड़ा है जिसे देखकर हिंदुत्व का साँड़ खूँटा तुड़ाकर मारने दौड़ता है.

    हिंदुत्व के प्रचारक अधिकारी

    राजस्थान के आइएएस अधिकारी संजय दीक्षित को आप में से बहुत से लोग नहीं जानते होंगे पर उनके ट्विटर अकाउंट या फ़ेसबुक पन्ने पर नज़र दौड़ाइए तो समझ में आ जाएगा कि हिंदुत्व का प्रचारक अधिकारी क्या सोचता है.

    दीक्षित राजस्थान सरकार में प्रमुख सचिव के वरिष्ठ पद पर तैनात हैं. उनके ज़्यादातर ट्वीट हिंदुत्ववादी विचारधारा के पक्ष में होते हैं और वो चुन चुन कर ऐसे ट्वीट्स को री-ट्वीट करते हैं जिनमें मुसलमानों, वामपंथियों, उदारवादियों पर हमला बोला गया होता है.

    https://twitter.com/Sanjay_Dixit/status/960011093262458882

    https://twitter.com/Sanjay_Dixit/status/959959543307427840

    मैं नहीं जानता कि वसुंधराराजे सिंधिया की सरकार ने कितनी बार संजय दीक्षित को सरकारी कर्मचारियों की सेवा शर्तों की याद दिलाई होगी.

    पर राघवेंद्र विक्रम सिंह को सरकारी सेवा शर्तों के तहत जवाब तलब की धमकी दी जा सकती है क्योंकि वो हिंदू-मुस्लिम एकता की बात करने का दुस्साहस कर रहे हैं. वो भी ऐसे दौर में जब भारतीय मुसलमानों के अधिकारों की बात करने या उन्हें एक नागरिक के सभी अधिकार दिए जाने की वकालत करने को लगभग अपराध सा बना दिया गया है और इसे 'तुष्टीकरण' कहकर अस्वीकार्य कर दिया गया है.

    ख़ुद उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के शब्दों में 'तुष्टीकरण' की नीतियों के ख़िलाफ़ संदेश देने वाले और कोई नहीं बल्कि ख़ुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं.

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    BBC Hindi
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    English summary
    Blog: UPs Rambhakta DG and Sikular DM

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