ब्लॉग: बैकडेट से राजपूती शान बढ़ाने की सनक को सहलाती सरकारें
'राष्ट्रमाता पद्मावती' के सपूत मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, काँट-छाँट और फ़िल्म का नाम बदले जाने के बाद भी उसकी रिलीज़ के लिए राज़ी नहीं थे, राज्य में फ़िल्म की रिलीज़ रोकने के उनके फ़ैसले के बाद राजपूतों ने उनका 'भव्य स्वागत' किया था.
इसी तरह के भव्य स्वागत के आकांक्षी अन्य मुख्यमंत्री भी नवनियुक्त 'राष्ट्रमाता' की शरण में चले गए थे. मध्य प्रदेश के अलावा राजस्थान, हरियाणा और गुजरात के मुख्यमंत्रियों ने एक ऐसी महिला की इज़्ज़त बचाने के लिए, अपनी कुर्सी की इज़्ज़त दाँव पर लगा दी थी जिसका होना-न होना ही विवादित है.
अब जब देश की सबसे ऊँची अदालत ने घोषित कर दिया है कि इन मुख्यमंत्रियों ने जो किया था वह संविधान की भावना के विपरीत है, सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद इन मुख्यमंत्रियों की चिंता, पद्मावती की इज़्ज़त बचाने से ज़्यादा, अपनी घोषणा की इज़्ज़त बचाने की है.
इन सभी भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने अब इस मामले पर बयान देने का काम गृह मंत्रियों को दे दिया है, जो यही कहते सुनाई दे रहे हैं कि अभी उन्होंने फ़ैसला नहीं देखा है, देख-पढ़कर जवाब देंगे.
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राजपूतों की नुमाइंदगी का दावा करने वाली करणी सेना को भाजपा का समर्थन हासिल है. हिंसक बयान देने और नंगी तलवार भाँजने वाले उसके नेताओं और प्रवक्ताओं की कूद-फाँद टीवी चैनलों पर जारी है.
फ़िल्म के निर्देशक संजय लीला भंसाली की कब्र खोदने की बात करने वाले प्रवक्ता ऐसी बातें इसलिए कर पा रहे हैं कि उनके लिए सत्ता का संदेश साफ़ है-- 'उत्पात मचा लो, किसी क़ानूनी कार्रवाई की चिंता मत करो, लेकिन वोट हमें ही देना'. उनका नाम यहाँ इसलिए नहीं लिखा गया है क्योंकि उसी के लिए तो वे ये सब कर रहे हैं.
उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में जब दलितों और राजपूतों के बीच टकराव हुआ तो राज्य की सरकार ने दलित नेता चंद्रशेखर पर रासुका लगाकर और राणा प्रताप के नाम पर जुलूस निकालकर दलितों के घर फूँकने वालों से हल्के हाथों से निबटकर स्पष्ट किया कि राजपूती शान संविधान से ऊपर हो सकती है.
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कमाल ये है कि भाजपा के नेताओं ने करणी सेना की करनी और कथनी पर एक बार भी मुँह नहीं खोला है लेकिन दावा यही है कि भाजपा जातिवाद और तुष्टीकरण की राजनीति नहीं करती है, ऐसा तो सिर्फ़ दूसरी पार्टियाँ करती हैं. जहाँ तक दूसरी पार्टियों का सवाल है, उनके मुँह से भी करणी सेना को लेकर बोल नहीं फूट रहे हैं.
राजपूत, जाट, गूजर, पटेल या फिर मराठा अपनी जातीय अस्मिता के नाम पर हुडदंग मचा सकते हैं और उनके ख़िलाफ़ कोई सरकार न तो कुछ बोलेगी, न कुछ करेगी, विपक्ष भी चुप रहेगा. इससे देश में जो संदेश गया है, वो बिल्कुल स्पष्ट है--उत्पात-उन्माद कर सकते हो तो बात सुनी जाएगी, वर्ना नहीं.
हरियाणा के मुख्यमंत्री पद्मावती की इज़्ज़त बचाने के लिए ज्यादा चिंतित है, राज्य की जीती-जागती लड़कियों के बलात्कार और हत्या वे क़तई चिंतित करते नहीं दिखते. यही हाल दूसरे राज्यों का भी है, जहाँ दलितों-पिछड़ों और अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ हिंसा जारी है लेकिन कब किस मुख्यमंत्री ने उस पर कहने भर के लिए ही सही, चिंता जताई हो.
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सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला
सुप्रीम कोर्ट का ताज़ा फ़ैसला जिसे अब तक भाजपा शासित राज्यों के गृह मंत्री पढ़ नहीं पाए हैं, उसमें साफ़ लिखा है कि ये राज्य सरकारों की संवैधानिक ज़िम्मेदारी है कि केंद्रीय संस्थान फ़िल्म सेंसर बोर्ड से पारित हो चुकी फ़िल्म का प्रदर्शन निर्विघ्न सुनिश्चित करें.
क़ानून-व्यवस्था राज्य सरकारों की ज़िम्मेदारी है और वे उसका बहाना बनाकर फ़िल्म का प्रदर्शन नहीं रोक सकते, देश के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा ने मामले की सुनवाई के दौरान साफ़ शब्दों में कहा कि 'इस तरह के रवैए को जारी रहने दिया गया तो 80 प्रतिशत किताबें और फ़िल्में लोगों तक नहीं पहुँच पाएँगी'.
लेकिन इस तरह के रवैए को लगातार जारी रहने दिया गया है, आज से नहीं, शिव सेना से लेकर करणी सेना तक, ऐसे उत्पाती तत्वों को लेकर देश में पर्याप्त सहनशीलता है, यहाँ तक कि सरकारें उन्हें पुचकारती-दुलराती नज़र आती हैं. अगर शुरूआत से ही वाजिब क़ानूनी कार्रवाई की जाती तो बात यहाँ तक नहीं पहुँचने वाली थी.
'पद्मावती में असल अन्याय ख़िलजी के साथ हुआ है'
राजस्थान से राजपूतों का जो हंगामा शुरू हुआ वह बिहार के मुज़फ़्फ़रपुर तक यूँ ही नहीं पहुँचा है, दिमाग़ से मध्यकाल में जी रहे लोगों को इसमें फ़ायदा-ही-फ़ायदा दिखता है और ऐसे लोगों की भीड़ में राजनीतिक दलों को एकमुश्त वोटर दिखाई देते हैं.
वैसे राजस्थान की सरकार ने बैकडेट से महाराणा प्रताप को टेक्स्टबुक में हल्दीघाटी की लड़ाई जिताकर स्पष्ट संकेत दे दिया था कि वो ऐसे लोगों की आहत भावनाओं का विशेष ध्यान रखेगी जो हुडदंग मचा सकते हों.
कब 'रिहा' हो पाएगी भंसाली की 'पद्मावती'?
सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट आदेश के बाद करणी सेना ने फ़िल्म की रिलीज़ के दिन बंद का ऐलान कर दिया है, राजस्थान की राजपूत मुख्यमंत्री के अब तक के रवैए को देखते हुए उनसे आख़िर कितनी उम्मीद की जा सकती है कि वे क़ानून को सजातीय भावनाओं से ऊपर रखेंगी?
ऐसे बवाल देश में लगातार जारी रहेंगे क्योंकि इसकी जड़ में वो राजनीति है जो आस्था-भावना को बेझिझक क़ानून-संविधान से ऊपर रखती है, ऐसा करने वाले लोग कौन हैं, ये भी बताना पड़ेगा क्या?
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