यूपी में विपक्षी किलों को ढहाने की बीजेपी की रणनीति

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राजनीति में 'गढ़' का अपना महत्व है. आमतौर पर जब किसी एक सीट या एक क्षेत्र में कोई पार्टी या व्यक्ति लगातार सफलता हासिल करता रहता है तो उस क्षेत्र या सीट को उस पार्टी या उस व्यक्ति के गढ़ के तौर प्रचारित किया जाने लगता है.

पिछले कुछ समय से आज़मगढ़ की भी पहचान समाजवादी पार्टी के गढ़ के तौर पर की जाने लगी थी. हालांकि यहां से बीएसपी और कांग्रेस ने भी कई बार जीत हासिल कि है लेकिन बीजेपी के लिए ये सीट राजनीतिक मरुस्थल ही साबित हुई है.

14 जुलाई को जब लखनऊ से बलिया तक बनने वाले पूर्वांचल एक्सप्रेस वे के उद्घाटन के लिए आज़मगढ़ का चुनाव किया गया और शिलान्यास के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कार्यक्रम फ़ाइनल हुआ तो इसमें संदेह की गुंज़ाइश न रही कि इसके ज़रिए बीजेपी एक तीर से कई निशाने साध रही है.

एक ओर तो विकास के रूप में एक्सप्रेस वे का उद्घाटन होगा, कुछ और घोषणाएं होंगी और दूसरी ओर पिछड़े वर्गों का गढ़ समझे जाने वाले पूर्वांचल के केंद्र आज़मगढ़ में प्रधानमंत्री प्रतीकात्मक तौर से पिछड़े वर्गों को साधने की कोशिश करेंगे. ठीक उसी तरह जैसे पिछले महीने उन्होंने मगहर में किया था.

आज़मगढ़ ख़ास क्यों?

आज़मगढ़ में प्रधानमंत्री मोदी पहली बार आ रहे हैं. उनके स्वागत के लिए ज़ोरदार तैयारियां हो रही हैं. शहर से क़रीब 15 किमी. दूर मन्दूरी हवाई पट्टी के पास पिछले एक हफ़्ते से विशालकाय वॉटर प्रूफ़ टेंट के नीचे लोगों के बैठने की व्यवस्था हो रही है.

आज़मगढ़ ज़िले में दो लोकसभा सीटें आती हैं- आज़मगढ़ और लालगंज (सुरक्षित) और विधान सभा की दस सीटें. जहां तक आज़मगढ़ लोकसभा सीट का सवाल है तो 1952 से 1971 तक भले ही कांग्रेस पार्टी का यहां इकतरफ़ा कब्ज़ा रहा लेकिन उसके बाद इस सीट पर समाजवादी हावी रहे. हालांकि इस दौरान भी समाजवादी पार्टी, कांग्रेस पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के उम्मीदवार यहां से जीतते रहे लेकिन भारतीय जनता पार्टी को सिर्फ़ 2009 में ही जीत नसीब हुई.

आज़मगढ़ के पत्रकार देवव्रत श्रीवास्तव कहते हैं, "2009 में भी भारतीय जनता पार्टी अपनी वजह से नहीं बल्कि उसके उम्मीदवार रमाकांत यादव अपने दम पर जीते थे. आज़मगढ़ और आस-पास के अन्य ज़िलों में पिछड़े वर्ग के लोगों की संख्या काफी है और चुनाव में ये निर्णायक भूमिका में होते हैं.

लेकिन पिछड़े वर्गों को इतना साधने के बावजूद न तो बीजेपी 2014 का लोकसभा चुनाव यहां से जीत पाई और न ही 2017 का विधान सभा चुनाव. वहीं, इस बार तो विपक्षी गठबंधन की भी पूरी संभावना है. फिर भी मोदी और अमित शाह किस दम पर यहां ज़ोर लगा रहे हैं, समझ से परे है."

2017 के विधानसभा चुनाव में आज़मगढ़ की दस सीटों में से बीजेपी को सिर्फ़ एक सीट पर जीत हासिल हुई थी, जबकि पांच सपा के खाते में और चार बीएसपी के खाते में गईं थीं. फिर भी, आज़मगढ़ में बीजेपी के ज़िलाध्यक्ष जयनाथ सिंह को पूरा विश्वास है कि 2019 में वो इस सीट को जीत लेंगे. बीबीसी से बातचीत में वो कहते हैं, "केंद्र सरकार ने पिछले चार साल में और राज्य सरकार ने डेढ़ साल में जो काम किया है, उसके दम पर हम चुनाव जीतेंगे."

जयनाथ सिंह अपनी सरकारों के प्रदर्शन के बल पर चुनाव जीतने को लेकर आश्वस्त हैं लेकिन जिस एक्सप्रेस वे के उद्घाटन के लिए इतना भारी-भरकम आयोजन हो रहा है, समाजवादी पार्टी ने उसी पर सवाल उठा दिया है.

सपा की परेशानी

समाजवादी पार्टी को इस बात से परेशानी है कि बीजेपी की केंद्र और राज्य की सरकारें उन परियोजनाओं का दोबारा शिलान्यास कर रही है या फिर उद्घाटन कर रही है, जिन्हें उनके कार्यकाल में शुरू किया गया था. पार्टी नेताओं ने एक दिन पहले इसे लेकर आज़मगढ़ में एक सभा भी की थी. समाजवादी पार्टी के ज़िलाध्यक्ष हवलदार यादव आरोप लगाते हैं कि बीजेपी प्रतिशोध की भावना से काम कर रही है.

राजनीतिक हलकों में इस बात की भी ख़ासी चर्चा है कि एक्सप्रेस वे के उद्घाटन के लिए प्रधानमंत्री ने आज़मगढ़ को ही क्यों चुना?

ज़ाहिर है, इसके पीछे राजनीतिक निहितार्थ ढूंढ़े जा रहे हैं. आज़मगढ़ के बाद प्रधानमंत्री का कार्यक्रम वाराणसी और फिर मिर्ज़ापुर-चंदौली में भी है. मिर्ज़ापुर और चंदौली कांग्रेस के गढ़ रहे हैं. ख़ासकर, पूर्व मुख्यमंत्री कमलापति त्रिपाठी के प्रभाव वाले क्षेत्र रहे हैं.

मौजूदा लोकसभा में आज़मगढ़ का प्रतिनिधित्व समाजवादी पार्टी के नेता मुलायम सिंह यादव करते हैं. जानकारों का कहना है कि बीजेपी ठीक उसी तरह समाजवादी पार्टी के इस गढ़ पर भी प्रहार करना चाहती है जैसे वो अमेठी, रायबरेली, इटावा और चंदौली में कर रही है.

अमेठी और रायबरेली की अहमियत

अमेठी और रायबरेली में अमित शाह समेत बीजेपी के कई नेता वहां न सिर्फ़ सभाएं कर चुके हैं बल्कि वहां के तमाम पुराने कांग्रेसी नेताओं को पार्टी में भी शामिल करा चुके हैं. जबकि इटावा और आस-पास के क्षेत्रों में भी अब अमित शाह ने अपनी सक्रियता बढ़ा दी है.

आज़मगढ़ के वरिष्ठ पत्रकार अनिल मिश्र कहते हैं, "चुनाव में जीत मिले या न मिले, लेकिन बड़े नेताओं के गढ़ में ललकार कर प्रधानमंत्री आक्रामक प्रचार का संकेत तो दे ही देंगे. साथ ही, वो ये भी दिखाना चाहते हैं कि गठबंधन की संभावनाओं से वो डरे नहीं हैं, बल्कि उसकी काट, वो और उनकी पार्टी लगातार ढूंढ़ रही है. दूसरे, वो अति पिछड़े वर्गों के लिए कुछ घोषणा करके एक नया राजनीतिक कार्ड भी खेल सकते हैं. शायद इसीलिए उन्होंने आज़मगढ़ को चुना हो."

लेकिन समाजवादी पार्टी के नेता हवलदार यादव इसे 'अच्छी राजनीति' नहीं मानते.

वो कहते हैं, "इस समय बीजेपी की जो रणनीति है, वो पहले की बीजेपी से बिल्कुल अलग है. मोदी-अमित शाह के नेतृत्व वाली बीजेपी राजनीतिक विरोधियों को हराने, नुक़सान पहुंचाने और परेशान करने की राह पर चल रही है जबकि पहले राजनीति में ऐसा नहीं होता था. राजनीति में विपक्षी नेताओं की भी अहमियत थी और सत्ताधारी दल के लोग विपक्षी पार्टी के बड़े नेताओं को संसद में लाने में जान-बूझकर रोड़ा नहीं अटकाते थे. ये तो सीधे उन्हीं सीटों को टारगेट कर रहे हैं लेकिन अपने अभियान में सफल नहीं होंगे."

बहरहाल, आज़मगढ़ में प्रधानमंत्री के कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए जहां बीजेपी कार्यकर्ता पूरा ज़ोर लगा रहे हैं वहीं सुरक्षा के कड़े इंतज़ाम भी किए गए हैं. हज़ारों पुलिसकर्मियों की ड्यूटी इस काम में लगाई गई है. बावजूद इसके प्रधानमंत्री की सभा में आज़मगढ़ में विश्वविद्यालय की मांग करने वालों और शिक्षा मित्रों के विरोध को रोकना सुरक्षाकर्मियों के लिए बड़ी चुनौती होगी.

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