Election Results: असली झटका अभी बाकी है....BJP की जीत से खत्म हो सकता है इन दो कांग्रेस नेताओं का करियर
मध्यप्रदेश और राजस्थान में भाजपा सीटों के बड़े अंतर से आगे चल रही है। जबकि कांग्रेस एग्जिट पोल के अनुमानित सीटों से भी काफी पीछे है। ये तो हुई आज की बात। आपको कुछ साल पीछे ले चलते हैं। 2018, मध्यप्रदेश का विधानसभा चुनाव। बीजेपी को मिलीं 109 सीट। कांग्रेस ने 114 सीटों के साथ जीत दर्ज की। गठबंधन में सरकार बनी क्योंकि आप जानते हैं मध्यप्रदेश में 230 विधानसभा सीटें हैं और सरकार बनाने के लिए जादुई आंकड़ा 116 का है।
कांग्रेस सत्ता में आई, कमलनाथ मुख्यमंत्री बने। लेकिन सरकार के अभी 15 महीने ही पूरे हुए थे कि ज्योतिरादित्य सिंधिया 22 विधायकों के साथ कांग्रेस से जा मिले। सरकार गिर गई और बीजेपी सत्ता में आ गई। अब आते हैं साल 2023 में, विधानसभा चुनाव के प्रचार के दौरान कमलनाथ ने एक रैली में लोगों से पूछा था, "मेरा क्या कसूर था कि मेरी सरकार गिराई?" 77 साल के कमलनाथ सहानुभूति का कार्ड खेलने की कोशिश कर रहे थे। उन्होंने लोगों से भावुक होते हुए कहा कि उनकी 15 महीने की सरकार को भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने अलोकतांत्रिक तरीकों से गिराया था।

कमलनाथ ने जनता से एक और मौका मांगा था। कर्नाटक में पार्टी की जीत का फायदा लेते हुए उन्होंने सत्ता में आने पर महिलाओं को प्रति माह 1,500 रुपये और 500 रुपये में एलपीजी सिलेंडर देने की बात भी कही थी। लेकिन जनता ने उन्हें एक और मौका देने से इंकार कर दिया है। उनका प्रलोभन भी सीटों की संख्या बढ़ाने के काम नहीं आया। मध्यप्रदेश शुरू से ही बीजेपी का गढ़ रही है। एक बार फिर भाजपा यहां बड़े अंतर से जीत दर्ज करती नजर आ रही है। दूसरी ओर, राजस्थान में भी कांग्रेस की स्थिति बेहद खराब है।
मध्यप्रदेश में बीजेपी की सरकार थी लेकिन राजस्थान में कांग्रेस सत्ता में थी। पर अब दोनों ही जगह भाजपा राज करने की तैयारी में है। राजस्थान में अशोक गहलोत मुख्यमंत्री थे जबकि मध्यप्रदेश में कमलनाथ मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार थे। कमलनाथ जहां 77 साल के हो चलें हैं वहीं गहलोत की उम्र भी 72 की हो गई है। ऐसे में कांग्रेस की हार के साथ एक बड़ा सवाल ये उठता है कि क्या इस हार के साथ इन दोनों नेताओं की सियारी पारी भी खत्म हो जाएगी?
पिछली बार विधानसभा में जीत हासिल करने के बाद कमलनाथ को अपने सहयोगी ज्योतिरादित्य सिंधिया से धोखा मिला था। इस बार कमलनाथ चुनाव अभियान के अंतिम सप्ताह में अपने गढ़ छिंदवाड़ा चले गए थे। वहां से उन्होंने पूरे राज्य में अभियान चलाया था। उन्होंने हर रोज लगभग दो से तीन रैलियां कीं। जबकि मध्यप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री और बीजेपी प्रत्याशी शिवराज सिंह चौहान ने आखिरी दो हफ्तों के दौरान 165 निर्वाचन क्षेत्रों को कवर करते हुए रोजाना करीब 10 से 12 रैलियां कीं। कमलनाथ ने राज्य में बड़े स्तर पर प्रचार करने के लिए प्रियंका गांधी वाड्रा को मैदान में लाया। राहुल गांधी भी देर से चुनाव प्रचार का हिस्सा बने। हालांकि शिवराज सिंह चौहान की लोकप्रिय 'लाडली बहना' योजना के सामने सभी का जादू फेल रहा।
साल 1980 में कमलनाथ छिंदवाड़ा से सांसद थे। 2019 में वो छिंदवाड़ा की विधानसभा सीट से विधायक बनकर सीएम बने। लेकिन मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री के तौर पर कार्यकाल पूरा करने का उनका सपना अब शायद सपना ही रह जाए।
वहीं, राजस्थान में अशोक गहलोत की भी स्थिति मिलती जुलती ही है। 72 साल के गहलोत को भी उम्र का साथ नहीं मिल रहा है। वो कांग्रेस अध्यक्ष के चुनाव के वक्त चर्चाओं में आए थे, लेकिन उन्होंने मुख्यमंत्री पद पर बने रहने में ही भलाई समझी। इस विधानसभा चुनाव में उन्हें भी हार का सामना करना पड़ा है। अगला विधानसभा चुनाव अगर तय समय पर होता है तब तक उनकी उम्र 77 की हो जाएगी। वहीं, कमलनाथ तब तक 82 साल के हो जाएंगे। ऐसे में मध्यप्रदेश और राजस्थान में कांग्रेस की हार इन दोनों नेताओं के राजनीतिक करियर का आखिरी ओवर साबित हो सकती है।
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