2024 में दक्षिण भारत के 5 राज्यों पर बीजेपी का फोकस, कुल 129 में से इतनी सीटें जीतने का लक्ष्य

2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने दक्षिण भारत में भी बड़ी संख्या में सीटें जीतने का लक्ष्य तय किया है। यह सीटें कर्नाटक के अलावा होंगी, जिसके लिए कार्यकर्ताओं को विशेष ट्रेनिंग दी जा रही है।

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भारतीय जनता पार्टी ने 2019 के लोकसभा चुनावों में 303 सीटें जीती थीं। इस बार पार्टी लगातार तीसरी बार सत्ता में आने के लिए दक्षिण भारत में भी अपना दायरा बढ़ाने पर फोकस कर रही है। पार्टी एक तरफ तो कठिन सीटों को जीतने के लक्ष्य को साधने पर काम कर ही रही है, वहीं अब दक्षिण भारत के पांच में से बाकी चार राज्यों में भी ज्यादा से ज्यादा सीटें जीतने के लक्ष्य के साथ आगे बढ़ रही है। क्योंकि, कर्नाटक में पार्टी पहले से ही बेहतर प्रदर्शन कर चुकी है। इसलिए उसका फोकस कर्नाटक के आंकड़े को और सुधारने के साथ ही तमिलनाडु, केरल, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में भी ज्यादा से ज्यादा सीटें जीतने का है।

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    दक्षिण भारत के बाकी 4 राज्यों पर भी बीजेपी का फोकस

    दक्षिण भारत के बाकी 4 राज्यों पर भी बीजेपी का फोकस

    कर्नाटक में भारतीय जनता पार्टी की सरकार चल रही है। राज्य में इसी साल विधानसभा चुनाव होने हैं। कर्नाटक दक्षिण भारत का एकमात्र राज्य है, जहां बीजेपी बड़ी ताकत बन चुकी है। 2019 के लोकसभा चुनावों में बीजेपी को राज्य की 28 सीटों में से 25 पर जीत मिली थी। लेकिन, दक्षिण भारत के बाकी चार राज्यों तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और केरल में पार्टी को उम्मीदों के मुताबिक सफलता नहीं मिल पाई है। न्यूज एजेंसी एएनआई की एक रिपोर्ट के मुताबिक दक्षिण भारत में 2024 के लोकसभा चुनावों में प्रसार के लिए बीजेपी ने चुनिंदा सीटो पर मंजे हुए पार्टी कार्यकर्ताओं को अभी से तैनात करने की तैयारी शुरू कर दी है। कुछ दिन पहले ही हैदराबाद में इसके लिए कार्यकर्ताओं की खास ट्रेनिंग भी आयोजित की गई है। इस ट्रेनिंग कैंप की अहमियत का अंदाजा इसी से लग सकता है कि पार्टी के संगठन महासचिव बीएल संतोष समेत, पार्टी संगठन के दिग्गज नेताओं सुनील बंसल, तरुण चुग और विनोद तावड़े ने भी उसमें भाग लिया है।

    दक्षिण भारत में 85 से ज्यादा सीटें जीतने का लक्ष्य!

    दक्षिण भारत में 85 से ज्यादा सीटें जीतने का लक्ष्य!

    एजेंसी ने सूत्रों के हवाले से बताया है कि 'बीजेपी कार्यक्रताओं को यह ट्रेनिंग दी गई कि कैसे सरकार के काम को जनता तक पहुंचाना है। पार्टी का मुख्य फोकस तेलंगाना है, इसके बाद तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और केरल है। बीजेपी मुख्य तौर पर इन्हीं राज्यों के लिए काम करेगी, क्योंकि कर्नाटक में वह पहले से ही सरकार में है। पार्टी कर्नाटक में भी कुछ सीटों को मजबूत करेगी, लेकिन मुख्य फोकस इन्हीं चार राज्यों पर है, जहां उसने 60 सीटों की पहचान की है।' इस तरह से देखें तो कर्नाटक को मिलाकर भाजपा दक्षिण भारतीय राज्यों की कुल 129 सीटों में से 85 से ज्यादा सीटें जीतने का लक्ष्य लेकर चल रही है।

    303 से ज्यादा सीटों के लिए दक्षिण भारत अभियान!

    303 से ज्यादा सीटों के लिए दक्षिण भारत अभियान!

    पांच दक्षिणी भारतीय राज्यों में केरल में 20, आंध्र प्रदेश में 25, तमिलनाडु में 39, तेलंगाना में 17 और कर्नाटक में लोकसभा की 28 सीटें हैं। हैदराबाद में आयोजित ट्रेनिंग कैंप में बीजेपी के कार्यकर्ताओं को दक्षिण भारत की लोकसभा सीटों को मजबूत करने के लिए काम पर जुट जाने को कहा गया है, ताकि यहां से ज्यादातर सीटें जीतकर पार्टी 2024 में भी केंद्र में सरकार बना सके। सूत्रों के अनुसार, 'भाजपा का मानना है कि यदि उसे 2024 में 303 से अधिक सीटें प्राप्त करनी हैं तो दक्षिण भारत की सीटों को योजनाबद्ध तरीके से टारगेट करना होगा और अब बीजेपी ने इस पर काम करना भी शुरू कर दिया है।'

    दो महासचिवों को मिली दक्षिण की जिम्मेदारी-रिपोर्ट

    दो महासचिवों को मिली दक्षिण की जिम्मेदारी-रिपोर्ट

    दक्षिण भारत में लक्ष्य के अनुसार जीत सुनिश्चित करने के लिए पार्टी ने दो महासचिवों की नियुक्ति की है- सुनील बंसल और तरुण चुग। सूत्रों के मुताबिक, 'उत्तर प्रदेश में मोदी-योगी डबल इंजन महा विकास मॉडल देखने के लिए लोगों को तमिलनाडु, तेलंगाना,आंध्र प्रदेश से वाराणसी बुलाया जा रहा है। कुछ लोगों को गुजरात भी भेजा गया है।' उदाहरण के लिए पार्टी ने वाराणसी में काशी तमिल संगम नाम का एक कार्यक्रम आयोजित किया था। महीने भर तक चले इस कार्यक्रम में तमिलनाडु से सैकड़ों प्रतिनिधी वाराणसी पहुंचे थे।

    काशी तमिल संगम से तमिलनाडु पर फोकस!

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    तमिलों का काशी के साथ एक प्राचीन संबंध रहा है। काशी तमिल संगम का आयोजन 17 नवंबर से 16 दिसंबर के बीच एक महीने तक किया गया था। इसका मकसद काशी और तमिलनाडु के बीच के प्राचीन संबंधों को फिर से तलाशना था। यह कार्यक्रम आईआईटी मद्रास और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय की ओर से संयुक्त रूप से आयोजित किया गया था, जिससे इसके महत्त्व को भी समझा जा सकता है।

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