शत्रुघ्न की Biography: कुछ लीडर्स ने बिहार में भाजपा को हाईजेक कर लिया है

नयी दिल्ली (ब्यूरो)। एक समय के जाने-माने एक्टर और मौजूदा समय में भारतीय जनता पार्टी के सांसद (पार्टी से समय-समय पर बागी तेवर अपनाने वाले) शुत्रुघ्न सिन्हा की आत्म कथा 'एनीथिंग बट खामोश' का विमोचन बुधवार को किया गया। इस विमोचन समारोह में अपनी ही पार्टी की तरफ से बिहार चुनाव अभियान में अपनी ही अनदेखी किए जाने का दर्द शत्रुघ्न सिन्हा छुपा नहीं पाए।

Shatrughan Sinha's biography Anything but Khamosh.
उन्होंने कहा कि बिहार चुनाव में उन्हें प्रचारक नहीं बनाया गया, जिस पर कुछ लोगों ने कहा कि इसका खामियाज़ा पार्टी को भुगतना पड़ेगा और ऐसा हुआ भी। शत्रुघ्न सिन्हा ने ये बात बीजेपी के वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवाणी और यशवंत सिन्हा की मौजूदगी में कही। अपने इस आत्मकथा में शुत्रुघ्न सिन्हा ने फिल्मी करियर से लेकर राजनीतिक करियर तक की बातें खुलकर लिखी हैं। तो आईए इस आत्मकथा के कुछ खास विंदुओं पर नजर डालते हैं जिसमें शॉटगन के दिल का दर्द झलकता है।

राजेश खन्ना के खिलाफ इलेक्शन लड़ने का मलाल

अपनी किताब में शत्रुघ्न सिन्हा ने लिखा है कि मुझे एक बात का हमेशा मलाल रहेगा कि मैंने 1991 में दिल्ली में राजेश खन्ना के खिलाफ इलेक्शन लड़ा। इसके लिए उनसे मैंने माफी भी मांगी थी। उस समय ऐसा कोई कारण नहीं था कि बाइ-इलेक्शन से मैं अपना पॉलिटिकल करियर शुरू करूं। लेकिन मैंने आडवाणी जी से इसके लिए नहीं कहा था।

दिल्ली चुनाव हारने के बाद पहली बार रोया

शत्रुघ्न ने लिखा है कि ''जब मैं दिल्ली में चुनाव हारा, तब सही मायनों में निराश हुआ था। शायद पहली बार मैं रोया भी था। मैं बहुत कमजोर महसूस करता था, क्योंकि आडवाणी जी एक भी बार मेरे लिए कैंपेन करने नहीं आए।''

चुनाव हारते ही कर दिया गया साइड लाइन

बतौर शत्रुघ्न, चुनाव हारते ही मुझे साइडलाइन कर दिया गया। अशोका रोड के पार्टी ऑफिस में मुझे कोई तरजीह नहीं दी जाती थी। जब मैं वहां जाता था, तो या तो लोग मुझसे बात नहीं करते थे या टॉपिक ही बदल लेते थे। एक दिन पार्टी का एक पदाधिकारी (जो उस समय पार्टी में ही थे) मेरे पास आया और बोला, "शत्रु जी, प्लीज बाहर बैठिए। जब बात करनी होगी, हम आपको बुला लेंगे। ये बात दिल को लग गई और मैं कभी ऑफिस नहीं गया।

कुछ नेताओं ने भाजपा को हाइजेक कर लिया है

आत्मकथा 'एनीथिंग बट खामोश' में शुत्रुघ्न ने लिखा है कि बिहार में पार्टी कुछ नेताओं द्वारा हाईजैक कर ली गई। वे न तो सुनने को तैयार हैं और न बोलने को। ऐसे में अपोजिशन अपनी भूमिका कैसे निभाएगा? मैं हमेशा से कह रहा हूं कि बीजेपी ही मेरी पहली और आखिरी पार्टी है। जो एक बार दोस्त बन जाता है, वो फिर हमेशा दोस्त होता है। हम लड़ते-झगड़ते हैं, लेकिन फिर भी परिवार हैं। पार्टी और मेंबर का रिश्ता पति-पत्नी जैसा होता है।

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