लोकसभा चुनाव में यूपी और बिहार पर मोदी-शाह की विशेष नजर, जानिए कैसे OBC और पिछड़ों के वोट बैंक को साध रही BJP
लोकसभा चुनाव में महज 5 से 6 महीने शेष हैं। ऐसे में देश की तमाम राजनीतिक पार्टियां अपनी चुनावी रणनीति को अंतिम रूप देने में जुटी हुईं हैं। ऐसे में पिछले 15 सालों से केंद्र की सत्ता में काबिज भाजपा एक बार फिर से वापसी को लेकर नई तरकीब अपना रही है।
इस बार भाजपा अपने कोर वोट बैंक और पुरानी रणनीति में थोड़ा बदलाव करती हुई नजर आ रही है। इसका प्रमाण हाल ही में हुए पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में देखने को मिला।

जातीय गणना पर बीजेपी का पक्ष
देश में जहां हर तरफ जातीय गणना करवाए जाने की मांग उठ रही है। वहीं, बिहार जैसे प्रदेश में जाति आधारित गणना करवा कर आंकड़ा भी जारी कर दिया गया है। भाजपा इस मुद्दे को लेकर मौन तो जरूर है लेकिन अंदरखाने में बड़ी सियासी खिचड़ी पक रही है। जिसका कुछ-कुछ प्रमाण हाल ही में खत्म हुए विधानसभा चुनाव में देखने को मिला। आमतौर पर भाजपा को अगड़ों की पार्टी कहा जाता है। लेकिन इस बार केंद्र की सत्ता पर काबिज इस पार्टी ने अपनी इस छवि को तोड़ने की कोशिश की है। हालांकि, बिहार में हुई जाति आधारित गणना के रिजल्ट पर बीजेपी सवाल भी उठाती रही है और जातीय गणना करवाने के प्रस्ताव को पास करवाने का क्रेडिट भी लेती रही है।
पिछड़ा-अति पिछड़ा वोट बैंक को साधने की रणनीति
बीजेपी ये समझ चुकी है कि सत्ता में काबिज रहने के लिए पिछड़ा और अति पिछड़ा वोट बैंक को साधना बेहद जरुरी है। भाजपा ने इस बार तीन राज्यों में विधानसभा चुनाव जीते हैं जिसमें दो राज्यों में पिछड़ा और अति पिछड़ा समाज से आने वाले नेता को मुख्यमंत्री बनाया है। ऐसे में अब यह कहा जा रहा है कि भाजपा इस बार पिछड़ी जातियों को साथ लेकर लोकसभा चुनाव लड़ेगी। इतना ही नहीं बीजेपी की इस रणनीति से यूपी और बिहार में चुनाव जीतना काफी आसान हो सकता है। क्योंकि इन दो राज्यों में लोकसभा सीटों की संख्या काफी अधिक है।
उत्तर प्रदेश में कुल 80 लोकसभा सीट हैं, जो देश में सबसे अधिक है। उसके बाद महाराष्ट्र, बंगाल और फिर बिहार का नंबर आता है। बिहार की बात करें तो यहां 40 लोकसभा सीट है। पिछली बार भी इन सीटों पर भाजपा का वर्चस्व रहा है। उत्तर प्रदेश और बिहार में पिछड़ों और अति पिछड़ों की संख्या सबसे अधिक है। लिहाजा भाजपा यह बात अच्छी तरह समझती है कि यदि इन दोनों राज्यों में पिछड़ा वोट बैंक को अपने साथ ले आया जाए तो वापस से केंद्र की सत्ता में काबिज होने में अधिक कठिनाई नहीं होगी। ऐसे में भाजपा ने बिहार में लालू और उत्तर प्रदेश में अखिलेश फैक्टर को काटने के लिए मध्य प्रदेश में मोहन यादव को मुख्यमंत्री फेस बनाया है। ताकि उनका इस्तेमाल आगामी लोकसभा चुनाव में पिछड़ा वर्ग को साधने के लिए किया जा सके।
वहीं, छत्तीसगढ़ में विष्णु देव साय को सीएम बना कर भाजपा ने झारखंड और देश के अन्य राज्यों के अति पिछड़ा वोट बैंक को साधने की कोशिश की है। इससे पहले भी भाजपा इसी समाज से आने वाली एक महिला को राष्ट्रपति बना कर इन वोट बैंक को साध चुकी है। ऐसे में अब भाजपा ने अति पिछड़ा समाज से आने वाले नेता को मुख्यमंत्री बनाकर इस समाज पर अपना गहरा असर डालने की कोशिश की है।
इसके अलावा बात करें यदि मुस्लिम वोट बैंक कि तो भाजपा इस बार मुस्लिम वोट बैंक को अपने साथ लाने के लिए अधिक प्रयास नहीं कर रही है। लेकिन छोटे-छोटे प्रदेशों में अल्पसंख्यक चेतना रैली जैसे कार्यक्रम किए जाने की बातें कही जा रही है। हालांकि, भाजपा यह बात अच्छी तरह से जानती है कि अल्पसंख्यक समाज का जो वोट बैंक उसके पास है उसमें कोई बड़ा इजाफा नहीं होने वाला है और ना ही कोई बड़ा नुकसान होने वाला है। ऐसे में भाजपा इस वोट बैंक को लेकर अधिक रणनीति बनाती नजर नहीं आ रही है।
उधर सवर्ण समुदाय की बात करें तो सवर्ण समुदाय का वोट बैंक पहले से ही भाजपा के साथ रहा है। क्योंकि इस समुदाय को बुद्धिजीवियों में गिना जाता है और भाजपा विशेष रूप से इस समाज को तवज्जो देती रही है। भाजपा के संगठन में बड़े-बड़े और ऊंचे-ऊंचे पदों पर इस समाज के नेता काबिज है। ऐसे में भाजपा ने राजस्थान में इसी समाज से आने वाले नेता को सीएम बनाकर सवर्णों को खुशखबरी तो दी हीं है। साथ ही बिहार, उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में सवर्ण को अच्छे पदों पर बैठा कर भाजपा इस वोट पर अपना कब्जा जमाए हुए है। इसकी दूसरी बड़ी वजह यह भी है कि सवर्ण समुदाय का वोट बैंक यदि भाजपा से बिछड़ता भी है तो कांग्रेस के साथ जाता है। फिलहाल कांग्रेस में ऐसा कोई नेता या कोई ऐसी कोई रणनीति नहीं दिख रही है जिसको लेकर सवर्ण उसके साथ जाएं। लिहाजा यह वोट बैंक भाजपा के पास सुरक्षित नजर आ रहा है।
लव-कुश समीकरण पर पहले ही दाव खेल चुकी भाजपा
बिहार में पहले से ही भाजपा ने कुशवाहा समाज के नेता को तवज्जो देकर लव-कुश समिकरण को साधने की कोशिश की है। बिहार में नीतीश कुमार के सत्ता में आने में इस वोट बैंक का बड़ा रोल रहा है। ऐसे में उपेंद्र कुशवाहा को अपने पक्ष में कर के और सम्राट चौधरी को प्रदेश अध्यक्ष बना कर भाजपा पहले ही बड़ा दाव खेल चुकी है। अगर राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ की बात करें तो इन राज्यों में 2-2 उपमुख्यमंत्री बना कर भाजपा ने लगभग सभी समुदाय को खुश करने की कोशिश की है।
अब देखना यह है कि भाजपा ने जो यह चुनावी रणनीति अपनाई है उसका लोकसभा चुनाव में फायदा होता है या फिर विपक्षियों की तरफ से बनाई गई इंडी गठबंधन इस रणनीति का काट तैयार कर लेती है। 2024 में एक बार फिर भाजपा को सत्ता मिलती है या विपक्ष का साथ देकर जनता करारा झटका देती है! यह बातें भविष्य के गर्भ में छुपी हुई हैं। लोकसभा चुनाव में अभी लगभग 6 महीने बाकी हैं और इस दौरान कई राजनीतिक उथल-पुथल भी देखने को मिल सकते हैं।
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