बिंदेश्वर पाठक जिन्होंने महसूस की महिलाओं की समस्या और बना डाला सुलभ शौचालय को इंटरनेशनल ब्रांड
सुलभ इंटरनेशनल के संस्थापक बिंदेश्वर पाठक का आज 15 अगस्त को अचानक निधन हो गया। स्वतंत्रता दिवस के मौके पर उन्होंने दिल्ली में स्थित सुलभ इंटरनेशनल के केंद्रीय कार्यालय में तिरंगा फहराया, जिसके बाद उनकी तबीयत बिगड़ी और आनन-फानन में उन्हें दिल्ली एम्स अस्पताल में भर्ती करवाया गया जहां उन्हें डॉक्टरों ने मृत घोषित कर दिया।

सुलभ शौचालय को इंटरनेशनल ब्रांड बनाया
बिंदेश्वर पाठक वो शख्स हैं जिन्होंने सुलभ शौचालय को इंटरनेशनल ब्रांड बनाया और भारत ही नहीं दुनिया के कोने-कोने में सुलभ शौचालय को पॉपुलर बनाया। 2 अप्रैल 1943 को बिहार के वैशाली जिले के एक छोटे से गांव के ब्राह्मण परिवार में उनका जन्म हुआ था
नौ कमरे के घर में नहीं था एक भी शौचालय
बिंदेश्वर पाठक ने अपने एक इंटरव्यू में बताया था कि उनके घर में रहने के लिए तो नौ कमरे थे लेकिन एक भी शौचालन नहीं था। बिंदेश्वर पाठक ने बहुत कम उम्र में ये महसूस किया कि घर में शौचालय नहीं होने की वजह से उनके गांव घर की महिलाओं को सूर्योदय होने से पहले अंधेरे में ही घर से बाहर शौच के लिए खेतों में जाना पड़ता था।
महिलाओं को होने वाली समस्या को महसूस किया
खुले में शौच के कारण महिलाएं बीमार पड़ती थीं और उन्हें अन्य समस्याएं होती थीं। अपने घर और गांव की महिलाओं के इस दर्द को महसूस करते हुए इस क्षेत्र में कुछ अलग और स्वच्छता के लिए कुछ करने के लिए प्रेरित किया।
बिंदेश्वर पाठक की शिक्षा
बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से 1964 में समाज शास्त्र विषय में बिंदेश्वर पाठक ने ग्रेजुएशन किया इसके बाद 1980 में पटना विवि से मास्टर डिग्री और 1985 में पीएचडी की उपाधि हासिल की।
दलितों के सम्मान के लिए बिंदेश्वर पाठक ने किया काम
1968-69 में बिहार गांधी जन्म शताब्दी समारोह समिति में काम किया और वहां सुरक्षित और सस्ती शौचालय तकनीक डेवलेप करने की जिम्मेदारी मिली। देश में खासकर गांवों में जब छुआछूत चरम पर था तब ब्राह्मण परिवार में जन्में पीएचडी होल्डर बिंदेश्वर पाठक को दलितों के सम्मान के लिए कार्य करने और उन्हें मुख्यधारा से जोड़ने के लिए कहा गया। ये सब उनके मुश्किल था लेकिन प्रभावशाली वक्तव्यों और लेखन में ना केवल उन्होंने अपनी पहचान बनाई बल्कि स्वच्छता और स्वास्थ्य को लेकर जागरूकता फैलाने में अहम भूमिका निभाई।
परिवार की नाराजगी के बावजूद गांधी जी का सपना पूरा करने में जुटे रहे
देश को खुले में शौच मुक्त करवाने में वो जब काम कर रहे थे तब उनको अपने पिता, ससुर समेत परिवार की नाराजगी सहनी पड़ी, लेकिन वो अपने लक्ष्य से डिगे नहीं और सबको बस ये ही जवाब देते कि मुझे गांधी जी का सपना पूरा करना है।
1970 में सुलभ शौचालय वो इंटरनेशनल की शुरूआत
मैला ढोने की समस्या और खुले में शौच से देश को मुक्त करवाने के लिए उन्होंने 1970 में सुलभ शौचालय वो इंटरनेशनल की शुरूआत की जो पर्यावरण, स्वच्छता, ह्यूमन राइट्स और शिक्षा के क्षेत्र में लगातार काम कर रहा है।
6 साल की उम्र में दादी ने दी थी ये सजा
ये वो ही बिंदेश्वर पाठक थे जिन्हें उनकी दादी ने महज 6 साल की उम्र में एक मैला ढोने वाली महिला को छूने पर सजा दी थी। इन्हीं बिंदेश्वर पाठक ने महिलाओं को खुले में शौच की समस्या को समझा और उनके लिए ये सुलभ शौचालय की क्रान्ति लाई।
बिंदेश्वर पाठक ने किया था डिस्पोजल कम्पोस्ट शौचालय का अविष्कार
बिंदेश्वर पाठक ने पहले दो गड्ढे वाले फ्लश टॉयलेट डेवलेप किए। पाठक ने डिस्पोजल कम्पोस्ट शौचालय का आविष्कार किया जिसे कम खर्च पर अपने घर में ही बनाया जा सकता था। इसके बाद उन्होंने सुलभ शौचालय बनाना शुरू किया था। महिला सशक्तिकरण, स्वच्छता, स्वास्थ्य और स्वच्छता के क्षेत्र में अतुनीय योगदान के लिए पाठक को हमेशा याद किया जाता रहेगा। पद्म भूषण से सम्मानित बिंदेश्वर पाठक 2001 से वर्ल्ड टॉयलेट डे मना रहे थे और उनके ही अथक प्रयास से संयुक्त राष्ट्र ने 19 नवंबर 2013 में वर्ल्ड क्वालिटी को मान्यता प्रदान की।












Click it and Unblock the Notifications