Bihar Politics: क्यों अबकी बार एनडीए में आकर फंस गए नीतीश कुमार?
Bihar Political news today: बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के लिए अबकी बार एनडीए की पारी उतनी आसान नहीं रहने वाली। जेडीयू 2019 के लोकसभा चुनावों में बिहार में एनडीए में रहकर 17 सीटों पर लड़ा था और 16 पर चुनाव जीता था। लेकिन, इस बार नीतीश की पार्टी को उतनी ही सीटों का ऑफर मिलेगा, इसकी संभावना बहुत कम है।
अगर बीजेपी ने नीतीश को उतनी ही सीटें दे भी दीं तो भी जेडीयू की राह आसान रह पाएगी यह कहना मुश्किल है। क्योंकि, तब उसके सामने 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव वाली परिस्थितियां भी खड़ी हो सकती हैं, जब वह खिसकर तीसरे नंबर पर पहुंच गया था।

एनडीए में 2019 वाला फॉर्मूला लागू होना मुश्किल
2019 के लोकसभा चुनाव में एनडीए में तीन ही दलों ने मिलकर भाग्य आजमाया था। 40 सीटों में से बीजेपी-जेडीयू 17-17 पर लड़े थे। 6 सीटों पर पूर्व केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान की पार्टी एलजेपी को दी गई थी। इनमें भाजपा,लोजपा की स्ट्राइक रेट 100% रही थी। गठबंधन में सिर्फ जेडीयू ही एक सीट हारी थी।
लेकिन, इस बार बिहार में एनडीए गठबंधन के सामने परिस्थितियां बदल चुकी हैं। जब तक जेडीयू महागठबंधन या इंडिया अलायंस का हिस्सा था, तबतक तो एनडीए में सीटों के बंटवारे का कोई मुद्दा ही नहीं था और बीजेपी के 30 सीटों तक पर लड़ने की बातें सामने आ रही थीं।
एलजेपी के दो गुट, मांझी और कुशवाहा की दावेदारी से बदला गणित
लेकिन, जेडीयू के शामिल होने के बाद सीटों का गणित बदल चुका है। एलजेपी खुद ही दो गुटों में बंट चुकी है और चिराग पासवान की पार्टी न सिर्फ 6 सीटों पर दावा कर रही है, बल्कि हाजीपुर सीट पर भी दावा कर रही है।
जबकि, वहां से उनके चाचा पशुपति कुमार पारस सांसद हैं। अभी संयुक्त एलजेपी की 6 में से 5 सीटों पर पारस गुट का ही कब्जा है। बीजेपी ने चिराग को नीतीश को साथ लेने के लिए मनाया है तो कुछ न कुछ आश्वासन तो जरूर दिया होगा। ये वही चिराग पासवान हैं, जिनके चलते विधानसभा चुनावों में जेडीयू सिमट कर 45 सीटों पर पहुंच गई थी
जीतन राम मांझी का हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (HAM) और उपेंद्र कुशवाहा की राष्ट्रीय लोक जनता दल भी अभी बीजेपी के साथ हैं। रविवार को नीतीश कुमार की 9वीं बार के शपथग्रहण समारोह में भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा ने कुशवाहा को भी आमंत्रित किया था।
कुशवाहा अपनी पार्टी के लिए 2 लोकसभा सीटों की मांग कर रहे हैं। वहीं मांझी की पार्टी के पास विधानसभा में 4 एमएलए हैं, जिन्हें इंडिया ब्लॉक के पाले में करने के लिए कांग्रेस नेता राहुल गांधी तक की ओर से फोन किए जाने की बातें सामने आ चुकी है। अपनी डिमांड देखकर मांझी को भी उम्मीद है कि वह भी 2 से 3 सीटों पर दावेदारी जता सकते हैं।
जेडीयू को पिछली बार से कम सीटों पर करना पड़ सकता है समझौता
कुल मिलाकर अगर भाजपा ने 2019 वाला फॉर्मूला अपनाया तो सिर्फ 6 सीटों पर एलजेपी के दोनों गुटों समेत मांझी और कुशवाहा को भी एडजस्ट करना होगा, जो कि लगभग नामुमकिन है।
2020 के बाद जेडीयू का बार्गेनिंग पावर कम हुआ है
बदले हुए हालात में जेडीयू पर ही समझौता करने का दबाव बढ़ सकता है। क्योंकि, 2019 में हालात अभी से बिल्कुल अलग थे। तब बिहार में जेडीयू बीजेपी का सीनियर पार्टनर था। लेकिन, आज की तारीख में बीजेपी उससे कहीं बड़ी पार्टी है।
नीतीश के सामने अब भाजपा की बात मानने के अलावा विकल्प कम दिख रहे हैं। जबकि, इंडिया ब्लॉक में रहते हुए उनकी दावेदारी एनडीए से ज्यादा मजबूत हो सकती थी।
अबकी बार फंस गए सरकार!
क्योंकि, 2019 में राजद का एक भी उम्मीदवार नहीं जीता था और सीटिंग-गेटिंग का जितना भी फायदा मिल सकता था, वह नीतीश की पार्टी को ही मिलना तय था। क्योंकि, इंडिया ब्लॉक में अकेले कांग्रेस ही है, जो पिछली बार बिहार में एक सीट जीत पायी थी।












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