Bihar Politics: दिल्ली इलेक्शन के नतीजों में बिहार चुनाव के लिए छिपे 3 संकेत क्या हैं?
Bihar Politics: दिल्ली विधानसभा चुनावों के नतीजे न सिर्फ राष्ट्रीय राजनीति,बल्कि बिहार की सियासत के लिए भी महत्वपूर्ण संकेत दिए हैं। देश में अगला विधानसभा चुनाव बिहार में इसी साल अक्टूबर-नवंबर में होना है। इससे पहले से ही हरियाणा और महाराष्ट्र में शानदार जीत दर्ज करने और जम्मू-कश्मीर में अप्रत्याशित प्रदर्शन की वजह से बीजेपी के हौसले बुलंद रहे हैं।
लोकसभा चुनावों में जिस तरह से बीजेपी 400 पार का नारा देकर सिर्फ 240 सीटों पर सिमट गई और उसे बहुमत जुटाने के लिए एनडीए में अपनी सहयोगियों जेडीयू और टीडीपी का सहारा लेना पड़ा, उसने बीते एक दशक में उसे सबसे कमजोर स्थिति में ला दिया था। लेकिन, उसके बाद एक के बाद तीन विधानसभा चुनावों में भाजपा ने जिस तरह से विपरीत परिस्थितियों में शानदार सफलता हासिल की है, उससे बिहार चुनाव में उतरने से पहले उसका जोश हाई है।

आइए समझते हैं कि दिल्ली विधानसभा चुनाव के नतीजे बिहार विधानसभा चुनाव के लिए क्या तीन संकेत दे रहे हैं?
Bihar Politics: मोदी है तो मुमकिन...,NDA सहयोगियों के लिए संकेत भी और संदेश भी
दिल्ली के नतीजों ने बिहार चुनाव से पहले बीजेपी का मनोबल बहुत बढ़ा दिया है। ऊपर से यूपी के अयोध्या की मिल्कीपुर विधानसभा उपचुनाव में सपा से सीट छीन लेना, पार्टी के लिए सोने पे सुहागा है। क्योंकि, उत्तर प्रदेश की फैजाबाद सीट पर लोकसभा चुनाव में बीजेपी की हार ने विपक्ष को बहुत बड़ा हथियार दिया था। अयोध्या फैजाबाद संसदीय सीट में ही है।
इससे पहले मोदी सरकार पिछले दो बजट से लगातार बिहार के लिए केंद्र का खजाना खोल रही है और ऐसा करके वह पहले ही बिहार के लोगों में बड़ा संदेश दे चुकी है। ऐसे में दिल्ली के चुनाव परिणामों से इस बात पर फिर से मुहर लगी है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता अभी भी बुलंदियों पर है।
इन परिस्थितियों में बिहार के मुख्यमंत्री और जेडीयू सुप्रीमो नीतीश कुमार और एलजेपी (रामविलास पासवान) के चीफ और केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान या फिर हिंदुस्तान आवाम मोर्चा (हम) के नेता और केंद्रीय मंत्री जीतनराम मांझी के लिए भाजपा एक तरह से जीत की गारंटी नजर आ सकती है। बीच-बीच में नीतीश को लेकर पलटीमारी की खबरे आती रही हैं, लेकिन मौजूदा स्थिति में ऐसा होना मुश्किल लग रहा है।
Bihar Politics: JDU,LJP,HAM की बार्गेनिंग पावर कम हो सकती है
दिल्ली और झारखंड के नतीजे जेडीयू और एलजेपी (रामविलास पासवान) के लिए चिंता का विषय हो सकते हैं। इन चुनावों में भाजपा ने सहयोगी दलों को सीटें दीं, लेकिन वे जीत दर्ज नहीं कर सके। दिल्ली में देवली और बुराड़ी सीटों पर अगर भाजपा ने अपने उम्मीदवार उतारे होते, तो उसके जीतने की संभावना ज्यादा होती। इसी तरह, झारखंड में भी जेडीयू और एलजेपी का प्रदर्शन निराशाजनक रहा था।
दूसरी तरफ लोकसभा चुनावों के बाद हर चुनाव में बीजेपी की जीत के साथ पार्टी का प्रदर्शन बेहतर हुआ है। बिहार में पिछले दिनों हुए उपचुनावों में भी भाजपा की स्ट्राइक रेट शानदार रही थी।
ऐसे में इसका असर बिहार में सीटों के बंटवारे पर पड़ सकता है। भाजपा के साथ इन दलों की बार्गेनिंग पावर कम हो सकती है, क्योंकि उसके पास यह तर्क होगा कि जेडीयू और एलजेपी को दिए गए टिकटों का फायदा गठबंधन को नहीं हुआ। इससे एनडीए में भाजपा की स्थिति और मजबूत हो सकती है। दूसरी तरफ भाजपा का साथ छोड़ना जेडीयू, एलजेपी (रामविलास) या 'हम' के लिए अब आसान नहीं रहेगा।
Bihar Politics: आरजेडी के लिए कांग्रेस को साथ रखना मजबूरी!
दिल्ली के नतीजे यह भी संकेत देते हैं कि आरजेडी को शायद अब कांग्रेस को साथ लेकर चलना होगा। बीच में पार्टी ने कांग्रेस से दूरी बनाने के संकेत देने शुरू कर दिए थे। क्योंकि, उसे डर है कि कांग्रेस अपने जनाधार से ज्यादा सीट मांग लेती है। लेकिन, दिल्ली में आम आदमी पार्टी का हाल देखने के बाद शायद लालू यादव ऐसे फैसले लेने से परहेज करें।
क्योंकि, दिल्ली के नतीजे बताते हैं कि अगर कांग्रेस और 'आप' ने साथ मिलकर चुनाव लड़ा होता,तो शायद इंडिया ब्लॉक की सरकार बन सकती थी। लेकिन, कांग्रेस ने अलग लड़कर भले ही अपनी कोई भलाई नहीं की, केजरीवाल की लुटिया डुबोने में कोई कसर नहीं छोड़ी।
ऐसे में आरजेडी अगर कांग्रेस से अलग होकर चुनाव लड़ने का फैसला करती है, तो उसे नुकसान हो सकता है। कांग्रेस के बिना आरजेडी भी कमजोर पड़ सकती है और बीजेपी की अगुवाई वाले एनडीए को इसका सीधा फायदा मिल सकता है।












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