Bihar Election: सीटों के बंटवारे में कांग्रेस से कैसे मात खा गई RJD ? वाम दलों ने भी मारी बाजी
पटना। बिहार चुनाव में सीटों को लेकर महागठबंधन के बीच का पेंच आखिरकार सुलझ गया। शनिवार को महागठबंधन में सीटों के बंटवारे की घोषणा कर दी गई। बंटवारे के तहत राष्ट्रीय जनता दल (RJD) को 144 सीट और कांग्रेस (Congress) को 70 सीट मिली हैं। वहीं वामदलों के हिस्से में 29 सीटें आई हैं। इसके साथ ही बाल्मीकि नगर लोकसभा सीट पर हो रहे उपचुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी उतारेगी। महागठबंधन के नेताओं ने सीट बंटवारे को लेकर पटना में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर जानकारी दी। इस दौरान महागठबंधन में सभी दलों के प्रतिनिधि मौजूद रहे।

पूरी हो गई तेजस्वी की इच्छा
खास बात ये रही कि तेजस्वी की इच्छा पूरी हो गई। महागठबंधन में तेजस्वी यादव को सीएम का चेहरा मान लिया गया। प्रेस कॉन्फ्रेंस में कांग्रेस स्क्रीनिंग कमेटी के अध्यक्ष अविनाश पांडे ने इसकी घोषणा कर दी। पाण्डे ने कहा कि "कुछ वैचारिक मतभिन्नता होने के बावजूद एक महागठबंधन के रूप में एक मजबूत ताकत बनाते हुए सभी पक्षों ने एक साथ आने का निर्णय लिया है। पिछले चुनाव में भी एक महागठबंधन बना था जिसे जनता ने बहुमत दिया था लेकिन उस जनमत का अपहरण कर लिया। जिन नीतीश कुमार ने एनडीए से मुकाबला किया था कुछ समय बाद ही धोखा देकर भाजपा के साथ मिलकर सरकार बना ली। बिहार की जनता उन्हें माफ नहीं करेगी। इस बार तेजस्वी यादव के नेतृत्व में महागठबंधन चुनाव लड़ेगा।"
वहीं आरजेडी नेता तेजस्वी यादव अपने संबोधन में पीएम मोदी के डीएनए वाले बयान का जिक्र करना नहीं भूले। तेजस्वी ने कहा कि अगर बिहार की जनता हमें मौका देगी तो हम उसके सम्मान की रक्षा करेंगे। हम ठेठ बिहारी हैं जो वादा करते हैं उसको हम पूरा करते हैं। ठेठ बिहारी होने के साथ ही हमारा डीएनए भी एकदम शुद्ध है।
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प्रेस कॉन्फ्रेंस का मजा हो गया किरकिरा
ये तो हुई नेताओं की बात लेकिन इसी प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान ऐसा कुछ देखने को मिला जिसके बारे में किसी ने सोचा नहीं था। तेजस्वी यादव जिन विकासशील इंसान पार्टी (VIP) के अध्यक्ष मुकेश सहनी को बड़ा भाई बता रहे थे उनकी पार्टी के कार्यकर्ताओं ने प्रेस कॉन्फ्रेंस के बीच ही हंगामा शुरू कर दिया। खास बात ये थी कि इस दौरान मुकेश सहनी मंच पर ही बैठे थे। मामला उलझता देख जब आरजेडी के मनोज झा माइक लेकर आए तो मुकेश सहनी ने जो कहा उसने रही सही कसर भी पूरी कर दी। मुकेश सहनी ने कहा कि उनके साथ जो हुआ है वो पीठ में खंजर भोकने जैसा है। इसके साथ ही उन्होंने महागठबंधन से अलग होने का घोषणा कर दी। मजेदार बात ये रही जब मुकेश सहनी अपनी बात कह रहे थे इस दौरान पीछे से किसी की आवाज आई जिसमें ये कहते सुना जा सकता था कि इन्हें बीजेपी ने मैन्यूपुलेट किया है।

तेजस्वी की ये इच्छा पड़ी भारी
महागठबंधन में सीट बंटवारे को लेकर ये मनमुटाव नया नहीं है। पहले ही जीतनराम मांझी और उपेंद्र कुशवाहा जैसे नेता अलग हो चुके हैं। अंदरखाने मुकेश सहनी की नाराजगी की खबर चल रही थी जो सीट बंटवारे के ऐलान के साथ ही खुलकर सामने आ गई। सीट बंटवारे को लेकर खुश तो आरजेडी भी नहीं होगी। इस बार के सीट बंटवारे में लालू प्रसाद यादव की कमी जरूर खल रही होगी। तेजस्वी की सीएम कैंडीडेट की चाह पार्टी पर भारी पड़ गई। पिछली बार नीतीश भी महागठबंधन का हिस्सा थे तब आरजेडी और जेडीयू 101-101 सीटों पर बराबर लड़ी थीं। वहीं कांग्रेस को 41 सीटें दी गई थीं। तब बंटवारे पर लालू की छाप साफ नजर आई थी। वहीं इस बार RJD को 144 सीट मिली हैं। इसमें ही उसे जेएमएम और वीआईपी पार्टी को भी सीटें देनी थी। हालांकि अब वीआईपी ने महागठबंधन से अलग होने का ऐलान कर दिया है।

कांग्रेस रही है सबसे फायदे में
सीट बंटवारे में कांग्रेस ही सबसे ज्यादा फायदे में नजर आई है। महागठबंधन से HAM और RLSP के बाहर जाने का फायदा कांग्रेस को मिला है। पार्टी को इस बार 243 में 70 सीटें मिली हैं। साथ ही वाल्मीकिनगर लोकसभा सीट भी कांग्रेस के हाथ लगी है। कांग्रेस अपनी रणनीति में सफल होती दिखी है। सीट बंटवारे में हो रही देरी के पीछे कांग्रेस को ही वजह माना जा रहा था। कांग्रेस स्क्रीनिंग कमेटी के अध्यक्ष अविनाश पांडेय ने तो यहां तक कह दिया था कि सम्मानजनक सीट न मिलने पर कांग्रेस 243 सीट पर चुनाव लड़ सकती है। बयानबाजी तेज हुए तो आरजेडी नेता ने कांग्रेस पर आरजेडी की गर्दन दबाने का आरोप लगाया था लेकिन अब लगता है कि कांग्रेस वाकई आरजेडी पर दबाव बनाने में सफल हुई है। जहां 2015 में विधानसभा चुनाव में पार्टी को 41 सीटें मिली थीं इस बार 29 सीटों का सीधा फायदा हुआ है। 2015 के वोट शेयर से भी देखें तो कांग्रेस फायदे में है। कांग्रेस को 6.66 फीसदी वोट पाकर 22 सीटें मिली थीं जबकि आरजेडी ने तीन गुना ज्यादा 18.35 प्रतिशत वोट के साथ 80 सीट पर कब्जा जमाया था। आरज यहां ये बात समझने की है कि 2015 में नीतीश कुमार की जेडीयू महागठबंधन का हिस्सा थी जबकि अब नीतीश कुमार एनडीए के साथ हैं।

बाजी मार ले गए वाम दल
सीटों को लेकर चल रही खीचतान में वामदलों ने भी बाजी मार ली है। बंटवारे में वाम दलों को 29 सीटें दी गई हैं। इसमें मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (CPM) को 4 सीट, भारतीय कम्युनिष्ट पार्टी (CPI) को 6 और सीपीआई माले 19 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारेगी।
2015 में महागठबंधन ने 178 सीटों पर जीत हासिल की थी। नीतीश कुमार एक बार फिर बिहार के मुख्यमंत्री बने थे लेकिन 2 साल बाद ही आरजेडी से नाराजगी के बाद नीतीश ने अपनी राह अलग कर ली और फिर से एनडीए में शामिल हो गए थे। इस बार महागठबंधन में आरजेडी, कांग्रेस और वाम दल हैं तो एनडीए में जेडीयू, बीजेपी और लोजपा साथ हैं। यही वजह है कि अगर इस विधानसभा चुनावों के गणित को समझना है तो 2015 के विधानसभा चुनाव की जगह 2019 के लोकसभा चुनावों के आंकड़ों पर नजर दौड़ानी होगी।

लोकसभा में ये रहा था बिहार का गणित
2019 के लोक सभा चुनावों में महागठबंधन में शामिल आरजेडी, कांग्रेस और वाम दलों को मिलाकर 30 फीसदी वोट हासिल हुए तो मात्र एक सीट पर जीत हासिल हुई थी। वहीं एनडीए ने 54 फीसदी वोट पाते हुए 39 सीटों पर कब्जा जमाया था। महागठबंधन की अगुवा आरजेडी को 15.68 फीसदी वोट मिले तो कांग्रेस को 7.85 फीसदी वोट हासिल हुए थे। वहीं उपेंद्र कुशवाहा की RLSP को 3.66 फीसदी वोट मिले थे। महागठबंधन के खाते में मात्र एक सीट कांग्रेस के हिस्से आई। उधर एनडीए खेमें में नजर डालने पर पता चलता है कि बीजेपी न सिर्फ वोट शेयर बल्कि सीट के मामले में भी सबसे बड़ी पार्टी बनकर सामने आई थी। बीजेपी ने 17 सीटों पर जीत हासिल की और 24.06 प्रतिशत वोट प्राप्त किए जबकि जेडीयू ने 22.26 फीसदी वोट पाकर 16 सीटें जीतीं। वहीं लोजपा ने भी अच्छा प्रदर्शन किया था और पार्टी 8.02 फीसदी वोट पाकर 6 सीटें जीतने में सफर रही थी।












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