चौथा चरण तय करेगा बिहार का भविष्य, बीजेपी की अटकी जान

पटना(मुकुंद सिहं)। बिहार विधानसभा चुनाव के लिए अब तक हुए तीन चरणों के चुनाव में मतदान का प्रतिशत अपेक्षित लक्ष्य से कम रहा है जो इस बात का प्रमाण भी है कि मतदान को लेकर मतदाताओं में उत्साह नहीं है।

जबकि राजनीतिक परंपरा के अुनसार मत प्रतिशत में बढ़ोत्तरी तभी होती है जब जनता सत्तासीन सरकार से नाराज होती है। बिहार विधानसभा चुनाव के लिए तीन चरणों का मतदान हो चुका है। वही आंकड़ों पर नज़र डाले तो 243 विधानसभा में से 131 सीटों पर और, 39 जिलों में से 22 जिलों में मतदान हो चुका है। लगभग 55 फीसदी मतदाता अब तक अपने मतों का इस्तेमाल कर चुके हैं। आज उत्तर बिहार के सात जिलों के 55 विधानसभा क्षेत्रों में चुनाव होने हैं।

खास बात यह है कि चौथे चरण में बढ़त हासिल करने वाला गठबंधन ही बिहार का विजेता माना जायेगा।आपकोबताते चले कि इस बार के विधानसभा चुनाव में मतदान का प्रतिशत पिछले वर्ष हुए लोकसभा चुनाव में हुए मतदान प्रतिशत से कम है, जो यह भी साबित करता है कि लोगों में नरेंद्र मोदी को लेकर कोई लहर नहीं है।

संभवत: यही कारण है कि मतदाताओं के उदासीनता से बिहार चुनाव की स्थिति राजनीतिक पंडितों के साथ-साथ राजनीतिक दलों के लिए भी अबूझ पहेली बनी हुई है। बिहार में राजनीतिक समीकरण के बदलते ही प्रदेश की पूरी राजनीति ही बदल गई है। इस चुनावी दंगल में दोनों गठबंधन आयोग का दरवाजा खटखटाते नजर आ रहे हैं। आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी है।कुल मिलाकर जिस तरह पीएम मोदी ने 84 सेकेंड में नीतीश-लालू सरकार के 33 घोटाले गिना दिए और लालू ने शाह पर दंगे कराने की साजिश का आरोप लगाया, उससे साफ है कि बिहार के इस चुनावी समर चरम पर पहुंच चुका है। सोशल मीडिया से लेकर मेन स्ट्रीम मीडिया तक सभी राजनीतिक दल अपनी जीत बताने से नहीं चूक रहे हैं।

वहीं लालू प्रसाद ने भी पलटवार में मोदी को व्यापमं घोटालाा, दाल घोटाला, ललित मोदी घोटाला आदि गिना दिया और प्रधानमंत्री को घोटालों का सरदार करार दे दिया।राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो जहां पहले दो चरणों में महागठबंधन ने बढ़त बना ली थी तो तीसरे चरण में एनडीए ने वापसी के भरपूर प्रयास किया है। हालांकि यह तय तो आठ नवंबर को होगा कि उसे अपने प्रयास में कितनी सफलता मिली।

चौथे चरण में जिन 55 सीटों पर चुनाव होगा उनमें से अभी 28 सीटें बीजेपी के पास, 23 सीटें जेडीयू और मात्र एक सीट आरजेडी के पास है। इस चरण में बीजेपी की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है और इसका कारण यह है कि बीजेपी के 42 उम्मीदवार इस चरण में मैदान में हैं, जबकि आरजेडी के 26 और जेडीयू के 21 उम्मीदवार मैदान में हैं।बीजेपी की प्रतिष्ठा दांव पर होने की वजह ही है कि अब कमान आरएसएस ने ले ली है।

इसमें कोई दो राय नहीं है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ बिहार चुनाव में दो चरण के मतदान के दौरान कुछ खास भूमिका में नजर नहीं आया लेकिन दूसरे चरण के बाद मतदान के बाद अमित शाह और संघ के वरिष्ठ अधिकारियों के बीच हुई बैठक के बाद संघ ने मोर्चा संभाल लिया है। यह संघ की रणनीति का ही ही असर है कि जहां एक तरफ पीएम मोदी कहते हैं कि महागठबंधन के सत्ता में आने की स्थिति में दलितों के आरक्षण को काटकर दूसरे धर्म को दे दिया जाएगा तो दूसरी तरफ पार्टी अध्यक्ष अमित शाह कहते हैं कि बीजेपी के हारने पर पाकिस्तान में पटाखे जलेंगे।

जाहिर है चुनावी समर के आखिरी समय में इस तरह के हमले स्वभाविक हैं और इस बात की संभावना भी है कि आने वाले समय में यह हमले और भी तेज हों। संघ के मोर्चा संभालते ही बीजेपी नेताओं के साथ-साथ कार्यकतार्ओं की कार्यशैली में भी बदलाव देखा जाने लगा है। संघ के प्रभाव का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि देखते ही देखते बिहार में विवादित पोस्टरों की बाढ़ सी आ गई। एक बार इन पोस्टरों की कुछ पंक्तियों पर नजर डालते हैं- "वोटों की खेती के लिए, आतंक की फसल सींचना क्या सुशासन है?

दलितों-पिछड़ों की थाली खींच, अल्पसंख्यकों को आरक्षण परोसने का षडयंत्र क्या सुशासन है? इन पोस्टरों की अक्रामक भाषा शैली को देखते ही सहज रूप से इस बात का अंदाजा लगाया जा सकता है कि आने वाले आखिरी दिनों में किस कदर चुनावी शैली हमलावर होने वाली है।हालांकि चुनाव आयोग ने बीजेपी द्वारा जारी इन दोनों विज्ञापनों के साथ इस तरह के सभी विज्ञापनों के प्रकाशन पर रोक लगा दिया है।

चुनाव आयोग ने यह कार्रवाई आरजेडी नेताओं द्वारा दायर उस शिकायत पर की है जिसमें उन्होने 28 और 29 अक्टूबर को समाचार पत्रों में प्रकाशित इन विज्ञापनों को झूठ और भ्रामक बताया था। आयोग की तरफ से दोनों विज्ञापनों के प्रकाशन पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी गई है। गौरतलब है कि इससे पहले भी बीजेपी ने दूसरे चरण के बाद पोस्टर बदलने की कारगर रणनीति अपनाई थी। आयोग ने बेशक इन विज्ञापनों पर रोक लगा दी हो लेकिन बीजेपी की चुनावी रणनीति अब साफ है। बहरहाल बिहार में अंतिम चरण का मतदान बाकी है और अब आरएसएस ने भी यह तय कर लिया है कि मतों का आकर्षित करने के लिए हिंदुत्व की रणनीति अपनाना चाहिए।

वहीं बीजेपी ने अब बाकी समय के लिए अपनी दोहरी रणनीति पर काम करना शुरू कर दिया है। एक तरफ सीमांचल क्षेत्रों में जहां मुस्लिमों की आबादी काफी अधिक है वहां एनडीए ध्रुवीकरण के जरिए हिंदू वोटों को एकजुट करने का प्रयास करेगा तो दूसरी तरफ मिथिलांचल क्षेत्रों में एनडीए दलितों और अन्य पिछड़े वर्ग के मतदाताओं को अपने साथ जोड़ने के प्रयास में जुटी है।

वही महागठबंधन की ओर से बीजेपी के हमले का जवाब बड़े हमले से दिया जा रहा है। इसके लिए स्वयं लालू प्रसाद और नीतीश कुमार ने जमीन-आसमान एक कर दिया है। देखना दिलचस्प होगा कि बिहार की जनता अंतिम चरणों में किस खेमे को बढ़त देती है। इससे भी अधिक दिलचस्प यह है कि चौथे चरण में निर्णायक बढ़त पाने वाला गठबंधन ही पांचवें चरण में जीत की अपेक्षा रख सकता है। वैसे भी चौथे चरण में हारने वाले खेमे के लिए पांचवें चरण में सिवाय फालोआन खेलने के कोई और विकल्प नहीं होगा।

Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+