BBC SPECIAL: मोदी सरकार में कितनी बढ़ी है किसानों की मुसीबतें?

  • 30 हज़ार से ज़्यादा किसान पैदल चलकर पहुंचे मुंबई
  • सोमवार को विधानसभा का करेंगे घेराव
  • मुआवजा और कर्ज़ माफ़ी की मांग
  • वरिष्ठ पत्रकार पी साईनाथ बोले- बिना नल बंद किए ज़मीन पर पोंछा लगाती सरकार.
किसानों का आंदोलन
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किसानों का आंदोलन

महाराष्ट्र में सरकार की नाकामी को लेकर 30 हज़ार से अधिक किसान नासिक से चलकर भिवंडी होते हुए मुंबई पहुंच गए हैं.

मुआवजा और कर्ज़ माफ़ी की मांग को लेकर अखिल भारतीय किसान सभा के नेतृत्व में शुरू हुए इस मार्च के किसानों की मुंबई में विधानसभा के बाहर प्रदर्शन करने की योजना है.

किसानों के इस संकट पर बीबीसी ने वरिष्ठ पत्रकार पी साईनाथ से बात की तो उन्होंने कहा कि 2014 के बाद से किसानों की स्थिति बहुत ख़राब हो गई है.

इस बातचीत के दौरान उन्होंने यह भी कहा कि सरकारें कॉर्पोरेट्स के लिए काम कर रही हैं, किसानों के लिए नहीं.

किसान मार्च पर क्या बोले पी साईनाथ?

महाराष्ट्र के हज़ारों किसान अपनी मांगों को लेकर नासिक से मुंबई पैदल मार्च कर पहुंचे हैं. आप इस प्रदर्शन को कैसे देखते हैं?

मार्च कर पहुंचे इन किसानों पर ध्यान दें, यह विचारें कि किसानों के लिए यह कितना संकट का वक्त है, यह समझें कि जंगल की ज़मीन के अधिकार के लिए लड़ रहे आदिवासियों के सामने कितनी बड़ी समस्या है. यह सोचें कि 60 या 70 की उम्र की बहुत ग़रीब महिलाओं के लिए इस गर्मी के मौसम में नासिक से मुंबई तक पैदल चल कर आना कितना मुश्किल रहा होगा, ये पांच दिनों से अपने काम पर नहीं गए हैं. फिर भी वे डटे हुए हैं.

शुरू में इनकी संख्या 20 हज़ार के क़रीब थी और आज यह बढ़ कर 50 हज़ार से भी अधिक पहुंच गई है. मैं कहूंगा कि सरकार को इनकी आवाज़ सुननी चाहिए. ये ग्रामीण इलाकों के संकट के बारे में बता रहे हैं. हमें इनकी बात सुननी चाहिए.

क्या मोदी सरकार भी किसानों को छल रही है?

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किसानों की सबसे बड़ी मांग कर्ज़ माफ़ी को उचित तरीके से लागू करने की है. क्या कर्ज़ माफ़ी योजना का लाभ किसानों तक नहीं पहुंचा है?

सरकार ने कर्ज़ माफ़ी योजना को सही तरीके से कभी बनाया ही नहीं. इसके अमल में आने का सवाल ही नहीं है, इसके डिजाइन में खामियां हैं. इसकी दूसरी समस्या यह है कि अधिकांश कर्ज़ साहूकारों से लिए गए हैं. तो यह इस योजना के तहत कवर ही नहीं होती क्योंकि आप बैंकों से कर्ज़ को ही कवर करते हैं.

ग्रामीण बैंकिंग में बहुत ज़्यादा जटिलताएं हैं. यहां कर्ज़ पाना बहुत कठिन है. प्रणब मुखर्जी से लेकर पी चिदंबरम और अरुण जेटली तक हर वित्त मंत्री यह दावा करता रहता है कि मैंने कृषि ऋण को दोगुना तिगुना बढ़ा दिया है. यह सच है, लेकिन यह किसानों के पास नहीं जा रहा है. यह कृषि बाज़ार में जा रहा है.

महाराष्ट्र के लिए नाबार्ड की 2017 के लिए संभावित लिंक क्रेडिट प्लान में क्रेडिट आउटलेट का 53 प्रतिशत हिस्सा मुंबई और इसके उपनगरों को दिया गया था. मुंबई में कोई किसान नहीं हैं लेकिन यहां कृषि व्यवसाय हैं. तो इस तरह कृषि ऋण का बड़ा हिस्सा किसानों तक नहीं पहुंच रहा है. यदि आप छोटे किसानों के लिए कर्ज़ लेना बहुत मुश्किल बना देंगे तो वो इसे साहूकारों से ही लेंगे.

नीरव मोदी और विजय माल्या जैसे लोग बड़ा कर्ज़ लेते हैं लेकिन एक किसान को आसानी से 50 हज़ार रुपये का कर्ज़ नहीं मिल पा रहा है. इसलिए उनकी कर्ज़ माफ़ी तो ऐसी है कि हमने नल को बंद किया नहीं और जमीन पर पोंछा लगा दिया. इसलिए यह काम नहीं कर रहा है.

किसान आंदोलन: चलते-चलते पत्थर हुए पैर

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केंद्र सरकार ने पिछले बजट में न्यूनतम समर्थन मूल्य की घोषणा की थी. लेकिन अभी भी इसके सही तरीके से अमल की मांग हो रही हैं. क्या यह नई पॉलिसी किसानों की मददगार नहीं है?

न्यूनतम समर्थन मूल्य का स्वामीनाथन आयोग ने सुझाव दिया था. उत्पादन की लागत तय करने के तीन तरीके हैं. स्वामीनाथन आयोग ने सिफारिश की है कि एमएसपी को तय करते समय कीटनाशकों, बीज और उर्वरक पर खर्च, परिवार के लोगों की मजदूरी और अन्य कारकों पर विचार किया जाना चाहिए.

लेकिन सरकार के उत्पादन लागत को तय करने के तरीके में केवल बीज की कीमत, उर्वरक और कीटनाशक को शामिल किया गया है. इससे किसानों की कोई सहायता नहीं होगी, यह बस एक बहाना है.

सरकार ने किसानों की आय को दोगुनी करने की भी घोषणा की थी. लेकिन उन्होंने स्पष्ट रूप से यह नहीं कहा है आय में नाम के लिए वृद्धि होगी या वास्तव में ऐसा होगा. सरकार केवल लोगों को बेवकूफ बनाने के लिए शब्दों का इस्तेमाल कर रही है.

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क्या आपको ऐसा लगता है कि 2014 के बाद से किसानों की मुसीबत बढ़ी है?

2014 से निश्चित रूप से इसमें वृद्धि हुई है. लेकिन इसकी शुरुआत 2014 में नहीं हुई है. यह 20 सालों से चली आ रही समस्या है. लेकिन हम कह सकते हैं कि स्थिति 2014 के बाद से और ख़राब हुई है.

यह ख़राबी 2004 से पहले भी थी और 2004 के चुनावों में इसका खासा असर पड़ा था. मैं यह नहीं कह रहा हूं कि आगामी चुनाव में भी ऐसा ही होगा.

पिछले 20 सालों में कई मौके पर किसानों की समस्याएं बढ़ी हैं लेकिन 2014 के बाद तो स्थिति और भी बदतर हुई है.

भाजपा सरकार कृषि के विषय में कुछ नहीं जानती है. यह केवल किसान विरोधी होने के बारे में नहीं है, वो या उनसे पहले की सरकारें केवल इस देश के कॉर्पोरेट सेक्टर के आदेशों का पालन करती रही हैं, जो प्रभावशाली तरीके से देश को चला रहे हैं.

कुल मिलाकर अगर देखा जाए कि कॉर्पोरेट सेक्टर के लिए कौन सरकार बेहतर है तो, भाजपा इसमें बाकी सरकारों से कहीं आगे है.

किसानों का मार्च
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क्या किसानों का गुस्सा 2019 के चुनावों में असर डालेगा?

आपको लगता है कि किसानों के गुस्से का भविष्य के चुनावों पर असर पड़ेगा? चुनाव अधिक जटिल मुद्दा है. महाराष्ट्र में पिछले 20 सालों में 65 हज़ार से अधिक किसानों ने आत्महत्या की है. यह संकट बढ़ता ही जा रहा है.

देश के अधिकांश किसान संगठित नहीं हैं. महाराष्ट्र के कुछ किसान संगठित हैं लेकिन देश के कई अन्य हिस्सों में किसानों का कोई मजबूत संगठन नहीं है.

किसान आंदोलन
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2004 में आंध्र प्रदेश में, किसानों को हुई पीड़ा के कारण चंद्रबाबू नायडू हार गए थे.

कई और भी कारण हैं जो चुनावों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. जैसे जैसे चुनाव नजदीक आते जाते हैं सांप्रदायिकता का मुद्दा जोर पकड़ने लगता है. विशेष रूप से कर्नाटक में अगले कुछ महीनों में सांप्रदायिकता को लेकर बड़ी समस्या हो सकती है.

गुजरात चुनाव के तुरंत बाद भीमा कोरेगांव की घटना हुई. मेरे लिए चुनाव का इससे स्पष्ट मेल है. नतीजों के बाद भीमा कोरेगांव, राजस्थान में हत्या और अन्य अप्रिय घटनाएं हुईं.

गुजरात में चुनावी मुद्दा सामाजिक-आर्थिक से बदल कर सामाजिक-सांप्रदायिक ध्रुवीकरण में बदल गया. चीजें और भी बदतर होने जा रही हैं. चुनाव में कई और भी चीजें होती हैं. चुनाव परिणाम इस बात पर भी निर्भर करेगा कि क्या विपक्ष एकजुट होने वाला है या नहीं.

किसानों का मार्च
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किसान आज भी आत्महत्या क्यों कर रहे हैं?

सरकारों ने राष्ट्रीय बैंकों की क्रेडिट संरचना को नष्ट कर दिया है. बैंक किसानों की जगह मध्यमवर्गीय, उच्च मध्यमवर्गीय और नीरव मोदी जैसे लोगों को कर्ज़ देना पसंद कर रहे हैं.

पिछले 20 सालों में भारत में कृषि पर आधारित परिवारों की संख्या दोगुनी हो गई है. इसलिए आपसे तो कृषि ऋण को बढ़ाए जाने की उम्मीद थी. लेकिन सरकार ने उस फंड को समाज के अमीर लोगों में खास कर कॉर्पोरेट के क्षेत्र में हस्तांतरित कर दिया है.

सरकार ने कृषि को कॉर्पोरेट सेक्टर के नियंत्रण में सौंप दिया है. आज, कृषि में कॉर्पोरेट सेक्टर ही बड़ा निवेश कर रहा है. बैंक किसानों के बजाय अपना क्रेडिट कॉर्पोरेट सेक्टर को दे रहे हैं.

सरकारें कॉर्पोरेट सेक्टर के हुक्म को पूरा करने में लगी हैं और यही इस देश की आर्थिक नीति की मूलभूत समस्या है.

किसानों का मार्च
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इस संकट का हल क्या होना चाहिए?

राष्ट्रीय किसान आयोग का गठन होना चाहिए. संसज का विशेष सत्र आयोजित किया जाना चाहिए जिसमें सिर्फ कृषि संकट पर भी चर्चा की जानी चाहिए.

तीन दिन आप स्वामीनाथन आयोग पर चर्चा करें, तीन दिन क्रेडिट के मुद्दे पर. तीन दिन एमएसपी पर तो तीन दिन देश में पानी की समस्या पर. तीन दिन आप कृषि संकट के पीड़ितों को संसद में लाएं और उन्हें बोलने का मौका दें.

कृषि मजदूरों की बात सुनें न कि दिल्ली में बैठे कृषि के प्रबुद्ध मंडल की. इसके लिए लाखों किसानों को दिल्ली कूच करना होगा और उन्हें संसद के बाहर निकलना होगा.

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