तीन सरकारी बैंकों को विलय करने के पीछे ये है असल वजह
नई दिल्ली। सरकारी बैंकों को मजबूत बनाने की दिशा में अहम कदम उठाते सरकार ने तीन बैंकों के विलय की प्रक्रिया शुरू कर दी है। बैंक ऑफ बड़ौदा, देना बैंक और विजया बैंक का विलय किया जाएगा। 2017 में भारतीय स्टेट बैंक के 5 सहायक बैंकों का विलय किया गया। इसके बाद बैंक ऑफ बड़ौदा, देना बैंक और विजया बैंक का यह विलय दूसरा होगा। तीनों बैंकों को मिलाकर जो बैंक बनेगा, उसका आकार 14.82 लाख करोड़ रुपये का होगा। यह बैंक एसबीआइ तथा पीएनबी के बाद देश का तीसरा सबसे बड़ा बैंक बन जाएगा। आईए हम आपको बताते हैं कि इक विलय की सबसे अलस वजह...

बैंक के विलय की क्या है वजह:
सरकार ने बैंक ऑफ बड़ौदा, विजया बैंक और देना बैंक के विलय का फैसला लिया है। विलय के प्रस्ताव पर अब तीनों बैंकों के बोर्ड विचार करेंगे। इनके विलय से बनने वाला नया बैंक भारत का तीसरा सबसे बड़ा बैंक होगा। पिछले साल सरकार ने एसबीआई के 5 सहयोगी बैंकों का विलय कर दिया था। इसके आलाव भारतीय महिला बैंक को भी एसबीआई में विलय कर दिया गया। इसके साथ ही एसबीआई देश का शीर्ष और दुनिया के 50 सबसे बड़े बैकों के समूह में शामिल हो गया।

विलय का अधिकारिक कारण:
इन तीनों बैंकों के ताजा विलय पर सरकार का कहना है कि इससे बनने वाले नए बैंक के कस्टमर बेस, मार्केट में पहुंच और संचालन में दक्षता बढ़ेगी। इसके अलावा ग्राहकों को अच्छी सेवाएं मिलेंगी। सरकार का कहना है कि बड़े बैंकों को अर्थव्यवस्था से बड़ा लाभ होता है और वे अपनी दक्षता बढ़ाने के लिए आसानी से कॉस्ट कटिंग कर सकते हैं। दो बढ़िया काम करने वाले बैंकों के साथ तीसरे को मिलाने से एक बड़ा बैंक बनेगा, जो टिकाऊ होगा। नए बैंक की कर्ज देने की क्षमता कहीं अधिक होगी।'

विलय की असली वजह:
21 उधारदाताओं में सरकार का बहुमत हिस्सा है, जो बैकिंग संपत्ति के करीब दो तिहाई से ज्यादा है। हालांकि बैंकिंग सेक्टर के कुल नॉन परफॉर्मिंग एसेट्स (एनपीए) का करीब 90 प्रतिशत हिस्सा सरकारी बैंकों का है। बैंकिंग सेक्टर में फिलहाल 10 लाख करोड़ रुपये का एनपीए है, जिसमें 8.9 लाख करोड़ रुपये तो सरकारी बैंकों के ही हैं। एपीए संकट को देखते हुए आरबीआई कुल 21 सरकारी बैंकों में से 11 की एक आपातकालीन कार्यक्रम के तहत निगरानी कर रहा है और इन बैंकों को फिलहाल कर्ज देने से रोक दिया गया है।

विलय से क्या होगा फायदा
सरकार का कहना है कि तीनों बैंक विलय के बाद भी स्वतंत्र रूप से काम करना जारी रखेंगे और इससे किसी की जॉब नहीं जाएगी। कमजोर बैंकों के विलय से बैंकों की संख्या कम होगी वे पूंजीगत आधार पर बेहतर हो सकेंगीऔर उनकी निगरानी में आसानी हो। बैंकों का विलय फंसे हुए कर्ज की समस्या से निपटने का सर्वश्रेष्ठ अल्पकालिक उपाय है, लेकिन असली समस्या इनके प्रबंधन और कामकाज के तरीके को लेकर है। सरकारी बैंकों में सरकार का दखल स्थिति को खराब कर रही है। यही वजह है कि आज प्राइवेट बैंक कुल नए डिपॉजिट्स का करीब 70 प्रतिशत और इन्क्रिमेंटल लोन का 80 प्रतिशत हिस्सा झटकने में कामयाब हैं।












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