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Train tragedy: 'कोई सो नहीं रहा, तो किसी के नहीं थम रहे आंसू', घायल पोस्ट-ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर से पीड़ित

Balasore train tragedy: ओडिशा के बालासोर रेल हादसे में 288 यात्रियों की मौत हो गई थी। इस हादसे में बचे हुए लोगों में पोस्ट-ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर (post-traumatic stress disorder) के लक्षण देखे गए हैं।

Balasore train tragedy: ओडिशा के बालासोर रेल हादसे के पीड़ितों में पोस्ट-ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर के लक्षण देखे जा रहे हैं। हादसे में जो लोग दुर्घटना में बच गए थे और जो फिलहाल अस्पताल में इलाज करा रहे हैं, वे अभी तक विनाशकारी घटना की भयावहता से उबर नहीं पाए हैं।

बालासोर रेल हादसे में 288 यात्रियों की मौत हुई थी और एक हजार से ज्यादा लोग घायल हो गए थे। डॉक्टरों ने शनिवार (10 जून) को कहा कि बालासोर ट्रिपल ट्रेन दुर्घटना में बचे कई लोग शारीरिक चोटों से उबर रहे हैं। लेकिन कई लोग पोस्ट-ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर (post-traumatic stress disorder) से पीड़ित है।

Balasore train tragedy post-traumatic stress disorder

कटक के एससीबी मेडिकल कॉलेज और अस्पताल में भर्ती 105 में से लगभग 40 मरीजों में पोस्ट-ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर (पीटीएसडी) की प्रवृत्ति दिख रही है।

पोस्ट-ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर (पीटीएसडी) एक मेंटल हेल्थ से जुड़ी समस्या है। ये प्रतिक्रियाओं का एक समूह है जो, उन लोगों में विकसित होता है, जिन्होंने किसी हादसे का अनुभव किया हो।

क्लिनिकल साइकोलॉजी विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ जशोबंता महापात्रा ने कहा कि बालासोर रेल हादसे में बचे लोगों की मानसिक स्वास्थ्य स्थिति को देखते हुए अस्पताल ने सभी मरीजों की काउंसलिंग शुरू कर दी है। डॉ. महापात्रा ने कहा कि इस तरह की दुर्घटना का जीवित बचे लोगों के दिमाग पर गंभीर प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है।

डॉ. महापात्रा ने कहा, "कई गंभीर रूप से तनावग्रस्त और भयभीत हैं। कभी-कभी घबराए हुए और चुप पाए रहेत हैं। हम उनकी काउंसलिंग कर रहे हैं और उनके परिवार के सदस्यों के साथ बात कर रहे हैं।"

डॉ. महापात्रा ने कहा कि अस्पताल ने बचे हुए लोगों की काउंसलिंग के लिए चार टीमों का गठन किया है। हर टीम में एक मनोचिकित्सक, एक मनोवैज्ञानिक, एक सामाजिक कार्यकर्ता और रोगी के परिवार के एक या दो सदस्य शामिल हैं।

सर्जरी विभाग की एक नर्स ने कहा कि बचे हुए लोगों को अक्सर दुर्घटना के सपने आते हैं और वह घबराकर नींद से जाग जाते हैं। उन्होंने बताया कि हमें सभी रोगियों पर लगातार नजर रखने को कहा गया है।

एक 23 वर्षीय व्यक्ति, जिसके दोनों हाथ और पैर दुर्घटना में टूट गए हैं, दिन में या रात में सो नहीं पाता है। एक डॉक्टर ने कहा, "वह अपनी आंखें बंद करने से डरता है क्योंकि दुर्घटना के दृश्य उसके सामने आते हैं।"

एक अन्य युवक, जिसने अपने करीबी दोस्त को खो दिया था, अक्सर अपने दोस्त का नाम पुकारते हुए नींद से जाग जाता है। एक अन्य डॉक्टर ने कहा कि कुछ मरीज बस दीवार को लगातार घूर रहे हैं।

अस्पताल में इलाज करा रहे 105 मरीजों में से तीन के पैर पूरी तरह से टूट गए हैं, जबकि अन्य के पैर और अंग टूट गए हैं और कुछ की रीढ़ की हड्डी में चोट लगी है। एक अन्य डॉक्टर ने कहा, "ये मरीज अपनी स्थिति देखकर रोते हैं जबकि कुछ अन्य लोग बिना बात के हंस रहे हैं।''

डॉ. महापात्रा ने कहा, ''इन लक्षणों को समय के साथ ठीक किया जा सकता है। डॉ. महापात्रा ने कहा कि उन्हें पूरी उम्मीद है कि हर पीड़ित मानसिक तनाव से उबर जाएगा, जबकि कुछ अन्य संवेदनशील रोगियों को दूसरों की तुलना में कुछ ज्यादा वक्त लग सकता है। लेकिन वो भी ठीक हो जाएंगे।''

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