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Bahadur Shah Zafar: मुगल बादशाह, जिसे अंग्रेज देते थे 1 लाख रुपए पेंशन, आज कीमत 1300 करोड़

भारत में 21वीं सदी में पेंशन की उलझन का जब जिक्र होता है, तो 1857 की क्रांति के दौरान उस दौर की याद आती है, जब अंतिम मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर (Bahadur Shah Zafar) दुविधा में पड़े थे। दरअसल, उस वक्त मुगल बादशाह को अंग्रेजों से मिलने वाली 1 लाख रुपए की पेंशन खटाई में पड़ने की टेंशन थी। दूसरी ओर भारतीय सिपाही अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह में बादशाह को अपना लीडर बनाने वाले थे। ऐसे में बिटिश अधिकारियों को बहादुर शाह जफर की ओर लिखे कुछ पत्रों में ये बात स्पष्ट होती है।

ब्रिटिश 1857 तक पूरे भारत पर कब्जा जमा चुके थे। ऐसे में भारत में उनके खिलाफ जबर्दस्त विरोध की लहर का उदय हुआ। ब्रिटिशों के आक्रमण से तिलमिलाए विद्रोही सैनिक और राजा-महाराजाओं को एक केंद्रीय नेतृत्व की जरूरत थी, जो उन्हें बहादुर शाह जफर में दिखा. बहादुर शाह जफर ने भी ब्रिटिशों के खिलाफ लड़ाई में नेतृत्व स्वीकार तो कर लिया लेकिन 82 वर्ष के बूढ़े शाह जफर अंततः जंग हार गए। जिसके बाद बाकी बचे दिन वे अंग्रेजों की कैद में रहे।

Bahadur Shah Zafar

82 साल की उम्र में मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर के लिए उस वक्त दुविधा और बढ़ गई जब भारतीय सिपाही विद्रोह का झंडा फहराते हुए लाल किले में घुस गए। सिपाही चाहते थे कि ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ उनकी लड़ाई का नायक बहादुर शाह जफर हो।

उस वक्त बहादुर शाह जफर की हुकूमत सिर्फ लाल किले की दीवारों तक ही थी। लेकिन भारतीय सिपाहियों का साथ मिलते ही ताकत दुगनी हो गई और उन्होंने अंग्रेजों को उखाड़ फेंकने का संकल्प लिया। हालांकि इन सबके बीच उन्हें अपनी पेंशन की चिंता सताती रही। उस वक्त उनकी पेंशन 1 लाख रुपए थे, जो कि आज की मुद्रास्फीति के हिसाब से देखा जाए तो 1,300 करोड़ रुपए हो जाएगी।

चार महीनों में जब सिपाहियों ने लाल किले में डेरा डाला और अपने अभियान की योजना बनाई, बहादुर शाह जफर ने अपना चैनल खुला रखते हुए, ब्रिटिश अधिकारियों को कई पत्र भेजे। अधिकांश पत्र सम्राट द्वारा निर्देशित होते थे और उनके चिकित्सक हकीम अहसानुल्लाह खान और मुख्य प्रशासक अहसानुल्लाह खान द्वारा लिखे जाते थे। ऐसे ही एक पत्र में शाह जफर ने भारतीय सिपाहियों के खिलाफ साजिश रचते हुए एक ब्रिटिश अधिकारी से कहा कि वह लाल किले के निजी दरवाजे ब्रिटिश सैनिकों के लिए खुलवा देंगे।

दरअसल, बहादुर शाह जफर ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के संरक्षक थे और वे एक लाख रुपये की मासिक पेंशन पर निर्भर थे। इससे पहले उनके पूर्वज शाह आलम को 26 लाख रुपये प्रतिमाह पेंशन मिलती थी।

बता दें कि पुरानी पेंशन स्कीम के कई राज्यों में लागू होने के बाद केंद्र सरकार ने यूपीएस यानी यूनीफाइड पेंशन स्कीम लागू की है। इसे केंद्रीय सरकारी कर्मचारियों के लिए 1 अप्रैल 2025 से लागू किया जाएगा। योजना का उद्देश्य सरकारी कर्मचारियों को सेवा की अवधि और अंतिम आहरित वेतन के आधार पर स्थिर पेंशन प्रदान करना है।

यूपीएस के जरिए केंद्रीय कर्मचारियों को न्यूनतम 10 वर्षों की सेवा के बाद ₹10,000 प्रति माह की पेंशन की गारंटी दी गई है। इस स्कीम को टी. वी. सोमनाथन समिति (2023) की सिफारिशों के बाद लाया गया है। केंद्र की इस पेंशन स्की को लागू करने वाला महाराष्ट्र पहला राज्य बन चुका है।

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