अयोध्या केस: जानिए, सुप्रीम कोर्ट के आदेश से पहले मध्यस्थता की कोशिशों का क्या हुआ?
नई दिल्ली- अयोध्या विवाद में इलाहाबाद हाईकोर्ट के ऐतिहासक आदेश पर रोक लगाने के करीब 9 साल बाद सुप्रीम कोर्ट ने इस विवाद को मध्यस्थता के जरिए सुलझाने की सीधी पहल की है। इससे पहले भी इस तरह की कई कोशिशें हो चुकी हैं, जिसमें अदालतें और भारत के मुख्य न्यायाधीश तक शामिल रहे हैं। लेकिन, ऐसा पहली बार हुआ है कि इस विवाद को बातचीत के माध्यम से सुलझाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने आदेश जारी किया है। सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली खंडपीठ के सदस्य जस्टिस एस ए बोबडे ने कहा है कि, "हम मध्यस्थता के प्रयास के बारे में गंभीरता से सोच रहे हैं, क्योंकि यह विवाद किसी व्यक्ति की निजी संपत्ति से जुड़ा नहीं है। अगर सौहार्दपूर्ण समाधान की एक प्रतिशत भी संभावना है, तो इसका प्रयास होना चाहिए।"

हाईकोर्ट से मध्यस्थता का प्रयास
इस विवाद को मध्यस्थता के जरिए सुलझाने का प्रयास इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच भी कर चुका है। जब 3 अगस्त, 2010 को इस विवाद में तीन हाईकोर्ट के 3 सदस्यीय बेंच ने सुनवाई पूरी कर ली थी,तब उन्होंने सभी पक्षों के वकीलों को बुलाकर पूछा था कि क्या वे आपसी बातचीत से अभी भी मामले का हल निकालना चाहते हैं? लेकिन, ये कोशिशें तत्काल धाराशाही हो गईं। क्योंकि 'हिंदू पक्ष' ने कोर्ट के इस प्रस्ताव को मानने से साफ इनकार कर दिया। बाद में हाईकोर्ट के फैसले से ठीक पहले यानी सितंबर,2010 में अदालत के निर्णय को इस आधार पर टालने की गुजारिश गई कि मध्यस्थता की एक ओर कोशिश हो रही है। तब रिटायर्ड अधिकारी रमेश चंद्र त्रिपाठी ने हाईकोर्ट में मध्यस्थता की अपील दायर की थी, लेकिन हाईकोर्ट की बेंच ने 2 एक 1 के बहुमत से उस अपील को खारिज कर दिया।

पूर्व चीफ जस्टिस जे एस खेहर का प्रयास
सुप्रीम कोर्ट ने 2017 में अयोध्या विवाद को 'भावनात्मक और धार्मिक' मसला बताते हुए सुझाव दिया था कि इसको सुलझाने का सबसे अच्छा तरीका ये है कि इसका हल बातचीत के जरिए ही निकाला जाए। 21 मार्च, 2017 को तत्कालीन चीफ जस्टिस जे एस खेहर ने कहा था,कि 'दोनों पक्ष थोड़ा देकर,थोड़ा लेकर इसको सुलझा लें। ऐसे मामले आपसी बातचीत के माध्यम से ही ठीक से सुलझाए जा सकते हैं। कोर्ट को इसमें तभी पड़ना चाहिए, जब इसका बातचीत से कोई हल न निकले। अगर दोनों पक्ष चाहते हैं कि बातचीत के लिए दोनों पक्ष से चुने गए मध्यस्थो के साथ मैं भी बैठूं, तो मुझे यह स्वीकार है। अगर आप मुझसे चाहते हैं, तो मैं तैयार हूं। अगर नहीं चाहते, तो मैं नहीं रहूंगा। अगर मेरे सहयोगी जजों का बिठाना चाहते हैं, तो उन्हें बिठाइए। लेकिन, पहले एक-दूसरे के साथ बैठकर इसे सुलझाने की कोशिश कीजिए। क्योंकि, यह भावनात्मक मुद्दा है। और अगर आप चाहते हैं कि कोई प्रिंसिपल मिडियेटर हो, तो हम उसकी व्यस्था कर सकते हैं। ' जस्टिस खेहर ने बीजेपी सांसद सुब्रमण्यम स्वामी की ओर से मामले की सुवाई जल्द किए जाने की मांग पर यह पेशकश की थी। लेकिन, पूर्व मुख्य न्यायाधीश का यह प्रस्ताव औपचारिक शक्ल नहीं ले पाया और आखिरकार बात धरी की धरी रह गई।

विवादित ढांचा ढहने से पहले मध्यस्थता का प्रयास
1992 में विवादित ढांचा गिराए जाने से पहले भी बातचीत के माध्यम से विवाद का हल निकालने के लिए गंभीर प्रयास किए गए थे। वीएचपी और ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के बीच अनौपचारिक बातचीत कराए जा रहे थे। इस कार्य में कम से कम दो प्रधानमंत्री भी शामिल थे। खासकर चंद्रशेकर और पी वी नरसिम्हा राव। लेकिन, ढांचा गिरने के साथ ही सारी कोशिशें भा धाराशायी हो गईं। 2003 में अटल बिहारी वाजपेयी ने विवाद को सुलझाने के लिए अपने दफ्तर में अयोध्या सेल भी बनाया, लेकिन उसका भी वही अंजाम हुआ। खबरों के मुताबिक 2014 में अयोध्या विवाद में एक मुख्य पक्षकार मोहम्मद हाशिम अंसारी ने भी इसे बातचीत के जरिए सुलझाने की कोशिशें शुरू की थीं, लेकिन बात आगे नहीं बढ़ी।
इसलिए अयोध्या विवाद में मध्यस्थता की कोशिश पहली बार नहीं हो रही हैं, लेकिन पहले के प्रयासों से इसबार सबसे बड़ा अंतर ये है कि इसमें सुप्रीम कोर्ट सीधे तौर पर शामिल है। इसलिए इस मध्यस्थता की गंभीरता बढ़ गई है। लेकिन, क्या सुप्रीम कोर्ट के इस प्रयास से दशकों पुराने इस विवाद का हल निकल जाएगा, ये कहना अभी बहुत ही जल्दबाजी होगी, खासकर तब जब इस मामले से जुड़े ज्यादातर पक्षकार इसके लिए सहमत नहीं दिख रहे हैं।
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