Ram Mandir: रामलला के लिए मुस्लिम परिवार की कारसेवा, बना दी भव्य मूर्तियां, देवी प्रतिमा बनाने में भी महारत
राम मंदिर ट्रस्ट इस वक्त रामलला की प्राण प्रतिष्ठा तैयारी में जुटा है। मंदिर परिसर के साथ पूरी जन्मभूमि क्षेत्र को भव्य रूप दिया जा रहा है। प्राण प्रतिष्ठा के अनुष्ठान के कार्यक्रम को एक बड़े स्तर पर आयोजित किया जाना है, जिसमें पीएम मोदी भी शामिल होंगे। ट्रस्ट का उद्देश्य राम मंदिर को भारत ही नहीं दुनिया में आध्यात्मिक केंद्र के रूप में स्थापित करने का है। ऐसे में मंदिर के निर्माण के साथ सर्वधर्म समभाव का भी संदेश दिया जा रहा है। मंदिर निर्माण से समाज के सभी वर्गों को जोड़ा रहा है। मंदिर परिसर में लगने वाली रामलला की मूर्तियां पश्चिम बंगाल के एक मुस्लिम परिवार ने बनाई हैं।
सदियों बाद मंदिर और मस्जिद विवाद के उलझन से उबरने के बाद राम नगरी से एक बार फिर शांति और सद्भावना का संदेश दिया जा रहा है। श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र न्यास (राम मंदिर ट्रस्ट) ने रामलला की मूर्ति बनाने का जिम्मा किसी सनातनधर्मी नहीं बल्कि एक मुस्लिम परिवार को सौंपा। वजह साफ है कि ट्रस्ट मंदिर निर्माण में अन्य धर्म के अनुयायियों को भी कारसेवा का मौका देना चाहता है।

दरअसल, ट्रस्ट का मानना है कि मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम का जीवन वैश्विक समाज के लिए अनुकरणीय है। दुनिया के कई धर्म सनातन के आदर्शों पर ही बने हैं। ऐसे में व्यापक रूप से अयोध्या में बन रहा मंदिर पूरी दुनिया के लिए धर्म का केंद्र होगा। ऐसे में मंदिर निर्माण के लिए की जा रही कारसेवा में पश्चिम बंगाल के जमालुद्दीन का भी ट्रस्ट ने सहयोग लिया है।
रामलला की मूर्ति कौन बना रहा है इस सवाल पर मंदिर ट्रस्ट के सचिव चंपत राय ने साफ कहा कि मूर्ति वहीं बनाएगा जो उसका जानकार होगा। तकनीकी काम वहीं करता है जो उसका जानकार होता है। तकनीक को मनुष्य-मनुष्य का भेद करके नहीं देखा जाता है। चंपत राय ने कहा कि इसे तीन लोग मिलकर बना रहे हैं।
जमालुद्दीन ने बनाई रामलला की मूर्ति
रामलला की मूर्ति बनाने वाले जमालुद्दीन पश्चिम बंगाल के मुस्लिम परिवार से ताल्लुक रखते हैं। जमालुद्दीन का कहना है, "धर्म एक निजी चीज होती है। हमारे देश में कई धर्मों को मानने वाले लोग रहते हैं। संदेश साफ है कि सांप्रदायिकता के समय में हमें एकसाथ मिलकर रहना होगा। एक कलाकार के तौर पर भाईचारे की संस्कृति मेरा संदेश है।" मीडिया को उन्होंने बताया कि वो पिछले कई वर्षों से हिंदू देवी-देवताओं की फाइबर की मूर्तियां तैयार कर रहे हैं।
पश्चिम बंगाल में रहता है परिवार
जलालुद्दीन का परिवार पश्चिम बंगाल के 24 परगना जिले के रहने वाले हैं। इस परिवार को देवी देवताओं की मूर्तियां बनाने में महारत हासिल है। जलालुद्दीन बंगाल में दुर्गा पूजा के दौरान भी मां दुर्गा की विशाल मूर्तिया बनाते रहे हैं।
टिकाऊ होती हैं फाइबर की मूर्तियां
जमालुद्दीन का कहना है कि टिकाऊ होने के चलते मिट्टी के बजाए फाइबर की मूर्तियां पसंद की जा रही हैं। उन्होंने बताया कि एक लाइफ साइट मूर्ति तैयार करने में 2.8 लाख रुपये का खर्च आता है। जबकि उनके बेटे बिट्टू के मुकाबिक एक मूर्ति तैयार करने में 30 से 35 लोगों की एक टीम काम करती हैं। मूर्ति बनाने में डेढ़ महीने का वक्त लगता है। यूपी तक मूर्तियां पहुंचाने में 45 दिनों का समय लग सकता है।












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