Ayodhya Verdict: एक नजर में पढ़ें अयोध्या राम जन्मभूमि -बाबरी मस्जिद विवाद पर आया SC का फैसला

नई दिल्ली। देश के सबसे बहुचर्चित कोर्ट केस अयोध्या राम जन्मभूमि - बाबरी मस्जिद विवाद केस में शनिवार को फैसला आ गया है और इसके बाद अब तक विवादित रही जमीन पर रामलला विराजमान ही रहेंगे वहीं दूसरी तरफ सर्वोच्च न्यायालय ने मुस्लिम पक्ष को अलग से मस्जिद के लिए जमीन देने के निर्देश दिए हैं। आज पांच जजों की संवैधानिक पीठ ने इस मामले में एतिहासिक फैसला सुनाया है, बता दें कि इस बेंच ने लगातार 40 दिन की मैराथन सुनवाई के बाद बीती 16 अक्टूबर को फैसला सुरक्षित रख लिया गया था।

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    आइए एक नजर में पढ़े इस ऐतिहासिक फैसले को और जानते हैं फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने क्या-क्या कहा.....

    इलाहाबाद हाई कोर्ट का फैसला अतार्किक: SC

    इलाहाबाद हाई कोर्ट का फैसला अतार्किक: SC

    इलाहाबाद हाई कोर्ट द्वारा विवादित जमीन को तीन पक्षों में बांटने के फैसले को अतार्किक करार देते हुए कहा कि हाई कोर्ट ने जो तीन पक्ष माने थे, उसे दो हिस्सों में मानना होगा। कोर्ट ने कहा कि हाई कोर्ट द्वारा जमीन को तीन हिस्सों में बांटना तार्किक नहीं था। इससे साफ हो गया कि मामले में अब रामलला विराजमान और सुन्नी वक्फ बोर्ड दो पक्ष ही रह गए।

    SC ने निर्मोही अखाड़ा के दावे को खारिज किया

    SC ने निर्मोही अखाड़ा के दावे को खारिज किया

    सुप्रीम कोर्ट ने निर्मोही अखाड़ा के दावे को खारिज करते हुए कहा कि उसने देरी से याचिका दायर की थी, गोगोई ने कहा कि कोर्ट धर्मशास्त्र में पड़े, यह उचित नहीं। प्लेसेज ऑफ वर्शिप ऐक्ट सभी धार्मिक समूहों के हितों की रक्षा के लिए भारत की प्रतिबद्धता को बताता है।

    आस्था वैयक्तिक विश्वास का विषय

    आस्था वैयक्तिक विश्वास का विषय

    देश की सर्वोच्च अदालत ने कहा कि हिंदुओं की आस्था है कि भगवान राम की जन्म गुंबद के नीचे हुआ था। आस्था वैयक्तिक विश्वास का विषय है, बाबरी मस्जिद का निर्माण खाली जगह पर हुआ था, जमीन के नीचे का ढांचा इस्लामिक नहीं था। ASI के निष्कर्षों से साबित हुआ कि नष्ट किए गए ढांचे के नीचे मंदिर था और इस बात के सबूत हैं कि अंग्रेजों के आने के पहले से राम चबूतरा और सीता रसोई की हिंदू पूजा करते थे।

    अपना अधिकार साबित नहीं कर पाए मुस्लिम: सु्प्रीम कोर्ट

    अपना अधिकार साबित नहीं कर पाए मुस्लिम: सु्प्रीम कोर्ट

    मुस्लिमों ने इस बात के सबूत पेश नहीं किए कि 1857 से पहले स्थल पर उनका ऐक्सक्लुसिव कब्जा था। सुप्रीम कोर्ट ने शिया वक्फ बोर्ड की अपील खारिज कर दी। उन्होंने कहा कि मस्जिद कब बनी, इससे फर्क नहीं पड़ता। 22-23 दिसंबर 1949 को मूर्ति रखी गई। गौरतलब है कि मुस्लिम पक्ष ने कहा था कि वहां लगातार नमाज पढ़ी जाती रही थी। कोर्ट ने कहा कि 1856 से पहले अंदरूनी हिस्से में हिंदू भी पूजा किया करते थे। रोकने पर बाहर चबूतरे पर पूजा करने लगे

    खाली जमीन पर नहीं बनी थी मस्जिद: SC

    सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की खुदाई से निकले सबूतों की अनदेखी नहीं कर सकते हैं। कोर्ट ने कहा कि हाई कोर्ट का फैसला पूरी पारदर्शिता से हुआ है। बाबरी मस्जिद खाली जमीन पर नहीं बनी थी। कोर्ट ने कहा कि मस्जिद के नीचे विशाल रचना थी। एएसआई ने 12वीं सदी का मंदिर बताया था। कोर्ट ने कहा कि वहां से जो कलाकृतियां मिली थीं, वह इस्लामिक नहीं थीं।

    5 एकड़ की जमीन

    5 एकड़ की जमीन

    कोर्ट ने आगे कहा कि सुन्नी वक्फ बोर्ड को कहीं और 5 एकड़ की जमीन दी जाए और इसके साथ ही कोर्ट ने केंद्र सरकार को आदेश दिया है कि वह मंदिर निर्माण के लिए 3 महीने में ट्रस्ट बनाए, इस ट्रस्ट में निर्मोही अखाड़े को भी प्रतिनिधित्व देने का आदेश हुआ है। कोर्ट ने आगे कहा कि हर मजहब के लोगों को संविधान में बराबर का सम्मान दिया गया है।

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