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नज़रिया: लालू-मोदी के बीच झूलते नीतीश कुमार

By Bbc Hindi

जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) का कोई बयान अगर केंद्र सरकार को निशाने पर ले रहा हो तो लोगों का चौंकना स्वाभाविक है.

ख़ासकर भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के कान तो इस पर ज़रूर खड़े होंगे. और हुआ भी ऐसा ही है.

जेडीयू के अध्यक्ष और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने 15वें वित्त आयोग को हाल ही एक पत्र लिख कर ज़ोर डाला है कि बिहार को विशेष राज्य का दर्जा दिए जाने पर केंद्र सरकार विचार करे.

इससे पहले नीतीश के निकटतम प्रवक्ता और सांसद आरसीपी सिंह ने इस सोई हुई-सी मांग को तीखे तेवर वाले अंदाज़ में जगाना शुरू कर दिया था.

सवाल है कि 'हमें इंसाफ चाहिए' वाली ये चेतना इतने लंबे समय तक मृतप्राय रहने के बाद अचानक कैसे ज़िंदा हो गई?



बीजेपी से अलग दिखने की तत्परता

फिर मुख्यमंत्री का नोटबंदी के नतीजे और बैंकों की भूमिका पर सवाल उठाने वाला बयान भी आ गया.

लोगों को हैरत हुई कि जो नीतीश कुमार नोटबंदी के समर्थन में खुलकर उतरे थे, वही अब इस बाबत अपना रुख़ बदल रहे हैं.

इतना ही नहीं, देश भर में घूम कर समाजवादियों को एकजुट करने और अपने दल के विस्तार में बीजेपी से अलग दिखने की तत्परता भी नीतीश कुमार दिखा रहे हैं.

ये सारे लक्षण मोटे तौर पर नीतीश के बदल रहे इरादे का संकेत ज़रूर देते हैं, लेकिन गहरी नज़र वाले इसमें कुछ और भी पढ़ते हैं.

पहली बात कि यह रवैया आगामी लोकसभा चुनाव के मद्देनज़र बनाई जा रही रणनीति का हिस्सा हो सकता है.



चुनावी भविष्य बिगड़ने की सूरत

बीजेपी पर अभी से दबाव और विवशता बना कर जेडीयू अगले चुनाव के समय सीटों के बंटवारे को अपने अनुकूल बनाना चाह रहा है.

दूसरी बात कि बीजेपी के चुनावी भविष्य बिगड़ने की सूरत में नीतीश कुमार ख़ुद को विपक्षी ख़ेमे के भी काम लायक बना पाने जैसी गुंजाइश तलाश रहे होंगे.

इसके लिए उन्हें अपनी बिगड़ी छवि इस तरह सुधारनी होगी कि कोई उनके राजनीतिक भविष्य को बीजेपी या नरेंद्र मोदी का अविभाज्य अंग न समझ बैठे.

वैसे भी, राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के नये सूत्रधार तेजस्वी यादव को लालू का जनाधार स्वीकार कर चुका है. यह नीतीश कुमार के लिए शुभ संकेत नहीं हैं.

इस संकट को खड़ा करके मज़बूती देने की चूक भी तो उन्हीं से हुई है!

नीतीश कुमार
Getty Images
नीतीश कुमार

राजनीति में सुकून वाली जगह

इसलिए हो सकता है कि अब प्रादेशिक राजनीति में उभरती चुनौती से निकल कर वह राष्ट्रीय राजनीति में सुकून वाली जगह तलाश रहे हों.

तो क्या यही कारण है कि बिहार के सत्ता-साझीदार दोनों दलों के आपसी रिश्ते फिर तल्ख़ी में सुलगते हुए-से दिख रहे हैं?

ज़ाहिर है कि केंद्र सरकार को असहज कर देने जैसे कुछ बयानों के ज़रिए बीजेपी को कुरेदने की पहल जेडीयू ने की है.

हालांकि यह मानना बहुत मुश्किल है कि नीतीश कुमार का वह सियासी मंसूबा पूरी तरह चूर नहीं हुआ है, जो कभी नरेंद्र मोदी से टक्कर ले रहा था?

कुछ लोगों का ऐसा भी ख़याल है कि जेडीयू का यह नया रुख़ बीजेपी के साथ उसकी सुनियोजित रणनीति हो सकती है.

तर्क यह है कि बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने वाली मांग फिर से उछाल कर उसे किसी मिलते-जुलते रूप में ही सही, लेकिन मानवा लिया जाए.

जन-वाहवाही बटोरने का इरादा

समझा जा रहा है कि चुनाव के समय इस बड़ी मांग को मंज़ूर करके जन-वाहवाही बटोरने का इरादा हो सकता है.

इस तर्क को बल इसलिए मिल है क्योंकि कुछ बड़े बीजेपी नेता और सहयोगी दल के रामविलास पासवान भी इस बाबत जेडीयू के सुर में सुर मिलाने लगे हैं.

अगर ऐसा हुआ, तो मोदी सरकार से निराश या रुष्ट हो रहे बड़े समूह को विरोध पर उतरने से रोकने की गुंजाइश बन सकती है.

साथ ही बिहार में विपक्ष के हथियार को भी इस क़दम से कुंद करने की कोशिश की जा सकेगी.

लेकिन चंद्रबाबू नायडू का उदाहरण दे कर इस संभावना पर प्रश्न चिह्न लगाने वाले मानते हैं कि बीजेपी नीतीश कुमार को इसका पूरा श्रेय लूटने नहीं देगी.

ऐसी अबूझ-सी स्थिति में नीतीश-मोदी संबंध की सतही गतिविधियों को गहराई से परखे बिना हड़बड़ी में निष्कर्ष निकालने वाले धोखा खा सकते हैं.

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English summary
Attitude Nitish Kumar swinging between Lalu and Modi

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