नज़रिया: यू-टर्न लेने में माहिर हैं गठबंधन के उस्ताद नायडू

आख़िरकार 15 साल के अंतराल के बाद आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री और तेलुगू देशम पार्टी के प्रमुख एन चंद्रबाबू नायडू एक बार फिर राष्ट्रीय राजनीति में वापसी करने के लिए तैयार हैं.

गुरुवार को उनकी कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के साथ हुई बैठक और उसके बाद आगामी चुनाव में कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ने की बात ने बीजेपी के लिए मुश्किलें तो ज़रूर पैदा कर दी हैं.

पिछले एक-डेढ साल से कई क्षेत्रीय नेता तीसरा मोर्चा बनाने की कोशिशें कर रहे हैं लेकिन इनमें से किसी ने भी नायडू की तरह तत्परता नहीं दिखाई.

69 साल के नायडू को गठबंधन बनाने में एक तरह से महारथ हासिल है.

साल 1996 में कर्नाटक के नेता एच डी देवेगौड़ा को प्रधानमंत्री पद तक पहुँचाने के लिए जिस सेक्युलर मोर्चे को श्रेय दिया जाता है उसमें तमाम अलग-अलग पार्टियों को एकजुट करने का अहम काम नायडू ने ही किया था.

इसके महज दो साल बाद ही नायडू ने जबरदस्त यू-टर्न लेते हुए दक्षिणपंथी विचारधारा वाले दल बीजेपी के साथ मिलकर देश की पहली एनडीए सरकार बनाने में अहम भूमिका निभाई जिसके चलते अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री बने.

साल 2004 में जब उनकी पार्टी को आंध्र प्रदेश में हार का सामना करना पड़ा और उसके बाद 2004 के लोकसभा चुनाव में एनडीए गठबंधन को भी हार मिली तो नायडू ने इस हार का ठीकरा साम्प्रदायिक छवि वाली बीजेपी और गुजरात दंगों पर फोड़ने में ज़रा सी भी देर नहीं लगाई.

शुरुआत कांग्रेस से ही

आंध्र के इस धुरंधर नेता के लिए विचारधारा या निजी विश्वास ने कभी बहुत ज़्यादा मायने नहीं रखा.

जिन लोगों को नायडू का अपने कड़े प्रतिद्वंदी रहे राहुल गांधी के साथ खड़े होना अचरज भरा लग रहा है उन्हें याद करना चाहिए कि नायडू ने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत साल 1978 में कांग्रेस के टिकट से आंध्र प्रदेश विधानसभा चुनाव लड़कर ही की थी.

साल 1980 में वे राज्य की कांग्रेस सरकार में मंत्री भी रहे थे जिसके चलते वे तेलुगू फ़िल्मों में बड़ा नाम रखने वाले एनटी रामाराव की बेटी से शादी भी कर सके.

साल 1982 में एनटीआर ने अपनी क्षेत्रीय पार्टी तेलुगू देसम पार्टी बनाई और कांग्रेस को उसी गढ़ में मात देने में कामयाबी पाई.

हालांकि उस समय नायडू ने एनटीआर की बजाय कांग्रेस का साथ दिया और उसी के टिकट पर चुनाव भी लड़ा, जिसमें वे हार गए.

एनटीआर की परछाई

इस हार ने नायडू को टीडीपी में जाने की सीख दी.

इसके बाद जब साल 1984 में इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्रित्व काल में आंध्र प्रदेश के राज्यपाल ने 19 महीने पहले बनी एनटीआर को गिराने की कोशिश की तो नायडू ने ही गैर-कांग्रेसी ताकतों को इकट्ठा कर एनटीआर की सरकार को बचाया.

इस दौरान नायडू एनटीआर की परछाई के तौर पर काम करते रहे.

लेकिन नायडू ही वही व्यक्ति भी थे जिन्होंने साल 1995 में एनटीआर को दखल कर टीडीपी प्रमुख का पदभार संभाला साथ ही राज्य के मुख्यमंत्री भी बने.

साल 2014 में आंध्र प्रदेश के दो हिस्से हो जाने के बाद नायडू उन्हीं नरेंद्र मोदी के साथ हाथ मिलाने के लिए भी तैयार हो जिन्हें उन्होंने 10 साल पहले साल 2004 में बीजेपी गठबंधन की हार का ज़िम्मेदार ठहराया था.

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बीजेपी के तीखे हमले

आख़िर ऐसा क्या हुआ कि अब नायडू बीजेपी का साथ छोड़कर कांग्रेस में जाने के लिए क्यूँ और कैसे तैयार हो गए?

जनता शायद उस दृश्य को भूली नहीं होगी जब साल 2014 में नरेंद्र मोदी के लिए प्रचार के दौरान नायडू ने सोनिया गांधी, राहुल गांधी और कांग्रेस पार्टी पर आंध्र प्रदेश के बंटवारे का आरोप लगाया था.

दूसरे लोग नायडू की इस प्रवृत्ति को 'गिरगिट की तरह रंग बदलने' के तौर पर देखते हैं लेकिन नायडू इसे व्यवहारवादिता और लोकतांत्रिक ज़रूरत बताते हैं.

उन्होंने एक शानदार नारा दिया है कि देश के संवैधानिक संस्थाओं को बचाने के लिए गैर बीजेपी दलों को एक साथ आना होगा और देश के लोकतंत्र और भविष्य को बचाना होगा.

इस साल मार्च में जब नायडू एनडीए से अलग हुए थे तभी से बीजेपी ने उन पर तीखे हमले किए हैं.

एक तरह से ये स्पष्ट संकेत हैं कि बीजेपी अगले साल होने वाले चुनाव में आंध्र प्रदेश में टीडीपी की मुख्य विपक्षी दल वायएसआर कांग्रेस का हाथ थाम सकती है. या फिर हो सकता है कि वे नायडू के सामने एक और फिल्म स्टार पवन काल्या को खड़ा कर दे.

नायडू
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नायडू

भाजपा का षडयंत्र

दूसरी बात ये है कि जब आप मोदी और अमित शाह की जोड़ी के ख़िलाफ़ जाते हैं तो एक तरह से अपने लिए मुश्किलों को दावत भी देते हैं.

केंद्र सरकार इनकम टैक्स, प्रवर्तन निदेशालय और कई दूसरी एजेंसियों को विरोधी नेताओं और टीडीपी के साथ खड़े व्यवसायिक परिवारों के ख़िलाफ़ जाँच के लिए भेजा है. ऐसा कोई दिन नहीं बीता जब आईटी के अधिकारियों ने टीडीपी नेताओं के घर के दरवाज़े ना खटखटाएं हों.

नायडू के शब्दों में कहें तो बीजेपी उनकी सरकार को गिराने के लिए षडयंत्र रच रही है.

हाल ही में जगनमोहन रेड्डी पर हुए चाकू से हमले ने बीजेपी और वायएसआरसीपी को नायडू पर हमला करने की नई वजह दे दी.

बीजेपी नेता पहले से ही पोलवरम सिंचाई परियोजना और और राज्य की राजधानी में निर्माण संबंधी कार्यक्रमों में हुए भ्रष्टाचार की वजह से नायडू सरकार को घेरे हुए हैं.

इसके साथ ही पड़ोसी राज्य तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव के साथ बढ़ते विवाद ने भी उनके लिए कई मुश्किलें पैदा की हैं. उन्हें लगता है कि केसीआर को उनके विरोध में खड़ा करने के पीछे बीजेपी का हाथ है.

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बड़ा फ़ायदा

नायडू ने बीजेपी कैंप से अलग अपने पुराने दोस्तों के साथ रिश्ते बनाने दोबारा शुरू कर दिए हैं जिसमें ममता बनर्जी, एच डी देवेगौड़ा, शरद पवार, मायावती, फ़ारूक़ अब्दुल्ला के अलावा नई पीढ़ी के नेता अखिलेश यादव और अरविंद केजरीवाल शामिल हैं.

एक अनुभवी और चालाक नेता होने के कारण नायडू जानते हैं कि बिना किसी राष्ट्रीय पार्टी का हाथ थामे कोई क्षेत्रीय पार्टी बहुत अधिक प्रभाव नहीं जमा सकती.

पिछली बार उन्होंने बीजेपी का हाथ थामा था तो इस बार कांग्रेस का थाम लिया है.

कांग्रेस के साथ जाने का एक बड़ा फ़ायदा टीडीपी को यह होगा कि तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में कांग्रेस बहुत बड़ी ताकत नहीं है.

ऐसे में कहा जा सकता है कि उन्होंने तेलंगाना में कांग्रेस की मदद के लिए हाथ इसलिए बढ़ाया है ताकि आंध्र प्रदेश में वे लगातार बढ़ते विपक्ष का सामना कांग्रेस के साथ मिलकर कर सके.

इन दोनों पार्टियों के बीच पहली बार एक साथ आने के संकेट तब मिले थे जब तेलंगाना में इन्होंने विशाल गठबंधन बनाया था.

https://twitter.com/ncbn/status/1058002201904365568

मकसद बीजेपी को हराना

तेलंगाना में नायडू ने वास्तविकता को पहचानते हुए कांग्रेस को खुद से ज़्यादा अहम जगह दी और अब आंध्र में कांग्रेस इसका बदला चुका रही है. राहुल गांधी ने नायडू के साथ मुलाकात के बाद यह कहा भी.

उन्होंने कहा, ''हमारा मुख्य मकसद बीजेपी को हराना और देश के लोकतंत्र और संस्थाओं को बचाना है. इसके अलावा इस गठबंधन का चेहरा कौन होगा इस पर बाद में विचार किया जाएगा.''

एक सवाल यह भी उठता है कि क्या नायडू आज भी उतने ही शक्तिशाली हैं जितने वे साल 1996 और 1998 में थे?

राजनीतिक तौर पर तो नहीं लेकिन निजि तौर पर इसका जवाब हाँ होगा.

नायडू ताकत बहुत हद तक तब समाप्त हुई जब आंध्र प्रदेश दो हिस्सों में बंट गया. अब नायडू के पास महज 25 लोकसभा सीटें रह गई हैं और बाकी कि 17 सीटें तेलंगाना में केसीआर के पास हैं.

लेकिन निजी तौर पर नायडू की तमाम राजनीतिक पार्टियों के बीच अच्छी पैठ है, उनका राजनीतिक अनुभव और राजनीति के गुणा-भाग को समझना भी अच्छी तरह आता है. उनकी यह काबीलियत उन्हें केंद्र में महत्वपूर्ण बनाती है.

अब सभी कि निगाहें गैर बीजेपी नेताओं की निकट भविष्य में होने वाली बैठक पर लगी हैं, ख़ुद नरेंद्र मोदी भी इस बैठक का इंतजार कर रहे होंगे.

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