Atal Bihari Vajpayee: राजीव गांधी का वो मजाक, जिसे अटल बिहारी ने दिल पे ले लिया था
Atal Bihari Vajpayee: देश के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की आज पुण्यतिथि है। अटल बिहारी वाजपेयी का आज के दिन यानि 16 अगस्त 2018 को निधन हो गया था। अटल बिहारी वाजपेयी की पुण्यतिथि पर पीएम मोदी ने उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की।
पीएम मोदी, अमित शाह, राजनाथ सिंह, पीयूष गोयल समेत कई शीर्ष नेता सदैव अटल मेमोरियल पहुंचे और पूर्व प्रधानमंत्री को श्रद्धांजलि अर्पित की।

अटल जी की पुण्यतिथि पर आज हम आपके साथ एक ऐसा किस्सा साझा करेंगे जिसे बहुत कम लोग जानते हैं। दरअसल जब 1984 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या कर दी गई थी तो उनके बेटे राजीव गांधी को देश का प्रधानमंत्री बनाया गया था और फिर चुनाव कराने का फैसला लिया गया था।
उस वक्त भाजपा के अध्यक्ष अटल बिहारी वाजपेयी थे, वह अपने गृह क्षेत्र ग्वालियर से चुनाव लड़ रहे थे। राज माता विजय सिंधिया अटल बिहारी का समर्थन कर रही थीं। नामांकन के आखिरी दिन तक अटल बिहारी वाजपेयी की जीत लगभग तय थी।
बुरी हार का सामना किया
तभी कांग्रेस ने राजमाता के बेटे माधव राव सिंधिया को उनके खिलाफ मैदान में उतार दिया। जिसके बाद आनन-फानन में अटल बिहारी वाजपेयी ने भिंड से अपना नामांकन दायर किया। लेकिन तबतक देर हो चुकी थी और अटल बिहारी वाजपेयी को 1.65 लाख वोट से हार का सामना करना पड़ा था।
निराशा का दौर
उस वक्त भाजपा को सिर्फ 2 सीटों पर जीत मिली थी। पार्टी को आंध्र प्रदेश में एक सीट और गुजरात में एक सीट पर जीत मिली थी। जिसके बाद प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने भाजपा पर तंज कसते हुए कहा था, हम दो हमारे दो। अटल बिहारी वाजपेयी इस वक्तव्य से काफी दुखी थे, वह पार्टी की हार से भी निराश थे।
हार नहीं मानूंगा-रार नहीं ठानूंगा
जिस तरह से भाजपा को बुरी तरह हार मिली थी उसने अटल बिहारी वाजपेयी के दुख को और बढ़ाने का काम किया। जिसके चलते उन्होंने पार्टी के अध्यक्ष पद से इस्तीफे की पेशकश कर दी। हालांकि उनका इस्तीफा खारिज कर दिया गया। उस वक्त माना जा रहा था कि अटल बिहारी वाजपेयी की राजनीति अब खत्म हो गई थी।
लेकिन अटल जी के जज्बे को उनकी पुरानी कविता हार नहीं मानूंगा, रार नहीं ठानूंगा, काल के कपाल पे लिखता मिटाता हूं, गीत नया गाता हूं से हम समझ सकते हैं।
तकरीबन 11 साल तक भाजपा का संघर्ष जारी रहा। 1995 में भाजपा मजबूत पार्टी के तौर पर उभरने लगी, इसकी मुख्य वजह अयोध्या आंदोलन था। लाल कृष्ण आडवाणी की की रथ यात्रा ने पार्टी को नई पहचान दी और 1991 में भाजपा को 120 सीटों पर जीत मिली।
आडवाणी और अटल
भाजपा ने गुजरात और महाराष्ट्र में सरकार बनाई। उस वक्त आडवाणी की लोकप्रियता चरम पर थी। आडवाणी और अटल के बीच किसी भी तरह की खटास कभी भी सार्वजनिक तौर पर सामने नहीं आई, दोनों क हालांकि दोनों को एक दूसरे का प्रतिद्वंदी माना जाता था।
अटल को पीएम पद का चेहरा बनाया गया
लेकिन जिस तरह से लाल कृष्ण आडवाणी ने खुद अटल बिहारी वाजपेयी का नाम पीएम पद के लिए आगे बढ़ाया उसने हर किसी को चौंका दिया। यह पहली बार था जब भाजपा ने चुनाव के नतीजों से पहले ही पीएम पद के चेहरे का ऐलान किया था।
161 सीटों पर मिली जीत
इसके बाद 1996 के चुनाव में भाजपा को 161 सीटों पर जीत मिली। अटल बिहारी वाजपेयी को सरकार बनाने के लिए न्योता दिया गया। यह सरकार सिर्फ 13 दिन चली क्योंकि वाजपेयी सदन में बहुमत साबित नहीं कर सके। लेकिन इसके बाद भी उन्होंने कभी हार नहीं मानी।
एक दिन लोग आप पर हंसेंगे
उन्होंने 1997 में सदन में बहस के दौरान कांग्रेस पर हमला बोलते हुए कहा था कि मेरे शब्द याद कर लीजिए, आज आप लोग हमपर कम सांसद-विधायक होने पर हंस रहे हैं, लेकिन वो दिन आएगा जब पूरे देश में हमारी सरकार होगी, हमारे सबसे अधिक सांसद और विधायक होंगे, देश आप पर हंसेगा, आपका मजाक बनाएगा।
कांग्रेस की मौजूदा हालत
जिस तरह से राजीव गांधी ने भाजपा का हम दो हमारे दो कहकर मजाक उड़ाया था उसने कांग्रेस का आज तक पीछा नहीं छोड़ा है। पार्टी 2014 के चुनाव में सिर्फ 44 सीटें ही जीत सकी जबकि 2019 में 52 सीटों पर सिमट गई। अटल बिहारी वाजपेयी को हमेशा लोकतंत्र की राजनीति के लिए याद किया जाएगा। उनके इन शब्दों को कभी भुलाया नहीं जा सकता है
सत्ता का खेल तो चलेगा, सरकारें आएंगी, जाएंगी
पार्टियां बनेंगी, बिगड़ेंगी, मगर यह देश रहना चाहिए
इसका लोकतंत्र अमर रहना चाहिए












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