Atal Bihari Vajpayee Jayanti 2023: 'क्या खोया क्या पाया...', अटल की ये कविताएं जीवन में भर देंगी जोश
Atal Bihari Vajpayee Jayanti: 'भारतरत्न' और देश के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का आज जन्मदिवस है। वो परिपक्क नेता, लोकप्रिय वक्ता, सादगी और तपस्या के अनुपम मिसाल थे। अपने नाम के ही अनुरूप फैसलों पर अटल रहने वाले पूर्व पीएम की तारीफ समूचा विपक्ष भी करता था।

राजनीति के क्षेत्र में उनके योगदान को तो हर कोई पहचानता है लेकिन क्या आप जानते हैं कि हिंदी भाषा को आगे बढ़ाने में भी उनका बहुत बड़ा योगदान रहा।
मृदभाषी वक्ता और कर्णप्रिय कवि
साहित्य के प्रति प्रेम ने उन्हें मृदभाषी वक्ता तो बनाया ही साथ ही उन्हें कर्णप्रिय कवि भी बनाया, उनकी कविताएं आज भी सीधे लोगों के हृदय पर दस्तक देती हैं। इसलिए उनके जन्मदिन पर लाए हैं उनकी कुछ यादगार कविताएं, जिसके एक-एक शब्द में गंभीर रहस्य व्याप्त है।
यहां पढ़ें अटल बिहारी वाजपेयी की चुनिंदा कविताएं
'हार नहीं मानूंगा, रार नहीं ठानूंगा'
पहली अनुभूति:
- गीत नहीं गाता हूं
- बेनकाब चेहरे हैं,
- दाग बड़े गहरे हैं
- टूटता तिलिस्म आज सच से भय खाता हूं
- गीत नहीं गाता हूं
- लगी कुछ ऐसी नजर
- बिखरा शीशे सा शहर
- अपनों के मेले में मीत नहीं पाता हूं,
- गीत नहीं गाता हूं

दूसरी अनुभूति:
- गीत नया गाता हूं
- टूटे हुए तारों से फूटे बासंती स्वर
- पत्थर की छाती मे उग आया नव अंकुर
- झरे सब पीले पात
- कोयल की कुहुक रात
- प्राची में अरुणिमा की रेख देख पाता हूं,
- गीत नया गाता हूं
- टूटे हुए सपनों की कौन सुने सिसकी
- अन्तर की चीर व्यथा पलकों पर ठिठकी
- हार नहीं मानूंगा
- रार नहीं ठानूंगा।
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खून क्यों सफेद हो गया?
- भेद में अभेद हो गया,
- बंट गए शहीद, गीत कट गए,
- कलेजे में दरार पड़ गई
- दूध में दरार पड़ गई।
- खेतों में बारूदी गंध
- टूट गए नानक के छंद
- सतलुज सहम उठी, व्यथित सी बितस्ता है
- बसंत में बहार झड़ गई
- दूध में दरार पड़ गई।
- अपनी ही छाया से बैर
- गले लगने लगे हैं अब गैर
- खुदकुशी का है रास्ता, तुम्हें है वतन का वास्ता
- बात बनाएं बिगड़ गई
- दूध में दरार पड़ गई।
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क्या खोया क्या पाया जग में
- क्या खोया क्या पाया जग में
- मिलते और बिछड़ते मग में
- मुझे किसी से नहीं शिकायत
- यद्यपि छला गया पग-पग में
- एक दृष्टि बीती पर डालें, यादों की पोटली टटोलें
- पृथ्वी लाखों वर्ष पुरानी
- जीवन एक अनंत कहानी
- पर तन की अपनी सीमाएं
- यद्यपि सौ शरणों की वाणी
- इतना काफी है अंतिम दस्तक पर, खुद दरवाजा खोलें।
- जन्म मरण अविरत फेरा
- जीवन बंजारों का डेरा
- आज यहां कल कहां कूच है
- कौन जानता किधर सवेरा
- अंधियारा आकाश असीमित,
- प्राणों के पंखों को तौलें।
- अपने ही मन से कुछ बोलें।












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