पैतृक गांव के विकास को लेकर जब लोगों ने की शिकायत तो अटल ने ऐसे जीत लिया दिल

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने 16 अगस्त को दिल्ली के एम्स अस्पताल में आखिरी सांसे लीं। भारत रत्न वाजपेयी 93 साल के थे। उनके निधन से पूरे देश में शोक की लहर है। उनके पैतृक गांव बटेश्वर में मातम छा गया है।

नई दिल्ली। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने 16 अगस्त को दिल्ली के एम्स अस्पताल में आखिरी सांसे लीं। भारत रत्न वाजपेयी 93 साल के थे। उनके निधन से पूरे देश में शोक की लहर है। उनके पैतृक गांव बटेश्वर में मातम छा गया है। आगरा के पास बटेश्वर गांव में जैसे सन्नाटा छा गया है। वाजपेयी के दादा पंडित श्याम लाल वाजपेयी ये गांव छोड़कर मोरेना में जा बसे थे। बचपन में वाजपेयी अपने पूरे परिवार के साथ यहां जरूर आते थे और कुछ वक्त बिताया करते थे।

बचपन में अपने पैतृक गांव आते थे वाजपेयी

बचपन में अपने पैतृक गांव आते थे वाजपेयी

बटेश्वर गांव में अटल बिहारी वाजपेयी के निधन से मातम छा गया है। वाजपेयी के दादा ये गांव छोड़कर मोरेना में जा बसे थे, लेकिन उनके कई रिश्तेदार अब भी इस गांव में मौजूद है। वाजपेयी सन 1999 में इस गांव में एक स्थानीय सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र का उद्घाटन करने और चंबल रावीण गांव को आगरा से जोड़ने के लिए बेटेश्वर रेल लाइन की नींव रखने आए थे। अटल बिहारी वाजपेयी से जब उनके गांव को लेकर सवाल पूछा गया था, तो उन्होंने पूरे देश को ही अपना गांव बताया था।

वाजपेयी को खास पसंद था बैंगन का भर्ता

वाजपेयी को खास पसंद था बैंगन का भर्ता

वाजपेयी से सवाल किया गया कि प्रधानमंत्री का गांव होने के बाद भी उनके गांव में विकास क्यों नहीं हुआ है। इसपर वाजपेयी ने जवाब दिया था, 'पूरा देश ही मेरा गांव है और मेरा अपना गांव मेरी आखिरी प्राथमिकता है।' इस गांव में अटल बिहारी वाजपेयी की मौत से मातम पसरा हुआ है। गांव में वाजपेयी के पैतृक घर के पास रहने वाली 46 वर्षीय गंगा देवी ने टाइम्स ऑफ इंडिया को बताया कि वाजपेयी भले ही प्रधानमंत्री थे, लेकिन वो एक आम आदमी की तरह आए थे।

जब वाजपेयी ने कहा, 'पूरा देश मेरा गांव है'

जब वाजपेयी ने कहा, 'पूरा देश मेरा गांव है'

उन्होंने बताया कि जब वो 6 अप्रैल, 1999 को बटेश्वर आए थे तो उन्होंने वाजपेयी को खाने में दाल-चावल-रोटी के साथ बैंगन का भर्ता दिया था। 'वो प्रधानमंत्री थे, लेकिन एक आम आदमी की तरह खाना खा रहे थे। यहां हम सभी जानते थे कि बैंगन का भर्ता उनका फेवरेट है था।' वाजपेयी के भतीजे लगने वाले चंद्र वाजपेयी ने बताया कि वाजपेयी जब भी इस गांव में आते थे, तो यमुना में डुबकी लगाना नहीं भूलते थे। वो बटेश्वरनाथ मंदिर के पास यमुना में जाकर डुबकी लगाते थे।

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एम्स में लीं आखिरी सांसें

एम्स में लीं आखिरी सांसें

सन 1999 में जब वो बतौर प्रधानमंत्री इस गांव में आए तो रेलवे लाइन की नींव रखने के बाद वो यमुना में डुबकी लगाने गए। गांव के स्थानीय निवासियों ने बताया कि ग्वालियर में पैदा होने के बाद भी वाजपेयी गांव में जरूर आते थे। वो त्योहारों या छुट्टियों में गांव में आते और गांववालों के साथ समय व्यतीत करते। पूर्व प्रधानमंत्री और भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी ने 16 अगस्त को शाम 5:05 मिनट पर आखिरी सांसें लीं।

सरकार ने घोषित किया 7 दिन का राष्ट्रीय शोक

सरकार ने घोषित किया 7 दिन का राष्ट्रीय शोक

खराब सेहत के कारण उन्हें जून में ही अस्पताल में भर्ती कराया गया था। देश के सबसे चर्चित प्रधानमंत्री और नेताओं में से एक रहे वाजपेयी के निधन से पूरे देश में शोक की लहर है। सरकार ने सात दिन के राष्ट्री शोक की घोषणा की है, वहीं कई राज्यों ने एक दिन की छुट्टी का ऐलान किया है। अटल बिहारी वाजपेयी सिर्फ एक अच्छे नेता ही नहीं, बल्कि एक अच्छे वक्ता और कवि भी थे।

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