Assam Election 2026: क्यों तीसरी बार भी BJP ही बनाएगी सरकार? ये 5 फैक्टर तय करेंगे चुनाव का गेम
Assam Election 2026: असम में 9 अप्रैल को मतदान और 4 मई को नतीजे आने हैं, लेकिन सियासी गलियारों में अभी से एक सवाल गूंज रहा है-क्या BJP लगातार तीसरी बार सरकार बनाएगी? 2016 में 60 सीटें जीतकर सत्ता में आई BJP ने 2021 में भी अपना प्रदर्शन बरकरार रखा और वोट शेयर 29% से बढ़ाकर 33% कर लिया। सहयोगी दलों के साथ NDA ने मजबूत पकड़ बनाए रखी, भले ही कुछ सीटों का नुकसान हुआ।
इस बार BJP, AGP और BPF मिलकर 125 सीटों पर चुनाव लड़ रहे हैं। वहीं कांग्रेस के नेतृत्व में गठबंधन जरूर बड़ा दिख रहा है, लेकिन जमीन पर उसकी ताकत पर सवाल हैं। ऐसे में आइए वो 5 बड़े फैक्टर जो, विपक्ष के लिए बनेंगे सबसे बड़ी चुनौती।

1. बदला हुआ चुनावी गणित
2023 में हुए परिसीमन ने असम की राजनीति की दिशा बदल दी है। 126 सीटों में बड़ा फेरबदल हुआ, जिसमें मुस्लिम बहुल सीटों की संख्या 35 से घटकर करीब 24 रह गई। इसका सीधा असर कांग्रेस और AIUDF के पारंपरिक वोट बैंक पर पड़ा है। पहले जहां ये वोट कई सीटों पर निर्णायक होते थे, अब उनका असर सीमित हो गया है। इससे BJP को सीटों में बढ़त लेने का मौका मिल सकता है।
2. विपक्ष कांग्रेस का बिखराव
इस बार सबसे बड़ा झटका कांग्रेस को AIUDF से अलग होने के कारण लगा है। 2021 में दोनों साथ लड़े थे और 45 सीटें जीती थीं, लेकिन इस बार वोट बंटने की पूरी संभावना है। कांग्रेस, रायजोर दल और AJP का गठबंधन कागज पर मजबूत दिखता है, लेकिन जमीनी स्तर पर तालमेल और वोट ट्रांसफर कितना होगा, यह बड़ा सवाल है। कई सीटों पर 'फ्रेंडली फाइट' भी विपक्ष को नुकसान पहुंचा सकती है।
चुनाव से पहले कांग्रेस के कई बड़े नेताओं का BJP में जाना पार्टी के लिए बड़ा झटका साबित हुआ है। इससे न सिर्फ संगठन कमजोर हुआ है, बल्कि जनता के बीच भी यह संदेश गया है कि कांग्रेस अंदर से बिखरी हुई है। सीएम हिमंत बिस्वा सरमा के बयान कि कांग्रेस में उनके 'मोल' हैं, ने पार्टी के भीतर अविश्वास और बढ़ा दिया है। इससे BJP को मनोवैज्ञानिक बढ़त मिलती दिख रही है।
3. संगठन और नेतृत्व की ताकत
मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा की लोकप्रियता BJP के लिए सबसे बड़ा प्लस प्वाइंट मानी जा रही है। उनकी 'आशीर्वाद यात्रा' में उमड़ी भीड़ ने साफ संकेत दिया कि जनता के बीच उनकी पकड़ मजबूत है। इसके अलावा BJP और RSS का मजबूत संगठन, बूथ स्तर तक पहुंच और संसाधनों की ताकत पार्टी को बड़ा बढ़त देती है। इसके मुकाबले कांग्रेस का संगठन कमजोर नजर आता है।
4. ध्रुवीकरण और मुद्दों की राजनीति
असम में बांग्लादेशी घुसपैठ और पहचान का मुद्दा हमेशा से संवेदनशील रहा है। BJP ने इस मुद्दे को लगातार उठाया है, जिससे एक बड़ा वर्ग उसके साथ जुड़ा हुआ है। पहले AIUDF प्रमुख बदरुद्दीन अजमल को इस नैरेटिव का चेहरा बनाया जाता था, लेकिन अब पार्टी ने नए चेहरों और मुद्दों के जरिए इस बहस को जिंदा रखा है। इससे चुनावी ध्रुवीकरण और तेज हुआ है।
5. गठबंधन की अनिश्चितता
कांग्रेस के नेतृत्व वाला गठबंधन भले ही छह दलों का हो, लेकिन इनमें से कई दलों का प्रभाव सीमित इलाकों तक ही है। सीटों का गणित जितना मजबूत दिखता है, उतनी ही कमजोर इसकी 'केमिस्ट्री' नजर आती है। इसके उलट BJP का गठबंधन भले ही बदलता रहा हो, लेकिन चुनाव के वक्त वह व्यावहारिक रणनीति के साथ सामने आता है। BPF और UPPL के साथ उसके रिश्ते इसका उदाहरण हैं।
क्या भाजपा के लिए कोई जोखिम भी है?
इतनी मजबूती के बावजूद BJP के सामने एक चुनौती भी है-टिकट वितरण में बाहरी नेताओं की ज्यादा एंट्री। करीब 30 उम्मीदवार दूसरे दलों से आए हैं, जिससे पुराने कार्यकर्ताओं में नाराजगी है। अगर यह असंतोष बढ़ता है, तो कुछ सीटों पर नुकसान हो सकता है। हालांकि, अब तक पार्टी का अनुशासन इसे संभालता दिख रहा है।
हालांकि सभी फैक्टर्स को देखें तो असम में BJP की हैट्रिक की संभावना मजबूत नजर आती है। बदला हुआ चुनावी गणित, विपक्ष का बिखराव, मजबूत नेतृत्व और संगठन-हालात NDA के पक्ष में जाते दिख रहे हैं। हालांकि, चुनाव में आखिरी फैसला जनता ही करती है, लेकिन मौजूदा हालात BJP के लिए काफी अनुकूल दिखाई दे रहे हैं।












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