अशोक गहलोत: डाउन टू अर्थ और जादूगर के बेटे राजस्थान के नए सीएम, पढ़ें पूरा प्रोफाइल
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जयपुर। राजस्थान की सियासी जंग को कांग्रेस ने फतह कर लिया है। मुख्यमंत्री के नाम पर लंबी बैठकों के बाद पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष सचिन पायलट पर भारी पड़े। एक बार फिर जब राज्य में कांग्रेस आलाकमान के समक्ष 2008 जैसी स्थिति खड़ी हो गई, तब पार्टी ने अपने जादूगर पर ही भरोसा जताया है जो सबको साथ लेकर चल सके। राजस्थान में 'राजनीति का जादूगर' माने जाने वाले गहलोत ने 2018 के राज्य विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को बहुमत के जादुई आंकड़े के करीब लाने में अहम भूमिका निभाई है। आईए जानते हैं अशोक गहलोत के बारे में सबकुछ...

जोधाणा के गहलोत
अशोक गहलोत का जन्म 3 मई 1951 को जोधपुर राजस्थान में हुआ। स्व. लक्ष्मण सिंह गहलोत के घर जन्में अशोक गहलोत ने विज्ञान और कानून में स्नातक डिग्री प्राप्त की तथा अर्थशास्त्र विषय लेकर स्नातकोत्तर डिग्री प्राप्त की हैं। गहलोत का विवाह 27 नवम्बर, 1977 को सुनीता गहलोत के साथ हुआ। गहलोत के एक पुत्र वैभव गहलोत और एक पुत्री सोनिया गहलोत हैं। गहलोत पेशे से वकील हैं।

पिता जादूगर थे लेकिन अशोक गहलोत का जादू राजनीति में चला
राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के पिता जादूगर थे। अशोक गहलोत ने भी इस पेशे में हाथ आजमाए, लेकिन उनका जादू चला राजनीति के मंच पर। इसे जादू से कम नहीं कह सकते कि राजस्थान जैसे प्रदेश में जहां की राजनीति लगातार क्षत्रियों, जाटों और ब्राह्मणों के प्रभाव में रही हो, वहां जाति से माली और खानदानी पेशे से जादूगर के बेटे ने अपने आपको कांग्रेस के सबसे बड़े नेता के रूप में स्थापित कर लिया। वो 1998 में ऐसे समय पहली बार मुख्यमंत्री बने, जब प्रदेश में ताकतवर जाट और प्रभावशाली ब्राह्मण नेताओं का बोलबाला था।

गाड़ी में रखकर चलते हैं पारले-जी बिस्किट, कड़क चाय के हैं शौकीन
अशोक गहलोत को लो प्रोफाइल रहना पसंद है। यहां तक की उनकी टीम में काम करने वाले अफसर भी सीधे सादे रहते हैं। आपको शायद यकीन न हो कि अशोक गहलोत अपनी गाड़ी में पारले-जी बिस्किट रखकर चलते हैं और रोड़ साइड कड़क चाय पीने के शौकीन हैं। अपनी छवि को लेकर वो इतने सजग रहते हैं कि उनके बेटे को प्रदेश कांग्रेस कमेटी में सदस्य होने के लिए तब तक इंतजार करना पड़ा, जब तक उन्हें गहलोत के धुर विरोधी सीपी जोशी ने नामांकित नहीं किया।

इंदिरा गांधी की पड़ी थी नजर, संजय ने दिलाई पहचान
अशोक गहलोत को 70 के दशक में कांग्रेस में शामिल होने का मौका मिला था, जब पू्र्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के समय पार्टी में संजय गांधी की चलती थी। जब संजय गांधी के करीबियों ने उन्हें अशोक गहलोत के बारे में बताया तो उन्होंने गहलोत को राजस्थान में पार्टी के छात्र संगठन एनएसयूआई का अध्यक्ष बनाया। गहलोत को शुरुआती दिनों में संजय गांधी की मंडली के लोग 'गिली बिली' कहकर संबोधित करते थे। कुछ लोगों का मानना है कि अशोक गहलोत पर सबसे पहले स्वयं इंदिरा गांधी की नजर पड़ी थी। जब पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) में विद्रोह के बाद पूर्वोत्तर में शरणार्थी संकट खड़ा हो गया था। गहलोत की उम्र उस वक्त 20 साल थी, और इंदिरा ने उन्हें राजनीति में आने का न्योता दिया। जिसके बाद गहलोत ने अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के इंदौर सम्मेलन में हिस्सा लिया और यहीं उनकी मुलाकात संजय गांधी से हुई।

किसी भी गलती को आसानी से नहीं भूलते गहलोत
गहलोत की ये भंगिमाएं उनके विरोधियों को जरा भी राहत नहीं देतीं। गहलोत ने दस साल पहले कहा था, 'हर गलती की एक कीमत होती है'। उनके विरोधियों ने यह कीमत खूब अदा की है। वो किसी भी विरोधी की गलती को आसानी से नहीं भूलते, भले ही वह पार्टी के भीतर हो या फिर बाहर।

राजनीति में मास लीडर के तौर पर सबसे उपर हैं अशोक गहलोत
वर्तमान में राजस्थान की राजनीति में मास लीडर के तौर पर यदि किसी का नाम सबसे ऊपर होगा तो वो अशोक गहलोत ही होंगे। राजनीतिक रूप से अल्पसंख्यक और कमजोर जाति से आने वाले गहलोत ने अपने कार्यकाल में राजस्थान में ऐसा जादू चलाया जिसकी काट अभी किसी के पास नहीं है। गहलोत का राजनीतिक कौशल ही था कि 1998 में मुख्यमंत्री के प्रबल दावेदार परसराम मदेरणा को पीछे छोड़ते हुए वे सत्ता के शिखर पर पहुंचे।

अशोक गहलोत की राजनीतिक पृष्ठभूमि
विद्यार्थी जीवन से ही राजनीति और समाजसेवा में सक्रिय रहे गहलोत 7वीं लोकसभा (1980-84) के लिए वर्ष 1980 में पहली बार जोधपुर संसदीय क्षेत्र से निर्वाचित हुए। उन्होंने जोधपुर संसदीय क्षेत्र का 8वीं लोकसभा (1984-1989), 10वीं लोकसभा (1991-96), 11वीं लोकसभा (1996-98) तथा 12वीं लोकसभा (1998-1999) में प्रतिनिधित्व किया।
सरदारपुरा (जोधपुर) विधानसभा क्षेत्र से निर्वाचित होने के बाद गहलोत फरवरी, 1999 में 11वीं राजस्थान विधानसभा के सदस्य बने। गहलोत पुन: इसी विधानसभा क्षेत्र से 12वीं (2003) और 13वीं (2008) राजस्थान विधानसभा के लिए पुन: निर्वाचित हुए।

तीन बार केंद्रीय मंत्री रहे गहलोत
उन्होंने इन्दिरा गांधी, राजीव गांधी तथा पीवी नरसिम्हा राव के मंत्रिमण्डल में केन्द्रीय मंत्री के रूप में कार्य किया। वे तीन बार केन्द्रीय मंत्री बने। जब इन्दिरा गांधी भारत की प्रधानमंत्री थीं उस समय अशोक गहलोत 2 सितम्बर, 1982 से 7 फरवरी 1984 की अवधि में श्रीमती इन्दिरा गांधी के मंत्रीमण्डल में पर्यटन और नागरिक उड्डयन उपमंत्री रहे। इसके बाद गहलोत खेल उपमंत्री बनें। उन्होंने 7 फरवरी 1984 से 31 अक्टूबर 1984 की अवधि में खेल मंत्रालय में कार्य किया तथा पुन: 12 नवम्बर, 1984 से 31 दिसम्बर, 1984 की अवधि में इसी मंत्रालय में कार्य किया।
उनकी इस कार्यशैली को देखते हुए उन्हें केन्द्र सरकार में राज्य मंत्री बनाया गया। 31 दिसम्बर, 1984 से 26 सितम्बर, 1985 की अवधि में गहलोत ने केन्द्रीय पर्यटन और नागरिक उड्डयन राज्य मंत्री के रूप में कार्य किया। इसके बाद उन्हें केन्द्रीय कपड़ा राज्य मंत्री बनाया गया। यह मंत्रालय पूर्व प्रधानमंत्री के पास था तथा गहलोत को इसका स्वतंत्र प्रभार दिया गया। गहलोत इस मंत्रालय के 21 जून 1991 से 18 जनवरी 1993 तक मंत्री रहे।

राजस्थान के मुख्यमंत्री बनने का सिलसिला
जोधपुर के सरदारपुरा सीट से जीतकर आने वाले और राजस्थान कांग्रेस में कद्दावर नेता गहलोत पर हाईकमान ने शनिवार को मुहर लगा दी है। अशोक गहलोत राजस्थान के तीसरी बार मुख्यमंत्री बनने गए हैं। इससे पहले वे 1998 से 2003 और 2008 से 2013 तक राज्य की कमान संभाल चुके हैं। उनके कार्यकाल अन्य महत्वपूर्ण उपलब्धियों के अलावा अभूतपूर्व सूखा प्रबन्धन, विद्युत उत्पादन, संसाधनों का विकास, रोजगार सृजन, औद्योगिक और पर्यटन विकास, कुशल वित्तीय प्रबन्धन और सुशासन के लिए जाना जाता है।
मुख्यमंत्री के रूप में गहलोत के पहले कार्यकाल के दौरान राजस्थान में इस सदी का भयंकार अकाल पड़ा। उन्होंने अत्यन्त ही प्रभावी और कुशल ढ़ंग से अकाल प्रबन्धन का कार्य किया। उस समय अकाल प्रभावित लोगों के पास इतना अनाज पहुंचाया गया था जितना अनाज ये लोग शायद अपनी फसलों से भी प्राप्त नहीं कर सकते थे। प्रतिपक्ष भी खाद्यान्न और चारे की अनुपलब्धता के सम्बन्ध में सरकार की तरफ अंगुली तक नहीं उठा सके, क्योंकि गहलोत ने व्यक्तिगत रूप से अकाल राहत कार्यों की मॉनिटरिंग की थी।
गहलोत को गरीब की पीड़ा और उसके दु:ख दर्द की अनुभूति करने वाले राजनेता के रूप में जाना जाता है। उन्होंने 'पानी बचाओ, बिजली बचाओ, सबको पढ़ाओ' का नारा दिया जिसे राज्य की जनता ने पूर्ण मनोयोग से अंगीकार किया। अशोक गहलोत को 13 दिसम्बर, 2008 को दूसरी बार राजस्थान के मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाई गई। 8 दिसम्बर, 2013 के चुनावी नतीजों के बाद उन्होंने अपने पद से इस्तीफा के दिया।
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