Arunachal Pradesh में सुरक्षा बलों से मुठभेड़ में युंग औंग गुट के दो मिलिटेंट ढेर, जानें क्या है NSCN-K संगठन?
Arunachal Pradesh: अरुणाचल प्रदेश के लोंगडिंग जिले के पास गुरुवार, 5 जून की सुबह भारतीय सुरक्षा बलों और प्रतिबंधित उग्रवादी संगठन नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नागालैंड-खापलांग (NSCN-K) के युंग औंग गुट के बीच एक जबरदस्त मुठभेड़ हुई। इस मुठभेड़ में संगठन के दो उग्रवादी ढेर हो गए। यह कार्रवाई भारतीय सेना ने सीमावर्ती क्षेत्र में खुफिया इनपुट के आधार पर की।
सेना के अनुसार, उन्हें इनपुट मिला था कि कुछ हथियारबंद उग्रवादी लोंगडिंग जिले के पॉन्गचाउ सर्कल से लगे म्यांमार सीमा क्षेत्र के जंगलों में देखे गए हैं।

इसके बाद सेना की एक गश्ती टुकड़ी ने गुरुवार सुबह करीब 10 बजे उस इलाके में सर्च ऑपरेशन शुरू किया। जब सेना की टुकड़ी लांगखू गांव के पास पहुंची, जो म्यांमार की सीमा के भीतर स्थित है, तब उसे भारी गोलीबारी का सामना करना पड़ा।
जवाबी कार्रवाई में मारे गए दो उग्रवादी
रक्षा मंत्रालय द्वारा जारी बयान के मुताबिक, जैसे ही गश्ती दल ने संदिग्ध सशस्त्र लोगों को देखा, उन्हें ललकारा गया। इस पर उग्रवादियों ने भारी कैलिबर वाले हथियारों से अंधाधुंध गोलीबारी शुरू कर दी। इसके जवाब में भारतीय सैनिकों ने तुरंत मोर्चा संभालते हुए जवाबी कार्रवाई की। मुठभेड़ में एनएससीएन (के) युंग औंग गुट के दो उग्रवादी, न्यकलुंग और नेयुंग औंग मारे गए।
एनएससीएन-के (युंग औंग गुट) ने एक बयान जारी कर अपने दो कैडर - न्यकलुंग और नेयुंग औंग - की मौत की पुष्टि की है। संगठन ने मारे गए कैडरों को "शहीद" बताया है और उनके बलिदान को मुक्ति संग्राम का हिस्सा करार दिया। पूर्वोत्तर भारत में उग्रवाद को समाप्त करने के लिए सुरक्षा बल लगातार प्रयासरत हैं।
भारतीय सेना की त्वरित और रणनीतिक प्रतिक्रिया से घबराकर उग्रवादी मुठभेड़ स्थल से भाग खड़े हुए और घने जंगलों की आड़ में म्यांमार की सीमा पार कर गए। सेना द्वारा इलाके में गहन तलाशी अभियान चलाया गया, लेकिन बाकी उग्रवादी वहां से फरार हो चुके थे। इस दौरान कोई अतिरिक्त घायल या हथियार की बरामदगी की सूचना नहीं मिली है।
What is NSCN K: क्या है NSCN (K)?
नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नागालैंड (खापलांग गुट) यानी NSCN (K) पूर्वोत्तर भारत का एक बड़ा उग्रवादी संगठन है, जिसका गठन 1988 में हुआ था। यह गुट SS खापलांग ने उस समय बनाया था जब उसने NSCN (IM) (इसाक-मुइवा) गुट से मतभेद के बाद अलग राह चुन ली। NSCN मूल रूप से नागा अलगाववादी आंदोलन का प्रतिनिधि संगठन रहा है, जो नागा बहुल क्षेत्रों के लिए एक स्वतंत्र नागालैंड या "नागालिम" की मांग करता रहा है।
NSCN की स्थापना 1980 में की गई थी लेकिन 1988 में इसके तीन मुख्य नेताओं SS खापलांग, थुइंगालेंग मुइवा और इसाक चिशी स्वू के बीच मतभेद हो गए। इसके बाद खापलांग ने अलग होकर NSCN (K) यानी खापलांग गुट बना लिया।
इन गुटों में टूट चुका है NSCN (K)
खापलांग की मृत्यु के बाद NSCN (K) कई हिस्सों में टूट गया। आज इसके कई उपगुट हैं:
NSCN (K) - युंग औंग गुट
मौजूदा समय में यही गुट सक्रिय माना जाता है। युंग औंग को खापलांग के बाद नेतृत्व की जिम्मेदारी मिली।
NSCN (K) - निकी सुमी गुट
निकी सुमी, जो कभी NSCN (K) के सैन्य कमांडर थे, उन्होंने 2019 में अलग गुट बना लिया। 2021 में उन्होंने भारत सरकार के साथ संघर्षविराम समझौते पर हस्ताक्षर किए।
NSCN (Reformation)
यह गुट भी मूल संगठन से अलग होकर बना है।
NSCN (K) - खांगो गुट
खांगो खापलांग के भतीजे थे और एक समय इस गुट का नेतृत्व कर रहे थे। भारत सरकार ने इस गुट से भी युद्धविराम समझौता किया है।
NSCN (Neopao Konyak-Kitovi)
यह गुट दक्षिणी नागालैंड और म्यांमार की सीमावर्ती इलाकों में सक्रिय रहा है।
2015 में NSCN (K) ने मणिपुर के चंदेल जिले में भारतीय सेना के 18 जवानों की निर्मम हत्या की थी। यह घटना पूर्वोत्तर में हुई सबसे बड़ी आतंकी घटनाओं में से एक मानी जाती है। इस हमले के मुख्य आरोपी निकी सुमी थे, जिन पर राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) ने ₹10 लाख का इनाम घोषित किया था।
सरकार के साथ NSCN (K) का शांति प्रयास
भारत सरकार ने बीते वर्षों में NSCN के विभिन्न गुटों के साथ शांति समझौते किए हैं। NSCN (IM) के साथ भी बातचीत चल रही है, जबकि NSCN (NK), NSCN (R), NSCN (K) - खांगो और हाल ही में NSCN (K) - निकी सुमी ने भी संघर्षविराम समझौतों पर दस्तखत किए हैं।
NSCN (K) - युंग औंग गुट आज भी सबसे कठोर और कट्टरपंथी गुटों में गिना जाता है। यह मुख्यतः म्यांमार की सीमा के अंदर गतिविधियों को अंजाम देता है और भारत में घुसपैठ की कोशिशें करता रहता है।
पूर्वोत्तर में फिर सक्रिय हो रहा उग्रवाद?
सेना और सुरक्षा एजेंसियों को संदेह है कि यह समूह सीमा पार से भारत में घुसपैठ या पुनः संगठित होने की कोशिश कर रहा था। रक्षा सूत्रों के अनुसार, यह घटना इस बात का संकेत है कि पूर्वोत्तर में एक बार फिर उग्रवादी गतिविधियां तेज हो सकती हैं, विशेष रूप से भारत-म्यांमार सीमा क्षेत्र में जहां कई उग्रवादी गुटों के शिविर मौजूद हैं।
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