50% की सीमा जातिगत आरक्षण के लिए थी, आर्थिक के लिए नहीं : जेटली
नई दिल्ली। 2019 के लोकसभा चुनावों से पहले मोदी सरकार ने बड़ा दांव खेलते हुए सामान्य वर्ग के गरीबों के लिए सरकारी नौकरी और शिक्षा में 10 फीसदी आरक्षण के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। सरकार ने इस आदेश को मंजूरी दिलाने के लिए आज लोकसभा में संविधान संशोधन विधेयक पेश किया। इस बिल पर संसद में चर्चा की गई। बिल पर बोलते हुए वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा कि, आज तक कई सरकारें आईं जिन्होंने अनआरक्षित वर्ग को आरक्षण देने की बात कही थी लेकिन सही रास्ता नहीं अपनाया।

50 फीसदी आरक्षण का दायरा सामजिक तौर पर पिछड़े वर्गों के लिए लागू है
विपक्षी दलों द्वारा इस आरक्षण को सरकार का जुमला कहे जाने पर जेटली ने कहा कि, अनआरक्षित वर्ग को आरक्षण देने का जुमला तो विपक्षी दलों ने दिया था, क्योंकि, आर्थिक आधार पर अबतक सही से आरक्षण देने की कोशिश नहीं की गई। जेटली ने कहा कि, कांग्रेस ने 2014 के अपने घोषणापत्र में आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण का समर्थन करने की बात कही थी। जेटली ने कहा कि संविधान में 50 फीसदी आरक्षण का दायरा सामजिक तौर पर पिछड़े वर्गों के लिए लागू है, आर्थिक तौर पर पिछड़ों के लिए यह लागू नहीं है। जाति आधारित आरक्षण पर भी निजी संस्थानों में आरक्षण के लिए यही शब्दावली थी जो कि इस बिल में है।

आर्थिक तौर पर भेदभाव खत्म करने की कोशिश इस बिल के जरिए की जा रही है
जेटली ने कहा कि, आरंभ में जो संविधान बनाया गया था उसमें सेक्युलर शब्द नहीं था बाद में जोड़ा गया लेकिन उसमें दो बेहद अहम शब्द थे, 'न्याय' और 'समान अवसर उपलब्ध कराना है। पहला आरक्षण एससी-एसटी समुदाय के लिए हुआ था, ओबीसी को आरक्षण के समय काफी विवाद हुआ था। उन्होंने कहा कि सामाजिक और आर्थिक तौर पर भेदभाव खत्म करने की कोशिश इस बिल के जरिए की जा रही है।

कम्युनिस्ट इसका विरोध कर रहे हैं
उन्होंने कहा कि आज हर नागरिक को समान अवसर देने की जरूरत है। आर्थिक आधार पर आरक्षण 50 फीसदी से भी ज्यादा हो सकता है क्योंकि वह जातिगत आरक्षण से अलग है। जेटली ने कहा कि राज्यों ने भी आरक्षण देने की कोशिश की लेकिन वह सुप्रीम कोर्ट में जाकर रद्द हो गया। इसके लिए सही रास्ता नहीं अपनाया गया। उन्होंने कहा कि शिकायत करके बिल के समर्थन की जरूरत नहीं है अगर समर्थन करना ही हो तो खुले दिल से इस बिल का समर्थन करें। उन्होंने कहा कि, इतिहास में ऐसा पहली बार हो रहा है कि गरीबों को कुछ दिया जा रहा है और कम्युनिस्ट उसका विरोध कर रहे हैं।












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