Aravalli Hills News: अरावली की तबाही से खतरे में हिमालय! पहाड़ी राज्यों के लिए क्यों बढ़ रही है चिंता?
Aravalli Hills News: सुप्रीम कोर्ट ने नवंबर 2025 में अरावली पहाड़ियों को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया जिसके बाद से देश भर में #SaveAravalli का कैंपेन चलने लगा। क्रिसमस की शाम जयपुर की सड़कों पर हजारों Gen Z अरावली को बचाने के लिए उतर आए। दरअसल, अदालत कि नई परिभाषा के मुताबिक, अरावली पर्वतमाला का बड़ा हिस्सा अब अपनी प्राकृतिक ऊंचाई खो चुका है।
लगभग 90 प्रतिशत क्षेत्र 100 मीटर से कम ऊंचा रह गया है। ऐसे में 100 मीटर से नीचे की भू-आकृतियों को "पहाड़ी" की श्रेणी में शामिल नहीं किया जा सकता। यह नई परिभाषा केंद्र सरकार द्वारा गठित समिति की सिफारिशों पर आधारित है।

हालांकि, कोर्ट के इस फैसले के बाद पर्यावरण संरक्षण को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया। पर्यावरणविदों का कहना है कि इस नई परिभाषा से अरावली का 90 प्रतिशत से अधिक हिस्सा संरक्षण के दायरे से बाहर हो सकता है। दूसरी ओर, सरकार का तर्क है कि यह कोई नई व्यवस्था नहीं, बल्कि पहले से मौजूद नियमों का ही विस्तार है। अब इसी पर सारा विवाद शुरू हुआ है।
अरावली पर संकट से बदलेगी देश की जलवायु
अरावली को भारत की सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखला मानी जाती है। यह थार रेगिस्तान को पूर्व की ओर फैलने से रोकती है और उत्तर भारत की जलवायु को संतुलित रखने, भूजल संरक्षण और प्रदूषण नियंत्रण में भी अहम भूमिका निभाती है। विशेषज्ञों के अनुसार, अगर अरावली कमजोर होती है तो इसका असर सिर्फ राजस्थान, गुजरात, हरियाणा और दिल्ली-एनसीआर तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसके प्रभाव हिमालयी क्षेत्र और उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्यों तक देखने को मिल सकते हैं।
Aravalli Destruction Impact: क्या अरावली संकट से हिमालय को खतरा?
इस फैसले के बाद सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि अगर अरावली नहीं रही तो क्या हिमालय पर इसका असर पड़ेगा? क्या हिमालयी क्षेत्रों और ग्लेशियरों पर धूल जमने लगेगी? और क्या इसका असर उत्तराखंड में मानसून और बारिश के पैटर्न पर पड़ेगा? पर्यावरण विशेषज्ञों के मुताबिक, अगर अरावली क्षेत्र में खनन, वनों की कटाई और भूमि उपयोग में बदलाव बढ़ता है, तो इसके परिणाम बेहद गंभीर हो सकते हैं।
1. रेगिस्तानी धूल रोकने में अरावली की भूमिका
अरावली पर्वतमाला थार रेगिस्तान और इंडो-गंगेटिक-हिमालयी क्षेत्र के बीच एक प्राकृतिक भू-आकृतिक अवरोध यानी डस्ट बैरियर (Dust Barrier) की तरह काम करती है। इसकी ऊंचाई, चट्टानी संरचना और इस पर मौजूद जंगल हवा की गति को धीमा कर देते हैं, जिससे हवा में मौजूद धूल और रेत के कण गंगा के मैदानों में ही गिर जाते हैं और हिमालय तक सीमित मात्रा में पहुंचते हैं। अगर अरावली कमजोर हुई, तो यह धूल गंगा के मैदानों, हिमालय की तराई और उत्तराखंड के ऊंचाई वाले ग्लेशियरों तक ज्यादा मात्रा में पहुंच सकती है।
2. खनन और वनों की कटाई से क्या होगा?
अगर खनन, जंगलों की कटाई और लैंड-यूज में बदलाव के कारण अरावली पर संकट गहराता है, तो थार रेगिस्तान का विस्तार पूर्व की ओर बढ़ेगा। इससे हवा द्वारा मिट्टी का कटाव बढ़ेगा, धूल ज्यादा पैदा होगी और उत्तर भारत से लेकर हिमालय तक धूल और प्रदूषण का प्रवाह तेज हो जाएगा। जामिया मिल्लिया इस्लामिया के पीएचडी स्कॉलर कहते हैं कि, यह कोई काल्पनिक डर नहीं है, तिब्बती पठार और हिमालय तक धूल पहुंचने की प्रक्रिया पहले से ही कई वैज्ञानिक अध्ययनों में दर्ज है।
3. हिमालय तक धूल कैसे पहुंचती है?
गर्मी के मौसम में दक्षिण-दक्षिण-पश्चिम (South-South West) दिशा से चलने वाली तेज हवाएं रेगिस्तानी इलाकों से बारीक कण उठाती हैं। जैसे-जैसे ये हवाएं उत्तर भारत की ओर बढ़ती हैं, बड़े कण तो रास्ते में गिर जाते हैं, लेकिन बेहद महीन कण जैसे PM1 और PM2.5 हिमालयी क्षेत्रों तक पहुंच जाते हैं। ये हवाएं सिर्फ रेगिस्तानी धूल ही नहीं, बल्कि उद्योगों और वाहनों से निकलने वाले प्रदूषक भी अपने साथ ले जाती हैं। सैटेलाइट स्टडी पहले ही दिखा चुकी हैं कि प्री-मॉनसून महीनों में थार की धूल और मानवजनित प्रदूषण मध्य हिमालय तक पहुंचता है।
4. ग्लेशियरों पर धूल का जमाव
जब धूल और खासतौर पर ब्लैक कार्बन बर्फ और ग्लेशियरों की सतह पर जमती है, तो यह सूरज की रोशनी को ज्यादा सोखती है। इससे ग्लेशियरों का तापमान बढ़ता है और उनके पिघलने की रफ्तार तेज हो जाती है। इसका सीधा असर हिमालयी नदियों और जल संसाधनों पर पड़ सकता है। धूल कणों के जमने से तापमान में असामान्य बदलाव होता है, जिससे बर्फबारी, बारिश कहां होगी, कब होगी और कितनी होगी-इन सभी कारकों पर असर पड़ता है।
इससे ग्लेशियरों के अस्तित्व और मानसून के पैटर्न पर खतरा पैदा हो सकता है। अरावली पर मंडराते संकट ने हिमालयी राज्य उत्तराखंड को लेकर भी चिंताएं बढ़ा दी हैं। पहले से ही प्राकृतिक आपदाओं की मार झेल रहे इस राज्य में अब यह चर्चा तेज है कि अरावली संकट मानसून और बारिश के स्वरूप को प्रभावित कर सकता है, जिससे बाढ़, भूस्खलन और जल संकट जैसी समस्याएं और गंभीर हो सकती हैं।
आगे का रास्ता क्या?
विशेषज्ञों का मानना है कि नए फैसलों के साथ-साथ यह जरूरी है कि पहले से बने पर्यावरणीय नियमों और नीतियों का जमीनी स्तर पर सख्ती से पालन कराया जाए। अवैध खनन रोकना, वनों की कटाई पर नियंत्रण अरावली और उससे जुड़े पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को बचाने का सबसे प्रभावी तरीका हो सकता है।
सुप्रीम कोर्ट के इस ताजा फैसले ने अरावली को लेकर बहस को और तेज कर दिया है। यह सिर्फ एक पर्वतमाला का मुद्दा नहीं, बल्कि देश की जलवायु, जल सुरक्षा और हिमालयी क्षेत्र के भविष्य से जुड़ा एक बड़ा सवाल बन चुका है।
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