अपना दल का अल्टीमेटम: पूर्वांचल और सेंट्रल यूपी में बिगड़ सकता है बीजेपी का खेल

नई दिल्ली- भारतीय जनता पार्टी ने बिहार, महाराष्ट्र और तमिलनाडु में किसी तरह से गठबंधन का रास्ता निकाल लिया। हालांकि, महाराष्ट्र में शिवसेना के तेवर कभी गरम तो कभी नरम पड़ने का सिलसिला जारी है। उत्तर प्रदेश में भी अमित शाह से बातचीत के बाद ओमप्रकाश राजभर की सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी, बीजेपी के साथ चुनाव लड़ने के लिए तैयार हो गई है। लेकिन, अपना दल की तल्खी ने बीजेपी की चिंता बढ़ा दी। राजभर भले ही राजी हो गए हों, लेकिन अगर अपना दल ने बेगानापन दिखाया तो मौजूदा सियासी समीकरणों में भाजपा के लिए यूपी से होकर गुजरने वाला दिल्ली का रास्ता दूर हो सकता है।

अपना दल का आखिरी अल्टीमेटम

केंद्रीय मंत्री और यूपी के मिर्जापुर से अपना दल सांसद अनुप्रिया पटेल की पूर्वी यूपी की प्रभारी कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा से मुलाकात की खबरों ने बीजेपी के लिए मुश्किलें खड़ी कर दी हैं। पिछले कुछ समय से अपना दल यूपी में खुद को उपेक्षित रखने के आरोप लगाती रही है। लेकिन, अब अनुप्रिया ने खुद भी बीजेपी नेतृत्व के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। उन्होंने कहा है कि, "बीजेपी के साथ हमें कुछ समस्याएं आईं और उसको हमने शीर्ष नेतृत्व के सामने रखा भी और 20 फरवरी तक हमने उन्हें समय दिया कि इन समस्याओं का समाधान करें। लेकिन, उन्होंने इन समस्याओं का समाधान नहीं किया। इससे यही प्रतीत होता है कि बीजेपी को समस्याओं से कोई लेना देना नहीं है और समस्याओं के समाधान में कोई रूचि नहीं है, इसलिए अपना दल अब स्वतंत्र है, अपना रास्ता चुनने के लिए। हमारी पार्टी की बैठक हमने बुला ली है, पार्टी जो तय करेगी वो हम करेंगे।" कहा जा रहा है कि अगर पीएम मोदी या अमित शाह ने अभी भी कोई रास्ता नहीं निकाला, तो अनुप्रिया पटेल 28 फरवरी को बीजेपी से अलग रास्ता अख्तियार करने का ऐलान कर सकती हैं।

8 से 12 सीटों पर पड़ सकता है असर

8 से 12 सीटों पर पड़ सकता है असर

मौजूदा समय में अनुप्रिया पटेल की अपना दल उत्तर प्रदेश में कुर्मी (पटेल)जाति पर खास दबदबा रखती है। राज्य की प्रतापगढ़, फूलपुर, प्रयागराज (इलाहाबाद), गोंडा, बाराबंकी, बरेली, खीरी, धौरहरा, बस्ती, बांदा, मिर्जापुर और वाराणसी लोकसभा सीटों पर कुर्मियों का अच्छा-खासा प्रभाव है। पूर्वी और सेंट्रल यूपी की इन सीटों पर कुर्मी वोटरों की संख्या 8 से 12 प्रतिशत तक है, जो चुनाव नतीजों को मोड़ने के लिए अहम साबित हो सकते हैं। सिर्फ पटेल मतदाताओं की बात करें तो वो प्रयागराज, फूलपुर, प्रतापगढ़,बस्ती, मिर्जापुर और वाराणसी में चुनाव को प्रभावित करने की भूमिका में हैं। वर्तमान समय में अपना दल के पास दो सीटें हैं- मिर्जापुर (अनुप्रिया पटेल) और प्रतापगढ़ (कुमार हरिवंश सिंह)। इनके अलावा 9 विधानसभा सीटों पर भी उसका कब्जा है।

उपचुनाव में बीजेपी खा चुकी है गच्चा

उपचुनाव में बीजेपी खा चुकी है गच्चा

गौरतलब है कि बीजेपी को फूलपुर लोकसभा उपचुनाव में हार का सामना करना पड़ा था। कहा जा रहा है कि यूपी में योगी सरकार बनने के बाद राज्य में अनुप्रिया पटेल की उपेक्षा ने पटेल मतदाताओं को नाराज कर दिया, जिसका खामियाजा बीजेपी को भुगतना पड़ा था। तब योगी आदित्यनाथ ने केशव प्रसाद मौर्या के साथ ही प्रचार किया था और अपना दल को तबज्जो नहीं दी थी। यानि अगर अपना दल ने साथ नहीं दिया तो ऊपर की सारी सीटें बीजेपी के लिए टेंशन का कारण बन सकती हैं, जहां 2014 में उसे सौ फीसदी कामयाबी मिली थी।

काशी और हार्दिक का पेंच

काशी और हार्दिक का पेंच

वाराणसी सीट खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सीट है। अगर अपना दल ने बीजेपी का साथ नहीं दिया तो विपक्ष यहां पर मोदी को घेरने के लिए सारे दांव लगा देगा। चर्चा यहां तक है कि पाटीदार नेता हार्दिक पटेल प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ चुनाव लड़ सकते हैं। खबरें ये भी हैं कि उन्हें अखिलेश से दोस्ती का फायदा मिल सकता है और समाजवादी पार्टी उनको अपने गठबंधन का उम्मीदवार बना सकती है। कांग्रेस भी उन्हें उम्मीदवार बनाने से पीछे नहीं हटना चाहेगी और हाल के समय में उनकी कांग्रेस नेतृत्व से भी नजदीकियां बढ़ी हुई हैं। खास बात ये है कि बिहार और यूपी के कुर्मी गुजरात के पटेलों से अपना नजदीकी रिश्ता मानते हैं। यानि, अगर हार्दिक के दिमाग में वाराणसी सीट है, तो उसके पीछे पटेल वोट भी बहुत बड़ा कारण हो सकता है।

यूपी में एसपी-बीएसपी गठबंधन और कांग्रेस के अकेले चुनाव लड़ने के ऐलान के बाद बदले चुनावी समीकरणों ने बीजेपी का गणित पहले ही बिगाड़ रखा है। यूपी में बीजेपी का पूरा दारोमदार मिडिल क्लास, ऊंची जातियों और गैर-यादव पिछड़ी जातियां ही रही हैं। इसलिए वो किसी भी सूरत में अपना दल दल को बेगाना नहीं बनने देना चाहेगी। लेकिन, अगर फिर भी बात नहीं बनी तो पूर्वांचल और सेंट्रल यूपी में बीजेपी का खेल बिगड़ सकता है, जिसने 2014 में बीजेपी के लिए दिल्ली की राह आसान कर दी थी।

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