दशहरा रैली में भागवत ने क्यों छेड़ा राम राग, ये है असल वजह
नई दिल्ली। राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ और भारतीय जानता पार्टी काफी समय से अयोध्या में राम मंदिर बनाए जाने का समर्थन करते रहे हैं। भाजपा अपने चुनावी घोषणा पत्र में भी इसे शामिल करती रही है। हालांकि ऐसा देखा जाता रहा है भाजपा के सत्ता में होने पर पार्टी और उससे जुड़े संगठन अमूमन इस मुद्दे पर नरम रुख अपना लेते हैं। मोहन भागवत ने मुद्दे पर काफी आक्रामक रुख दिखाया है। दशहरा रैली में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि राम मंदिर का बनना अब जरूरी है, इसके लिए किसी भी तरह से रास्ता निकाला जाए सरकार को इसके लिए कानून बनाना चाहिए। भागवत के इस रुख के कई मायने निकलते हैं।

पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव
सुप्रीम कोर्ट में 29 अक्टूबर से राम मंदिर-बाबरी मस्जिद संपत्ति विवाद पर सुनवाई शुरू हो रही है, इससे पहले प्रमुख मोहन भागवत ने राममंदिर निर्माण को लेकर जिस तरह के तेवर दिखाए हैं, उसे इस साल के आखिर में होने वाले पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में फायदे की कोशिश के तौर पर भी देखा जा सकता है। दिसंबर में राजस्थान, तेलंगाना और मध्य प्रदेश जैसे बड़े राज्यों में चुनाव हैं।
मध्य प्रदेश और राजस्थान से काफी भारी समर्थन बीते लोकसभा और विधानसभा में भाजपा को मिला था। विश्लेषकों का मानना है कि इस भाजपा के पक्ष में बीते चुनावों जैसा माहौल नहीं है। एंटी इनकंबेसी का भाजपा को सामना करना पड़ रहा है, तो किसानों और व्यापारियों के मुद्दों पर भी पार्टी घिरी दिख रही है। ऐसे में राम मंदिर के मामले को हवा देकर दूसरे मुद्दों को पीछे करना और खुद को इस मुद्दे पर ज्यादा प्रतिबद्ध दिखाना आरएसएस और भाजपा की कोशिश हो सकती है।

लोकसभा चुनावों पर नजर
साल के आखिर में पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के शोर में अगले साल होने वाले लोकसभा की चर्चा कम है लेकिन ये हकीकत है कि राजनीतिक दलों ने लोकसभा के लिए तैयारियां शुरू कर दी हैं। भाजपा की सरकार एक तरफ महंगाई और बेरोजगारी जैसे मुद्दों पर घिरी हुई है तो वहीं राम मंदिर जैसे मुद्दों पर भी विपक्ष उसके सिर्फ राजनीति करने की बात कह रहा है। ऐसे में अभी से रुख को भाजपा के लिए किया जाए, इसलिए भागवत ने सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई से अलग इस मुद्दे पर ये आक्रामकता दिखाई है।

ढुलमुल रुख से हिंदू मतदाताओं के बीच नाराजगी
2014 में भारतीय जनता पार्टी और नरेंद्र मोदी ने काफी वादे किए थे। एक तरफ विकास की बात थी तो दूसरी तरफ हिन्दुत्व का भी सहारा रहा। भाजपा के लोग भी ये मानते हैं कि राम मंदिर जैसे मामले पर नरम रुख से हिन्दुत्व के नाम पर उनको मिलने वाला वोट छिटक सकता है। ऐसे में इस मुद्दे पर आक्रामकता, उन वोटों को रोकने की कोशिश हो सकती है जिन्होंने भाजपा को हिन्दुत्व के मुद्दे पर वोट दिया। ढुलमुल रुख से हिंदू मतदाताओं के बीच नाराजगी को कम करने की ये एक कोशिश है।

संत समाज और कट्टर हिंदू समाज को साधने की कोशिश
राम मंदिर को लेकर बीते कुछ समय से संतों के बीच से भी आवाज उठी है। हाल ही में विहिप ने संतों की एक बड़ी बैठक बुलाई और उसमें राम मंदिर के बनाए जाने को लेकर प्रस्ताव पास किए। प्रवीण तोगड़िया ने भी हाल ही में इस मुद्दे पर काफी कड़ा रुख दिखाया है। कट्टर हिंदुओं के एक तबके ने भी सरकार के नरम रुख पर आलोचना की है। ऐसे में भागवत के बयान को इन सभी को साधनने की कोशिश के तौर पर देख सकते हैं।

सरकार और कैडर को संदेश
हाल के समय में आरएसएस और भाजपा का कैडर जिन मुद्दों पर असहज दिखा है, उसमें राफेल और महंगाई जैसे मामले हैं। साथ ही किसान भी लगातार आंदोलन कर रहे हैं। वहीं हिन्दुत्व के मुद्दे पर भी वो थोड़ा बैकफुट पर ही है। भाजपा की जीत में आरएसएस कैडर की बड़ी भूमिका रहती है, उसके उत्साहपूर्वक चुनाव में ना जाने का बड़ा असर भाजपा के चुनाव परिणाम पर हो सकता है। ऐसे में अपने कैडर को भी भागवत ने संदेश दिया है कि वो आक्रामकता के साथ राम मंदिर और हिन्दुत्व के मुद्दे पर चुनाव में जाएं।












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