2019 में अमित शाह का 'मिशन 350': सपने और हकीकत में जमीन-आसमान का फर्क
नई दिल्ली। बीजेपी राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने हाल ही में अपनी पार्टी को कहा था कि हम 5 या 10 साल के लिए सत्ता में नहीं आए हैं। देश में बड़े बदलाव के लिए हमें 40 से 50 साल तक सत्ता में रहना होगा। हालांकि यह यात्रा बहुत कठिन दिखती है क्योंकि जहां हर पांच साल बाद वोटर बदलते हैं और 50 सालों में तो ना जाने कितनी राजनीतिक पार्टियां बदलेगी और बनेगी। फिलहाल, बीजेपी अध्यक्ष ने 2019 लोकसभा चुनाव के लिए 'मिशन 350' रखा है। इसके लिए अमित शाह ने पार्टी के मंत्रियों और वरिष्ठ नेताओं को जिम्मेदारी सौंपनी भी शुरू कर दी है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि बीजेपी ने पिछले तीन सालों से देश के राज्य चुनावों में जीत दर्ज की है लेकिन 2019 के जनरल इलेक्शन के लिए पार्टी का टारगेट 350 का सपना और हकीकत दोनों में फर्क दिखाई देता है। क्योंकि कई ऐसे कारक है जो बीजेपी के लिए आने वाले टाइम में बाधा बनेंगे।

पार्टी से भी ज्यादा अमित शाह पर जिम्मेदारी
इसमें कोई दो राय नहीं है कि जब से नरेंद्र मोदी पीएम बनें हैं, तभी से बीजेपी ने देश के कई राज्यों में अपने जीत प्रतिशत को बढ़ाया ही है। देश के 18 राज्यों में बीजेपी का परचम है, इनमें से 14 राज्य तो पूरी तरह से केसरिया रंग में रंगे हुए हैं। वहीं, 100 मिलियन मेंबर के साथ बीजेपी दूनिया की सबसे बड़ी पार्टी होने का भी दावा करती है। बिहार को छोड़ दे तो अब तक देखा गया है कि अमित शाह ने जो भी टारगेट रखा था, उसमें वे काफी हद तक कामयाब भी रहे हैं। 2019 का जनरल इलेक्शन 2014 से बिल्कुल अलग है, जिसमें शाह की चुनौतियां अलग होने के साथ-साथ कई गुना बढ़ेगी भी। पिछले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस एंटी इन्कबैंसी का शिकार हुई थी लेकिन अगले लोकसभा चुनाव में जनता को किए वादों का पार्टी अध्यक्ष को जवाब देना होगा। चुनाव में विरोधियों को हराने से भी बड़ा काम है कि जनता को अपनी आलोचना का शिकार नहीं होने देने और एंटी इन्कबैंसी से बचकर लोकतांत्रिक ढंग से सत्ता में काबिज होना। निश्चित रूप से इस बार के इलेक्शन में 52 वर्षीय शाह के लिए चुनौतियां और जिम्मेदारियां बहुत अलग होने वाली है।

मिशन 350 इम्पॉसिबल?
2019 इलेक्शन में 350 के जादुई आंकड़े को छूना इतना आसान नहीं है। हालांकि, मोदी के सत्ता में आने के बाद उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में बीजेपी और उनकी गठबंधन पार्टियों ने अभूतपूर्व जीत हासिल की है लेकिन उड़ीसा, पश्चिम बंगाल समेत दक्षिण के राज्यों मे बीजेपी अभी भी कुछ खास नहीं कर पाई है। अभी तक बीजेपी एंटी इन्कबैंसी का शिकार नहीं हुई है लेकिन मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ, हरियाणा और यूपी में जीत के लिए जो जनता को वादे किए थे, उसका प्रभाव आने वाले जनरल इलेक्शन में जरूर देखा जाएगा।

मुस्लिम कार्ड
पिछले जनरल इलेक्शन में ना सिर्फ उत्तर प्रदेश में बल्कि कई राज्यों के मुसलमानों ने बीजेपी को वोट दिया था। इस बार 2014 की तुलना में मुस्लिम वोट शेयर बीजेपी के लिए मुश्किलें खड़ी कर रहा है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि केंद्र और कई राज्यो में बीजेपी की सरकार बनने के बाद गाय और बीफ के नाम पर हमले, यूनिफॉर्म सिविल कोड और यूपी में योगी आदित्यनाथ को सीएम बनाना, इन तमाम घटनाओं ने 2019 के इलेक्शन में बीजेपी के लिए मुस्लिम वोट के कम होने का खतरा मंडरा रहा है।

कम्युनल सांप्रदायिक कार्ड
इतनी परेशानियों के बाद भी शाह को पूरा विश्वास है कि वे 350 का आंकड़ा छू लेंगे। बिहार विधानसभा चुनाव हारने के बाद जद(यू) से गठबंधन करना अमित शाह की बहुत बड़ी रणनीति कामयाब हुई है। अब उनकी नजर उन 40 सीटों पर है जो बिहार से चुनकर दिल्ली आते हैं। वहीं, केरल, उड़िसा, पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में बीजेपी अभी तक नाकाम साबित हुई है और इसमें कोई दो राय नहीं कि ज्यों ज्यों चुनाव का वक्त नजदीक आएगा राजनीतिक पार्टियां सांप्रदायिक कार्ड खेलना शुरू करेगी। केरल और पश्चिम बंगाल में तो राजनीतिक पार्टियों का सांप्रदायिक कार्ड खेलना अभी से ही शुरू हो गया है। वहीं, तमिलनाडु जैसे बड़े राज्य में शाह की रणनीति अभी तक नहीं दिख पाई है। वर्तमान में जिस तरह से सत्ताधारी एआईएडीएमके अपने आंतरिक कलह से जूझ रही है और डीएमके अगले ताजा चुनाव में सत्ता पर कब्जा पर करने के लिए पूरी तरह से तैयार बैठी है। इससे साबित होता है कि तमिलनाडु में बीजेपी की हवा बनने में अभी बहुत समय लगेगा।












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