अमित शाह जहां नजर दौड़ाते हैं, विकेट गिरने की झड़ी लगती है, ये रहे सबूत

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नई दिल्ली। भारतीय जनता पार्टी की कमान संभालने के बाद अमित शाह ने जिस तरह से देशभर के राज्यों का दौरा शुरू किया और पार्टी को जमीनी स्तर पर पर मजबूत करने का काम शुरू किया उसके बाद तमाम राजनीतिक दलों के हाथ पैर को फूल गए। शाह को भाजपा सबसे बड़ा रणनीतिकार माना जाता है, जिस तरह से एक के बाद एक तमाम राज्यों में उनकी रणनीति के दम पर भाजपा ने जीत दर्ज की उसका लोहा उनके प्रतिद्वंदी भी मानते हैं। लेकिन इससे इतर शाह इस के लिए भी जाने जाते हैं कि जिस भी राज्य में पार्टी की स्थिति कमजोर है वहां शाह के कदम पड़ते ही राज्य में विपक्षी दलों के भीतर तोड़फोड़ शुरू हो जाती है। 

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संयोग या सियासी दांवपेंच

संयोग या सियासी दांवपेंच

आलम यह है कि अमित शाह जिस भी राज्य का रुख करते हैं और उसपर नजर डालते हैं वहा अन्य दलों में फूट पड़ जाती है, तमाम विधायक बगावती तेवर दिखाना शुरू कर देते हैं और वह भाजपा का दामन थाम लेते हैं। ऐसे कई उदाहरण हैं जो इस कथन की पुष्टि भी करते हैं, अब इसे महज संयोग कहें या फिर शाह की कूटनीति यह आप पर निर्भर करता है।

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कांग्रेस मुक्त भारत अभियान

कांग्रेस मुक्त भारत अभियान

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब लोकसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस मुक्त भारत का नारा दिया तो उस नारे को आगे बढ़ाते हुए अमित शाह ने अपनी रणनीति बनानी शूरू कर दी और एक के बाद भाजपा का विजय रथ आगे बढ़ने लगा। हालात यह हैं कि जिन राज्यों में भाजपा ने जीत दर्ज की वहां तो सरकार बनाई है साथ ही जिन राज्यों में उसे हार का सामना करना पड़ा वहां भी पार्टी ने तोड़फोड़ करके अपनी सरकार बना ली।

 बिहार में टूटा महागठबंधन

बिहार में टूटा महागठबंधन

बिहार में जिस तरह से भाजपा को महागठबंधन के सामने हार का सामना करना पड़ा था उसके बाद पार्टी कटघरे में खड़ी हो गई थी, यहां तक कि पीएम मोदी की लोकप्रियता पर भी सवाल खड़े हो गए थे। 17 साल पुराने सहयोगी नीतीश कुमार ने भाजपा से अपना दामन छुड़ा लिया था। लेकिन मोदी-शाह की रणनीति के आगे बिहार में महागठबंधन की सरकार अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सकी और महज दो साल के भीतर महागठबंधन का किला ढह गया और भाजपा ने एक बार फिर से जदयू के साथ मिलकर यहां सरकार बना ली।

 गुजरात कांग्रेस में सेंधमारी

गुजरात कांग्रेस में सेंधमारी

वहीं अगर गुजरात पर नजर डालें तो यहां भाजपा का एकछत्र अधिकार है और लगातार तीन बार से भाजपा यहां चुनाव जीतती आई है। पीएम मोदी के गृह क्षेत्र में जिस तरह से पटेल आंदोलन के बाद भाजपा मुसीबत में नजर आ रही थी, उसके बीच यहां भी शाह ने अपना सियासी गणित शुरू किया। जिसके बाद पहले यहां शंकर सिंह बाघेला ने कांग्रेस का दामन छोड़ा और उसके बाद एक के बाद एक विधायकों के टूटने का सिलसिला शुरू हो गया। हालात इतने बदतर हो गए कि कांग्रेस को अपने विधायकों को टूटने से बचाने के लिए बेंगलुरू भेजना पड़ गया।

 यूपी में भी विधायकों के टूटने का सिलसिला शुरू

यूपी में भी विधायकों के टूटने का सिलसिला शुरू

गुजरात में सियासी दांव के बाद अब बारी थी उत्तर प्रदेश की। दरअसल यहां मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्या लोकसभा सांसद हैं और उन्हें छह महीने के भीतर यूपी के किसी एक सदन का सदस्य होना अनिवार्य है। इसके अलावा उपमुख्यमंत्री दिनेश शर्मा को भी किसी एक सदन में भेजना होगा। लिहाजा पार्टी इन नेताओं को चुनावी मैदान में भेजने के बजाए विधान परिषद के रास्ते सदन में भेजने की कोशिश कर रही है, ऐसे में विधान परिषद में सीट का खाली होना जरूरी है, लिहाजा माना जा रहा है कि इसी कड़ी में सपा और बसपा के विधायकों ने इस्तीफा दिया है।

गोवा में हार के बाद भी बनाई सरकार

गोवा में हार के बाद भी बनाई सरकार

गोवा, मणिपुर, पंजाब, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में चुनाव के बाद पार्टी को यूपी, उत्तराखंड पूर्ण बहुमत हासिल हुआ था, जबकि पंजाब में भाजपा को हार का मुंह देखना पड़ा था। ऐसे में पार्टी का स्कोर 2-3 रहा। लेकिन इस स्कोर को बदलने की कवायद शुरू हो चुकी थी। गोवा में 40 सदस्यों वाली विधानसभा में भाजपा को सिर्फ 12 सीट हासिल हुई थी, जबकि कांग्रेस को 16 सीटों पर जीत दर्ज हुई थी। बावजूद इसके भाजपा यहां अन्य छोटे दलों को अपने साथ लाने में सफल रही और मनोहर पर्रिकर रक्षा मंत्रालय छोड़ यहां सीएम की कुर्सी संभालने पहुंचे।

मणिपुर में भी भाजपा का परचम

मणिपुर में भी भाजपा का परचम

जो कुछ गोवा में हुआ वहीं एक मणिपुर में भी देखने को मिला। मणिपुर में विधानसभा में कुल 60 सीटे हैं जिसमें से भाजपा को 21 सीटों पर जीत हासिल हुई थी, लेकिन पार्टी 11 अन्य विधायकों को अपने साथ लाने में सफल हुई और प्रदेश में एक बार फिर से बेहतर प्रदर्शन करने के बावजूद कांग्रेस को सत्ता से बाहर बैठना पड़ा।

बहरहाल आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या देश के अन्य राज्यों में भी विपक्षी दलों का यह हाल जारी रहेगा या फिर विपक्षी दल शाह के सियासी दांवपेंच से उबर पाएंगे।

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English summary
Amit Shah proved to be the biggest threat to the opposition in India. He has managed to destroy the opposition in almost every state.
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