कैप्टन मोदी की रिकॉर्ड जीत के 'मैन ऑफ द मैच' अमित शाह हैं
नई दिल्ली- अमित शाह (Amit Shah) जब गांधीनगर (Gandhinagar) सीट से नामांकन दाखिल करने की योजना बना रहे थे, तब उनका इरादा सिर्फ 11 समर्थकों के साथ रिटर्निंग ऑफिसर के दफ्तर पहुंचने का था। लेकिन, मोदी के दौर की बीजेपी (BJP) में उनकी क्या अहमियत है, इसका अंदाजा इसी से लगता है कि पार्टी की सहयोगी शिरोमणि अकाली दल (SAD) के पितामह 91 साल के प्रकाश सिंह बादल ने उनको फोन करके उन्हें ऐसा करने से मना करने की कोशिश की। बुजुर्ग बादल का प्रस्ताव था कि शाह के नामांकन में एनडीए (NDA) के तमाम नेता मौजूद रहें, जिससे कि गठबंधन की ताकत का पता चल सके। लेकिन, 54 वर्षीय बीजेपी अध्यक्ष अपने नामांकन को इतना बड़ा इवेंट बनाने के लिए मन से तैयार नहीं हो पा रहे थे। बाद में बादल ने नरेंद्र मोदी से कहवाकर शाह को इसके लिए तैयार किया और इसलिए उनके नामांकन वाले रोड शो में गृहमंत्री राजनाथ सिंह और वित्त मंत्री अरुण जेटली भी शामिल हुए। अब यह समझने की कोशिश करते हैं कि 2019 में मोदी के प्रचंड लहर में बीजेपी को जो रिकॉर्ड जीत मिली है, उसमें अमित शाह का रोल कितना बड़ा रहा है।

ऐसी है शाह की राजनीतिक इच्छाशक्ति
हिंदुस्तान टाइम्स की एक खबर के मुताबिक अमित शाह (Amit Shah) खुद कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को अमेठी सीट पर चुनौती देना चाहते थे। उन्होंने बीजेपी इलेक्शन कमिटी से कहा था कि उन्हें इसकी इजाजत मिले और उन्होंने पार्टी को भरोसा दिलाने की कोशिश की थी कि वे राहुल को वहां कड़ी टक्कर देंगे। लेकिन, बीजेपी के पूर्व अध्यक्ष और गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने उन्हें समझाया कि उनके लिए गांधीनगर (Gandhinagar)जैसी सेफ सीट से चुनाव लड़ना बेहतर होगा, ताकि वे अपना कीमती समय उन सीटों पर दे सकें, जहां उनकी ज्यादा जरूरत है। शाह के राजनीतिक हौसले की यह एक बानगी भर है।

मोदी की तरह ही मेहनत करते हैं शाह
अमित शाह की सबसे बड़ी ताकत उनकी राजनीतिक निपुणता है, जिसमें लगातार काम करते रहने की उनकी क्षमता से बहुत ही मदद मिलती है। पार्टी के अंदर इस मामले में उनसे आगे सिर्फ नरेंद्र मोदी ही माने जाते हैं। उदाहरण के लिए इस चुनाव में नरेंद्र मोदी को रिकॉर्ड जीत दिलाने के लिए उन्होंने कितनी कड़ी मेहनत की उसकी कुछ बानगी पर नजर डाल लेना जरूरी है। 14 मई की बात है, वे शाम 6 बजे से कोलकाता के उस रोड शो मे शामिल होते हैं, जिसमे आगे चलकर हिंसा भड़कती है। लेकिन, फिर भी उन्होंने अपना कार्यक्रम नहीं बदला। उसी शाम 8.30 बजे उन्होंने राजरहाट में बुद्धिजीवियों की एक सभा को संबोधित किया और फिर कुछ इंटरव्यू भी दिए। देर रात चार्टर्ड फ्लाइट से वाराणसी पहुंचे और वहां अमेठी हाउस में रेल मंत्री पीयूष गोयल के साथ बैठक की। शाह इतने पर भी रुके नहीं और सुबह 6 बजे दिल्ली पहुंच गए। उन्हें दिल्ली इसलिए आना पड़ा, क्योंकि कोलकाता में रोड शो के दौरान हिंसा को लेकर उन्हें 10 बजे प्रेस कांफ्रेंस को संबोधित करना था। यह काम खत्म करके वे फिर उत्तर प्रदेश लौट गए और उन्होंने रोजाना की तरह तय कार्यक्रम के मुताबिक एक दिन में 5 रैलियों को संबोधित भी किया।

यूं ही नहीं मोदी के चाणक्य कहलाते हैं शाह
करीब 10 दिन पहले शाह ने एक अनौपचारिक बातचीत में बताया था कि उनकी पार्टी में भी कुछ लोगों को लगता है कि पश्चिम बंगाल में बीजेपी के लिए 23 सीटें जीतने की सोचना और यूपी में करीब 63 सीटों का इरादा रखना बावलापन है। लेकिन, 23 मई को जब रुझान आने लगे तो, तय हो गया कि शाह का अनुमान हवा में नहीं था। उन्होंने पार्टी की जमीनी स्तर पर जो जमीन तैयार की थी, उसी आधार पर वो अपना विश्वास जता रहे थे। दरअसल, 2014 में ही मोदी और शाह को पता था कि उन्हें हिंदी हार्टलैंड में जिस तरीके की कामयाबी मिली है, उसे 2019 में भी बरकरार रखना आसान नहीं होगा। इसलिए उन्होंने तभी से पूर्वी भारत पर फोकस करना शुरू कर दिया था। 2 अक्टूबर, 2014 के बर्दवान ब्लास्ट ने बांग्लादेशी जमायत-उल-मुजाहिदीन के बहाने शाह को टीएमसी को निशाने पर लेने का मौका दे दिया। आगे टीएमसी पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों ने उन्हें वहां बीजेपी के लिए और बेहतर जमीन तैयार करने का अवसर दिया। इसके बाद उन्होंने जैसे हिमंता बिस्वा शर्मा को नॉर्थ-ईस्ट में पार्टी के काम पर लगाया था, बंगाल में कैलाश विजयवर्गीय और सिद्धार्थ नाथ सिंह जैसे नेताओं को जुटाया। बाद में हिमंता बिस्वा शर्मा को भी उन्होंने बंगाल बुला लिया। इसके अलावा राज्यसभा सांसद स्वपन दासगुप्ता और अनिर्बन गांगुली जैसे बुद्धिजीवियों ने भी उनकी काफी मदद की और आखिरकार उनकी यह स्ट्रैटजी काम कर गई। हाल ही में शाह ने टीएमसी सुप्रीमो ममता बनर्जी को तंज भरे अंदाज में कहा भी था कि दीदी उनसे उम्र में बड़ी जरूर हैं, लेकिन चुनाव लड़ने का अनुभव उनके पास ज्यादा है।

यूपी से नहीं हटी शाह की नजर
मोदी-शाह की जोड़ी ने पूर्वोत्तर और पूर्वी भारत में अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी, लेकिन उत्तर प्रदेश को उन्होंने नजरअंदाज करने की कोई गलती नहीं की। उन्हें पता था कि राज्य की एक-एक सीट उनके लिए इस बार कितनी अहम हैं। इन दोनों नेताओं का यूपी पर किस कदर फोकस रहा, इसकी कहानी वाराणसी के लाल बहादुर शास्त्री एयरपोर्ट पर तैनात कर्मचारी बता सकते हैं। यहां शाह के आने-जाने का सिलसिला लगातार चलता रहता था। जिस फाल्कन चार्टर जेट का इस्तेमाल शाह करते रहे, वह रनवे पर अक्सर दिखाई दे जाते थे। इसी तरह पीएम मोदी ने भी यूपी में हमेशा अपना फोकस बनाए रखा। आज ये हकीकत है कि सपा-बसपा (SP-BSP) के चैलेंज के बावजूद भाजपा ने उन्हें बहुत कम सीटों पर रोक दिया है और खुद 60 सीट के आसपास पहुंचती दिख रही है। शाह पर मोदी का भरोसा ही था कि वे वाराणसी में रोड शो करने के बाद और नामांकन में एनडीए के सभी नेताओं को जुटाने के बाद अपना पूरा कैंपेन उनपर और वहां के कार्यकर्ताओं के भरोसे छोड़कर देश और यूपी के बाकी हिस्सों में कैंपेन के लिए चले गए; और काशी के मतदाताओं ने एक बार फिर से उन्हें साढ़े तीन लाख से भी ज्यादा वोटों से जिताकर लगातार दूसरी बार प्रधानमंत्री का ताज सौंप दिया है।












Click it and Unblock the Notifications