भारत और फ्रांस के बीच रफाल जेट डील के बारे में ये बातें जानते हैं आप?
नई दिल्ली। भारत और फ्रांस के बीच 36 रफाल फाइटर जेट की डील आखिरकार अब अंतिम पड़ाव पर पहुंच चुकी हैं। फ्रांस से एक टीम दिल्ली पहुंच चुकी है और जल्द ही दोनों देश इन जेट्स की खरीद के लिए एक कांट्रैक्ट साइन करेंगे।

आईएएफ के लिए खास है रफाल डील
सूत्रों का कहना है कि भारत और फ्रांस के बीच डील को लेकर रजामंदी हो चुकी है। यूरो 7.87 बिलियन की यह डील इंडियन एयरफोर्स (आईएएफ)के लिए काफी अहम होने वाली है।
सरकार से जुड़े सूत्रों की मानें तो डील से जुड़ी कीमत, ऑफसेट और इसकी सर्विस डिटेल्स को पूरा कर लिया गया है। अब डील से जुड़े अंतर-सरकारी समझौते पर काम चल रहा है।
अब जब यह डील फाइनल होने की कगार पर है तो ऐसे में इस डील से जुड़ी कुछ खास बातें हैं जिन्हें जानना काफी अहम है।
एमएमआरसीए का हिस्सा
फ्रांस के साथ हुई रफाल डील उस मीडियम मल्टी-रोल कॉम्बेट एयरक्राफ्ट (एमएमआरसीए) कार्यक्रम का हिस्सा है जिसे रक्षा मंत्रालय की ओर से इंडियन एयरफोर्स (आईएएफ) लाइट कॉम्बेट एयरक्राफ्ट और सुखोई के बीच मौजूद अंतर को खत्म करने के मकसद से शुरू किया गया था।
रक्षा मंत्रालय की ओर से इसके लिए करीब 55,000 करोड़ रुपए यानी 8.2 बिलियन डॉलर की रकम सुनिश्चित की गई थी।
छह जेट्स के बीच था कॉम्पटीशन
एमएमआरसीए के कॉम्पटीशन में अमेरिका के बोइंग एफ/ए-18ई/एफ सुपर हॉरनेट, फ्रांस का डसॉल्ट रफाल, ब्रिटेन का यूरोफाइटर, अमेरिका का लॉकहीड मार्टिन एफ-16 फाल्कन, रूस का मिखोयान मिग-35 और स्वीडन का साब जैस 39 ग्रिपेन जैसे एयरक्राफ्ट शामिल थे।
27 अप्रैल 2011 को आईएएफ की ओर से तकनीकी समीक्षा के बाद कॉम्पटीशन दो फाइटर जेट्स के बीच था-यूरोफाइटर टायफून और डासॉल्ट राफल। 31 जनवरी 2012 को रफाल ने यह कॉम्पटीशन जीता। वर्ष 2014 में खबर आई थी कि डील करीब 28 से 30 बिलियन डॉलर के बीच बताई गई थी।
क्यों चुना रफाल को
छह फाइटर जेट्स के बीच अगर आईएएफ ने रफाल को चुना तो इसकी भी एक वजह थी। आईएएफ की ओर से सारे फाइटर जेट्स का परीक्षण किया गया था। रफाल के लिए जो कीमत तय की गई बाकी जेट्स की तुलना में काफी कम थी।
इसके अलावा इसका रखरखाव भी काफी सस्ता था।
वर्ष 2001 से चालू थी प्रक्रिया
आईएएफ ने वर्ष 2001 में अतिरिक्त जेट्स को खरीदने की मांग की थी। वर्तमान समय में आईएएफ के पास या तो हल्के कॉम्बेट जेट्स हैं या फिर बहुत भारी। रक्षा मंत्रालय ने तब तय किया मध्यम भार वाले फाइटर जेट्स को आईएएफ के लिए लाया जाएगा।
यह ख्याल भले ही वर्ष 2001 में आया हो लेकिन वास्तविक प्रक्रिया वर्ष 2007 में शुरू हो सकी। रक्षा अधिग्रहण परिषद जिसके मुखिया उस समय रक्षा मंत्री एके एंटोनी थे, उन्होंने 126 एयरक्राफ्ट की खरीद को अगस्त 2007 में मंजूरी दी थी। यहां से ही बोली लगने की प्रक्रिया शुरू हुई।
कितने रफाल भारत खरीदेगा
शुरुआत में यह डील करीब 54,000 करोड़ यानी 10.2 बिलियन डॉलर की थी और योजना करीब 126 एयरक्राफ्ट खरीदने की थी।
इनमें से 18 को उड़ने लायक हाल में खरीदना था और बाकी का निर्माण हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड में टेक्नोलॉजी ट्रांसफर के तहत किया जाना था।
पहले 126 रफाल खरीदने का ख्वाहिशमंद भारत 36 एयरक्राफ्ट पर राजी हुआ और सारे जेट्स सभी साजो-सामान से लैस होंगे।
जनवरी में साइन हुआ समझौता
रफाल के कांट्रैक्ट हासिल करने के बाद भारतीय पक्ष और डासॉल्ट के बीच वर्ष 2012 में सौदेबाजी शुरू हुई। करीब चार वर्षों तक यह सौदेबाजी जारी रही और इस वर्ष जनवरी में यह समझौता साइन हो सका।
क्यों हुई इतनी देरी
भारत और फ्रांस दोनों ही देशों में कांट्रैक्ट के बाद सौदेबाजी के बीच ही राष्ट्रीय चुनाव हुए। खरीद के समझौते पर रजामंद होने के बाद भी दोनों पक्ष कीमतों को लेकर राजी नहीं हो पा रहे थे।
सूत्रों के मुताबिक एक एयरक्राफ्ट की कीमत 740 करोड़ रुपए थी लेकिन भारत इससे 20 प्रतिशत कम कीमत पर एयरक्राफ्ट चाहता था।
डील की अहमियत
फ्रांस-फ्रेंच जेट रफाल इस समय इजिप्ट और कतर की एयरफोर्स प्रयोग कर रही हैं। कंपनी को उम्मीद है कि भारत के साथ रफाल की डील कंपनी के राजस्व घाटे को पूरा कर सकती है।
भारत पहला ऐसा देश है जिसने लीबिया पर हुए हवाई हमलों के बाद रफाल की खरीद को मंजूरी दी थी। फ्रांस का मानना है कि अगर भारत रफाल जेट को अपनी सेना में शामिल करता है तो दूसरे देश भी इसे खरीदने की इच्छा जताएंगे।
भारत-भारत ने अपने पुराने साथी रूस को नजरअंदाज कर फ्रांस को चुना था। सिर्फ इतना ही नहीं तेजी से रक्षा के क्षेत्र में मजबूत साथी बनते अमेरिका को भी भारत ने ज्यादा तवज्जो नहीं दी थी।
भारत केा पिछले कई वर्षों से आईएएफ के लिए फाइटर जेट की तलाश थी। जेट की खरीद में हो रही देरी हालात को बिगाड़ती जा रही थी। इस डील पर आने वाले कई रक्षा सौदों का भविष्य भी टिका है।












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