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Ahir Regiment: क्यों उठ रही है अहीर रेजिमेंट की मांग, जानिए क्या है इतिहास

आखिर क्या है अहीर रेजिमेंट की मांग के पीछे का इतिहास, जानिए कब सामने आई थी पहली बार इसकी मांग। क्यों 1962 के युद्ध को अहिरों के शौर्य से जोड़कर देखा जाता है

ahir regiment

Ahir Regiment: भारतीय सेना में अहीर रेजीमेंट की मांग काफी लंबे समय से की जा रही है। एक बार फिर से इस मांग को आजमगढ़ से भारतीय जनता पार्टी के सांसद और भोजपुरी एक्टर निरहुआ ने उठाकर इसे चर्चा में ला दिया है। निरहुआ ने 1962 के युद्ध में अहिरों के शौर्य और बहादुरी को याद करते हुए इस सेना में अहीर रेजिमेंट की मांग को आगे बढ़ाया है। अहीर रेजिमेंट की बात करें तो अहीर रेजिमेंट की मांग के इतिहास पर नजर डालें तो अहिरवाल क्षेत्र के जवानों ने सेना में अपना काफी योगदान दिया है। अहरिवाल क्षेत्र दक्षिणी हरियाणा के जिले रिवाड़ी, महेंद्रगढ़, गुरुग्राम में आता है, इसका खास संबंध राव तुला राम से है, जिन्होंने 1957 की क्रांति में अपने शौर्य का परिचय दिया था। इसी क्षेत्र से अहीर रेजिमेंट की सबसे पहले मांग उठी थी, जिसके बाद इस मांग को अहीर आबादी वाले क्षेत्रों ने आगे बढ़ाया।

1962 के युद्ध में योगदान
जिस तरह से 1962 के युद्ध में अहीर सैनिकों ने रेजंग ला में अपना शौर्य दिखाया उसे कोई नहीं भूल सकता है। इस कंपनी के अधिकतर जवान 13वीं बटालियन में अहीर थे, जिन्होंने चीनी सैनिकों का डटकर सामना किया। अहीर समुदाय के सदस्य लंबे समय से यह मांग कर रहे हैं कि सेना में एक अलग अहीर रेजिमेंट होनी चाहिए। 1962 युद्ध के 50 वर्ष पूरे होने के मौके पर 2012 में एक बार फिर से इस मांग को आगे बढ़ाया गया। कई राजनीतिक दलों ने भी इस मांग को आगे बढ़ाते हुए इसे बल दिया।

कैसे शुरू हुई अहीर रेजिमेंट की मांग
अहीर जवानों को अलग-अलग रेजिमेंट में भर्ती किया जाता है। उन्हें कुमायूं, जाट, राजपूत और अन्य रेजिमेंट में अलग-अलग जाति के जवानों के साथ भर्ती किया जाता है। उन्हें ब्रिगेड ऑफ गार्ड, पैराशूट रेजिमेंट, आर्मी सर्विस कॉर्प, आर्टिलरी इंजीनियर, सिग्नल्स में भर्ती किया जाता है। अहिरों को शुरुआत में 19वें हैदराबाद रेजिमेंट में भर्ती किया गया। इस रेजिमेंट में पहले यूपी के राजपूतों और दक्षिण के मुसलमानों व अन्य जाति के लोगों को भर्ती किया जाता था। वर्ष 1902 में निजामों से जुड़ी रेजिमेंट को ब्रिटिश बेस के तौर पर स्थायी रूप से बनाया गया। 1922 में 19 हैदराबाद रेजिमेंट को बदलकर डेक्कन मुस्लिम में तब्दील किया गया। 1930 में इसमे कुमांयूनी, जाट, अहिर और अन्य जाति के लोगों को शामिल किया गया।

क्यूं याद किया जाता है 1962 का युद्ध
1945 में इस रेजिमेंट का नाम 19कुमांयू कर दिया गया, जिसने रेजांग ला युद्ध में ख्याति प्राप्त की। कुमांयू रेजिमेंट में अहिर बटालियन को स्थापित किया गया। 13कुमांयू की अहीर रेजिमेंट ने रेजांग लॉ युद्ध में लद्धाख में चीनी हमले का डटकर सामना किया। 120 अहिर जवानों ने आखिरी दम तक युद्ध किया और जबतक एक भी जवान जिंदा रहा उसने हार नहीं मानी। यह युद्ध 18 नवंबर 1962 को 17000 फीट की ऊंचाई पर लड़ा गया। मेजर शैतान सिंह की अगुवाई में जवानों ने चीन को खूब छकाया। 117 में से 114 जवान इस ट्रूप में अहीर थे, जिसमे से सिर्फ 3 जवान ही जिंदा बचे थे, उन्हें भी गंभीर चोट लगी थी। यह अहिर ट्रूप हरियाणा की रेवाड़ी-महेंद्रगढ़ से जुड़ी थी। सर्दियां खत्म होने के बाद शहीद जवानों के शव को वापस लाया गया, कई जवानों के हाथ में हथियार आखिरी समय में थे। इन जवानों के कारतूस खत्म हो गए थे, लेकिन उन्होंने अपने हथियार नहीं छोड़े थे। मेजर शैतान सिंह को मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया था। 8 जवानों को वीर चक्र और कई अन्य को सेना मेडल से सम्मानित किया गया था।

अलग-अलग राजनीतिक दलों ने मांग को आगे बढ़ाया
वर्ष 2018 में केंद्रीय मंत्री राव इंद्रजीत सिंह ने तत्कालीन रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण को पत्र लिखकर अहीर रेजिमेंट की मांग को आगे किया था। इसी साल 15 मार्च को कांग्रेस सांसद दीपेंदर सिंह हुडा ने राज्यसभा में यदुवंशी शौर्य का जिक्र किया था। इसके पहले 11 फरवरी को बसपा सांसद श्याम सिंह यादव ने भी अहीर रेजिमेंट की मांग को आगे बढ़ाया था। बिहार में लालू प्रसाद की बेटी राज लक्ष्मी यादव ने इस मांग को 2020 में विधानसभा चुनाव में उठाया था। सपा ने 2019 के लोकसभा चुनाव में अपने घोषणापत्र में अहीर रेजिमेंट का वादा किया था।

क्या कहना है सेना का
वहीं अहीर रेजिमेंट की मांग को लेकर सेना के रवैये की बात करें तो सेना ने किसी भी नए रेजिमेंट की मांग को खारिज कर दिया है। सेना की ओर से कहा गया है कि पहले से बनी हुई रेजिमेंट डोगरा, सिख, राजपूत, पंजाब रेजिमेंट ही रहेंगी, किसी भी नई रेजिमेंट जैसे अहिर, हिमाचल, कलिंग, गुजरात, आदिवासी रेजिमेंट को नहीं बनाया जाएगा। लेफ्टिनेंट जनरल आरएस कादयान (रिटायर्ड) जोकि पूर्व डिप्टी आर्मी चीफ ऑफ स्टाफ हैं उनका कहना है कि सेना मौजूदा तौर पर बेहतर काम कर रही है, लिहाजा अब नई रेजिमेंट को बनाने की जरूरत नहीं है।

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