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वायु प्रदूषण का अंजाम- यूपी, दिल्ली में रहने वालों की औसत आयु 9 वर्ष तक घटी

जब-जब वायु प्रदूषण की बात आती है, तब-तब दिल्ली में स्मॉग की वो तस्वीरें ज़हन में आ जाती हैं, जो हर साल जाड़े के मौसम में खींची जाती हैं। और तो और आईआईटी कानपुर ने एक रिसर्च में पाया कि दिल्ली में प्रदूषण केवल दिल्ली की वजह से नहीं है, उसमें पड़ोसी राज्यों का भी खासा योगदान है, खास तौर से यूपी का। रिसर्च में पाया गया कि मुरादाबाद, मेरठ, बुलंदशहर की इंडस्ट्र‍ियल बेल्ट से उड़ने वाले घातक कण दिल्ली की हवा में आ कर घुल जाते हैं। जाहिर सी बात है, जब दिल्‍ली में घातक कण पाये जा रहे हैं, तो यूपी में तो उसका कंसंट्रेशन अधिक ही होगा। इन दो राज्यों में वायु प्रदूषण इतना बढ़ गया है कि 2019 में एकत्र किए गए डाटा से होश उड़ा देने वाली बात सामने आयी है। वो यह कि इन दोनों राज्‍यों में औसत आयु करीब 9 वर्ष तक घट गई है।

Delhi Pollution

अमेरिका की यूनविर्सिटी ऑफ शिकागो के एनर्जी पॉलिसी इंस्‍ट‍िट्यूट ने पॉल्‍यूशन एंड लाइफ इंडेक्स पर एक ग्लोबल रिपोर्ट तैयार की है, जिसमें भारत के डाटा को भी शामिल किया गया है। यह बात उसी रिपोर्ट में कही गई है। रिपोर्ट के अनुसार दक्षिण एशिया वायु प्रदूषण से सबसे ज्‍यादा जूझ रहा है। 2019 में जुटाए गए आंकड़ों के अनुसार भारत के शहरों की हवा में पर्टि‍कुलेट मैटर (सूक्ष्‍म कणों) का औसत स्तर 70.3 μg/m³है, जोकि विश्‍व में सबसे अधिक है और विश्‍व स्वास्थ्‍य संगठन के मानकों (10 μg/m³) से 7 गुना ज्यादा है। यहां μg/m³ का मतलब माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर है। वैज्ञानिकों की मानें तो वायु में मौजूद पर्ट‍िकुलेट मैटर टीबी, एचआईवी/एड्स जैसी बीमारियों से भी खरनाक होते हैं।

भारत में 5 वर्ष तक घटी औसत आयु

शिकागो विश्‍वविद्यालय द्वारा किए गए वैश्विक अध्‍ययन में पाया गया कि भारत में प्रदूषण की वजह से यहां रहने वाले लोगों की औसत आयु 5.9 वर्ष घट गई है। लेकिन अगर भारत, केंद्र सरकार द्वारा चलाये जा रहे नेशनल क्लीन एयर प्रोग्राम (एनईपी) में पूरी तरह सफल होती है, तो यह कम होकर 3.9 वर्ष हो सकती है। अध्‍ययन में पाया गया है कि दिल्ली में प्रदूषण की वजह से लोगों की औसत आयु 9.7 वर्ष और उत्तर प्रदेश में 9.5 वर्ष तक कम हो गई है। दरअसल 1998 के बाद से इन दोनों राज्यों में प्रदूषण में इतनी तेजी से इजाफा हुआ कि यहां के लोगों की उम्र में से 9 वर्ष कम हो गए।

Life expectancy

रिपोर्ट में हर उस देश को हाईलाइट किया गया है, जहां वायु प्रदूषण का स्तर सामान्‍य से बहुत ऊपर है। बुधवार को यह रिपोर्ट जारी हुई, जबकि इससे पहले आईआईटी कानपुर समेत दक्षिण एशिया के कई संस्‍थानों के पर्यावरण विदों ने इस पर गहन मंथन भी किया और अपने सुझाव रखे। आपको बता दें कि यह रिपोर्ट शिकागो यूनिवर्सिटी के इक्‍नॉमिक्स के प्रोफेसर मिलटन फ्रीडमैन के नेतृत्व में तैयार की गई है, जिसके लिए एक उन्‍होंने अलग से वैज्ञानिक मॉडल बनाया। इस मॉडल में वायु में पाये जाने वाले पर्ट‍िकुलेट मैटर (सूक्ष्‍म कणों) के प्रभावों को आयु से जोड़ कर अध्‍ययन किया गया है।

भारत में 40% लोग खतरे के मुहाने पर

भारत में 40% लोग खतरे के मुहाने पर

रिपोर्ट के अनुसार भारत में रहने वाले 40 प्रतिशत लोग इतने अधिक वायु प्रदूषण के बीच रह रहे हैं, कि आने वाले समय में ये लोग श्‍वास संबंधी बीमारियों से जूझते नज़र आयेंगे। इसमें सबसे ज्यादा खतरे में उत्तर भारत के करीब 5.1 करोड़ लोग ज्यादा खतरे में हैं, अगर उत्तर भारत के प्रदूषण को नियंत्रित नहीं किया गया, तो यहां के लोगों की औसत आयु 8.5 वर्ष तक कम हो सकती है। वैसे भी यहां के जैसा वायु प्रदूषण का स्तर दुनिया के किसी भी देश में नहीं है।

इलाहाबाद और लखनऊ में पीए2.5 का स्तर डब्‍ल्‍यूएचओ की गाइडलाइंस से 12 गुना अधिक है। और अगर प्रदूषण के स्तर को कम नहीं किया गया तो आने वाले समय में यहां रहने वाले लोगों की औसत आयु 12 साल तक घट जाएगी। वहीं दिल्ली अभी भी प्रदूषण के मामले में शीर्ष पर बरकरार है। यहां भी अगर प्रदूषण को नियंत्रित नहीं किया गया तो आने वाले समय में औसत आयु 10 वर्ष तक घट सकती है और अगर भारत के मानक पूरे होते हैं, तो यह 7 वर्ष तक घटेगी।

NCAP हुआ सफल तो मिलेगी राहत

NCAP हुआ सफल तो मिलेगी राहत

दुनिया भर के वैज्ञानिकों ने केंद्र सरकार के नेशनल क्लीन एयर प्रोग्राम की सराहना की है। इस रिपोर्ट में भी इस प्रोग्राम का जिक्र करते हुए वैज्ञानिकों ने कहा कि अगर यह प्रोग्राम सफल होता है तो भारत में प्रदूषण में 20 से 30 प्रशित तक की कमी आ सकती है। ऐसे में देश के लोगों की औसत आयु जो घट चुकी है, वापस 1.8 वर्ष तक बढ़ सकती है। वहीं दिल्ली में इसके सकारात्मक परिणाम औसत आयु में 3.5 प्रतिशत की वृद्ध‍ि के साथ देखे जा सकते हैं।

खतरे में हिन्‍दूकुश क्षेत्र

खतरे में हिन्‍दूकुश क्षेत्र

हिमालय का हिन्‍दूकुश क्षेत्र, जो बेहद संवेदनशील भौगोलिक क्षेत्र है, इसे पल्स ऑफ प्लैनेट, थर्ड पोल या फिर वॉटर टावर ऑफ एशिया कहा जाता है, इस वक्त खतरे में है। आपको बता दें कि भारत में आने वाले अधिकांश भूकंपों का केंद्र ब्रिदु इसी क्षेत्र में ही होता है। दरअसल वैज्ञानिकों का कहना है कि पूरे विश्‍व के 40 सबसे अधिक प्रदूषित शहरों में से 37 शहर दक्ष‍िण एशिया में स्थ‍ित हैं और इन शहरों की वजह से 1.85 बिलियन यानि कि‍ 185 करोड़ लोग प्रदूषण के शिकार हो रहे हैं। यही नहीं इन शहरों की हवा में मौजूद पर्ट‍िकुलेट मैटर हिमालय क्षेत्र पर भी बुरा असर डाल रहे हैं। खास कर हिन्‍दूकुश क्षेत्र में। वायु प्रदूषण के कारण क्षेत्र की हवा गर्म हो रही है और उसकी वजह से ग्लेशियर व पहाड़ों पर जमी बर्फ के पिघलने की रफ्तार अधिक हो गई है।

दक्षिण एशिया पर वैज्ञानिकों के प्रमुख सुझाव

दक्षिण एशिया पर वैज्ञानिकों के प्रमुख सुझाव

शिकागो विश्‍वविद्यालय की इस वैश्‍व‍िक रिपोर्ट के पहले हाल ही में क्लाइमेट ट्रेंड्स द्वारा एक ऑनलाइन सम्मेलन का आयोजित किया गया, जिसमें वायु प्रदूषण पर चर्चा की गई। इस सम्मेलन में इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट, आईआईटी कानपुर, इंस्ट‍िट्यूट ऑफ एडवांस सस्‍टेनिबिलिटी स्टडीज़, जर्मनी, समेत कई संस्थानों के वैज्ञानिकों ने सुझाव रखे। सुझाव इस प्रकार हैं-

● वैज्ञानिकों ने कहा कि दक्षिण एशिया की 61 प्रतिशत जनसंख्‍या घर में लकड़ी व कोयले से निकलने वाले प्रदूषण के शिकार हैं। इससे निबटने का एक ही रास्ता है- एलपीजी। इसके लिए बाकी देशों को भारत की उज्जवला योजना की तरह योजनाएं लागू करनी चाहिए।
● प्रदूषण से निबटने के लिए पूरे देश में एक नीति की जगह, अलग-अलग क्षेत्रों में वहां के हिसाब से नीतिनिर्धारण की जरूरत है। इस कार्य में सरकार को उद्योग, स्थानीय निकायों और शोधकर्ताओं को शामिल करना चाहिए।

● सभी देशों को जैविक ईंधन को बंद करके अक्षय ऊर्जा का रुख करने की जरूरत है। भारत इस मामले में तेजी से आगे बढ़ रहा है और सौर्य व पवन ऊर्जा को बढ़ावा दे रहा है।

● बड़े शहरों में पब्लिक ट्रांसपोर्ट के इंफ्रास्ट्रक्चर को बेहतर बनाने के साथ-साथ लोगों को पब्लिक ट्रांसपोर्ट के उपयोग करने के लिए जागरूक करने की जरूरत है।

● क्षेत्रीय स्तर पर संचालित उद्योगों की टेक्नोलॉजी के आधुनिकीकरण की जरूरत है, ताकि प्रदूषण का स्तर कम हो सके। सभी उद्योगों में मॉनीटरिंग सिस्‍टम लगाये जाने चाहिए, ताकि फैक्ट्र‍ियों से निकलने वाले प्रदूषण की समय-समय पर जांच हो सके।

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