मां की तलाश के लिए छोड़ी नौकरी, अमेरिका से भारत आया युवक

मास्को, 05 अप्रैल। भारतीय मूल के अमेरिकी नागरिक थॉमस कुमार जॉनसन की उम्र 32 साल है, लेकिन आजतक वह अपनी जन्म देने वाली मां से नहीं मिल पाए। दरअसल जब वह महज 2 साल के थे त्रिचिरापल्ली में उन्हें सामाजिक संगठन के माध्यम से गोद ले लिया गया था। उसके बाद से ही थॉमस अपनी जन्म देने वाली मां की तलाश कर रहे थे और उन्होंने अपने जीवन का यह मिशन बना लिया था कि एक दिन वह जरूर अपनी मां से मिलेंगे। अपनी इसी तलाश के दौरान थॉमस को सिर्फ एक महिला के नाम का पता चला जिसका नाम मैरी था। मैरी का नाम गोद लेने वाले कागजात में दर्ज था। वहीं थॉमस कुमार का जन्म का नाम संपथ कुमार है।

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मैं मां को बताना चाहता हूं कि मैं ठीक हूं, जिंदा हूं
थॉमस ने शिकागो में क्लाइमेट चेंज पॉलिसी एक्सपर्ट की अपनी नौकरी को पिछले साल छोड़कर अपनी जन्म देने वाली मां की तलाश करने का फैसला लिया। इसी तलाश में थॉमस भारत के त्रिची शहर पहुंचे। द हिंदू की खबर के अनुसार थॉमस ने बताया कि मैं सिर्फ यह चाहता हूं कि मेरी मां को पता चले कि मैं जिंदा हूं और ठीक हूं। मैं भी जानना चाहता हूं कि मेरी मां ठीक हैं। क्या मेरे कोई भाई या बहन है, शायद मुझे अपने पिता की कोई जानकारी मिल सके। भावनात्मक रूप में मुझे इस बात की संतुष्टि मिलेगी कि मैं किसका बेटा हूं।

2 साल की उम्र में गोद लिया
बता दें कि कुमार ओहायो में रहते हैं और उन्हें अमेरिकी परिवार ने दो साल की आयु में गोद लिया था। थॉमस ने बताया कि मैं कॉकैशियन परिवार में पला बढ़ा, मैं जब 19 साल का हुआ तो तबतक मैं किसी भी दूसरे भारतीय को नहीं जानता था। मैं भारतीय सभ्यता और भाषा को भी नहीं जानता था। मेरी अमेरिकी मां वैज्ञानिक हैं और पढ़ाती हैं। जबकि मेरे पिता का 2005 में निधन हो गया था।

तीसरी बार भारत आए
कुमार ने बताया कि जन्म देने वाली मां की तलाश के मेरे अभियान में मेरी अमेरिकी मां ने साथ दिया। मेरे पिता ने 2004 में मेरे और मेरी बहन के लिए भारत का टिकट खरीदा था, उन्हें लगता था कि यह जरूरी है कि मैं अपने देश को देखूं और अपने रिश्तेदारों की तलाश करूं। उन्हें पता था कि वह जल्द ही मर जाएंगे, लिहाजा वह चाहते हैं थे कि मैं ये करूं। लेकिन मैंने कॉलेज जाने तक इस दिशा में कुछ भी नहीं किया। मैंने यह तलाश 2018 में शुरू की, लेकिन कोरोना के चलते इसमे देरी हुई। अब मैं तीसरी बार अपनी मां की तलाश में भारत आया हूं।

मां नहीं चाहती है मुझे देखना तो मुझे स्वीकार है
खुद थॉमस को पता है कि यह मुश्किल काम है। वो कहते हैं कि अगर मेरी मां मुझे नहीं देखना चाहती हैं तो यह उनका अधिकार है और मैं उनके फैसले को स्वीकार करूंगा। लेकिन इससे मुझे दुख होगा, लेकिन यह इस प्रक्रिया का हिस्सा है। थॉमस पिछले हफ्ते ही दिल्ली पहुंचे हैं, उन्हें लगता है कि त्रिचि के अस्पताल से ही उन्हें गोद लिया गया होगा। थॉमस कहते हैं कि मेरी भारत में ही रहने की योजना है, अगले कुछ हफ्ते मैं यहीं रहूंगा और अपनी मां की तलाश करूंगा।

अंजलि कर रही हैं मदद
पुणे में चाइल्ड ट्रैफिकिंग के लिए काम करने वाली अंजलि पवार इस तलाश में थॉमस की मदद कर रही हैं। अंजलि ने अभी तक 72 गोद लिए बच्चों को उनके असली माता-पिता से मिलाने में मदद की है। वो कहती हैं कि भारत में अधिकतर गोद लेने की प्रक्रिया कानूनी होती है, लेकिन अनाथालय में बच्चा कहां से आता है इसकी जानकारी नहीं होती है। थॉमस को लेकर हमे एक लीड मिली थी हमे लगा हमने तलाश पूरी कर ली है लेकिन डीएनए टेस्ट में यह गलत साबित हुआ। हमे उम्मीद है कि आने वाले हफ्तों में हमे कुछ जानकारी मिलेगी। वहीं थॉमस का कहना है कि अंत में मैं वापस अमेरिका चला जाऊंगा, लेकिन मैं चाहता हूं कि मैं मेरी मां से मिलूं और अपने रिश्तेदारों से संपर्क स्थापित कर सकूं। संभव है कि मैं हमेशा के लिए भारत शिफ्ट ना हो पाऊं, मैं अपनी जैविक मां को किसी भी तरह से परेशान नहीं करना चाहता हूं।

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