‘आप’के उत्तराखंड के रास्ते में अड़चनें-अवरोध
नई दिल्ली(विवेक शुक्ला) आम आदमी पार्टी (आप)अब उत्तराखंड में भी पैर जमाने की फिराक में है। आप के नेता जल्दी उत्तराखंड का दौरा करेंगे ताकि वहां के राजनीतिक माहौल का जायजा लिया जा सके।
वहां पर विधानसभा चुनाव 2017 को होना है। क्या अरविंद केजरीवाल की आप उत्तराखण्ड में पैर पसार सकती है ? उत्तराखंड मामलों के जानकार देव सिंह रावत कहते हैं कि जब तक राजनीति के मुख्यधारा के तेज- तर्रार नेता या जनता के दिलों में राज करने वाले गैर राजनीतिज्ञ लोग आप पार्टी का प्रदेश में नहीं जुडते तब तक आप उत्तराखण्ड में सत्तासीन होने की दावेदार नहीं बन सकती।
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जख्मों को कुरेदने वाले चेहरे
दिल्ली में आप का सबसे मजबूत संगठन के साथ साथ संघर्ष की जमीन व समाचार जगत का बहुत बडा हाथ था। वहीं कांग्रेस में कुशासन के प्रतीक मनमोहन व शीला का जनता के जख्मों को कुरेदने वाला चेहरा था।
नेतृत्वविहिन भाजपा
भाजपा भी दिल्ली में न केवल नेतृत्व विहिन थी अपितु अपनी हार के लिए जुटे आत्मघाती नेताओं की जमात थी। इसलिए केजरीवाल विजयी रहे। परन्तु उत्तराखण्ड में जनता की नब्ज का जानने वाले राजनीति के धुरंधर हरीश रावत का बडा नेतृत्व है वहीं भाजपा के पास अभी तक कोई जनता के विश्वास को अर्जित कर सकने वाला या हरीश रावत के समक्ष चुनौती दे सकने वाला प्रभावशाली नेतृत्व नहीं है।
दोनों में फर्क
जानकारों का कहना है कि उत्तराखण्ड व दिल्ली में जमीन आसमान का अंतर है। दिल्ली के लोग प्रलोभनों में जनादेश दे सकते हैं पर उत्तराखण्ड के लोग प्रलोभनों व मठाधीशी को धूल चटा कर लोग सहृदय व जनहित के लिए संघर्ष करने वालों को सरआंखों पर तो उठा सकते हैं परन्तु तिकडमी को कहीं दूर दूर तक स्वीकार नहीं करते।
सत्तामद में चूर
उत्तराखंड में सत्तामद में चूर इंदिरा गांधी को चुनौती का मुंहतोड़ जवाब हेमवती नंदन बहुगुणा को जीता कर देना जानती है वहीं सत्तामद में चूर भाजपा व कांग्रेस का पूरी तरह से सुपड़ा साफ करने में तनिक सी देरी नहीं लगाती।
जहां तक उत्तराखण्ड में तिवारी, खण्डूडी, निशंक व बहुगुणा जैसे उत्तराखण्ड के हितों पर बज्रपात करने वाले तमाम मुख्यमंत्री देखने के बाद अब हरीश रावत को देख रहे है। आगामी 2017 के चुनाव में हरीश रावत के नेतृत्व में कांग्रेस के समक्ष भाजपा नितांत बौनी नजर आ रही है। इसलिए आप का उत्तराखंड का सफर कछिन है













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