87% किसान संगठन कृषि कानूनों के पक्ष में थे, आंदोलनकारियों को नेताओं ने गुमराह किया-रिपोर्ट
नई दिल्ली, 22 मार्च: सुप्रीम कोर्ट ने किसान आंदोलन के दौरान केंद्र सरकार के तीनों कृषि कानूनों की जांच के लिए एक एक्सपर्ट पैनल का गठन किया था। उस तीन सदस्यी एक्सपर्ट पैनल ने पिछले साल 19 मार्च को ही सर्वोच्च अदालत को अपनी रिपोर्ट सौंप दी थी, लेकिन वह रिपोर्ट आज तक जारी नहीं की गई। आखिरकार पिछले साल नवंबर में केंद्र सरकार ने राजनीतिक वजहों से तीनों कृषि कानूनों को वापस ले लिया। अब सुप्रीम कोर्ट के उस एक्सपर्ट पैनल के एक सदस्य ने वह रिपोर्ट सार्वजनिक कर दी है, जो सुप्रीम कोर्ट में यूं ही दबाकर रख दिया गया था। चौंकाने वाली बात है कि रिपोर्ट में देश के दो-तिहाई से भी ज्यादा किसान संगठन उन कृषि कानूनों के हिमायती थे। जो कि चंद किसान संगठनों के दबाव की वजह से वापस लिए जा चुके हैं।

73 में से 68 किसान संगठन कृषि कानूनों के विरोध में नहीं थे
कृषि सुधार के मकसद से लाए गए तीन कृषि कानूनों को मोदी सरकार ने एक साल से ज्यादा लंबे वक्त तक चले कुछ किसान संगठनों के आंदोलन के दबाव में आकर वापस ले लिया था। लेकिन, इन कानूनों की पड़ताल के लिए सुप्रीम कोर्ट ने जो पैनल नियुक्त किया था, उसकी रिपोर्ट से पता चलता है कि देश के जिन 73 कृषि संगठनों से उसने बात की थी, उनमें से 61 पूरी तरह से तीनों कृषि कानूनों के पक्ष में थे। बाकी सात संगठन भी कुछ बदलावों के बाद इसके समर्थन के लिए तैयार थे। लेकिन, पिछले साल नवंबर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन 40 किसान संगठनों के दबाव में कृषि कानूनों की वापसी का ऐलान कर दिया, जिन्होंने सुप्रीम कोर्ट से नियुक्त समिति के सामने अपनी बात रखने तक की जरूरत नहीं समझी। इनमें से 32 आंदोलनकारी संगठन पंजाब के थे।

सुप्रीम कोर्ट ने रिपोर्ट पर कोई ऐक्शन क्यों नहीं लिया ?
सुप्रीम कोर्ट से नियुक्त समिति के एक सदस्य अनिल घनावत ने रिपोर्ट सार्वजनिक करते हुए जो कुछ कहा है, वह चौंकाने वाला है। उनके मुताबिक, 'मैंने सर्वोच्च अदालत को रिपोर्ट जारी करने के लिए तीन-तीन चिट्ठी लिखकर आग्रह किया। लेकिन, हमें कोई जवाब नहीं मिला। मैंने फैसला किया है कि रिपोर्ट को सार्वजनिक कर दिया जाए, क्योंकि कृषि कानून पहले ही वापस लिया जा चुका है और इसलिए इसकी अब कोई प्रासंगिकता नहीं रह गई है।' उनका यह भी कहना है कि 'यदि सुप्रीम कोर्ट ने समिति की रिपोर्ट मिलते ही जारी कर दी होती तो इससे आंदोलनकारी किसानों को कृषि कानूनों के फायदों के बारे में पता चल सकता था और इससे इन कानूनों की वापसी भी रुक सकती थी।'

87% किसान संगठनों का साथ, फिर भी वापस लेना पड़ा कानून
98 पन्नों की रिपोर्ट में सुप्रीम कोर्ट से नियुक्त पैनल ने कहा है कि समिति ने जिन 73 किसान संगठनों के साथ कृषि कानूनों पर चर्चा की, वह 3.83 करोड़ से ज्यादा किसानों का प्रतिनिधित्व करते हैं। इनमें से 86% (61संगठन) तो पूरी तरह इन कानूनों के पक्ष में थे, जबकि 1% (7 संगठन) कुछ सुझावों के साथ इसका समर्थन कर रहे थे। गिनती के 4 किसान संगठन यानि 4% जो कि 51 लाख किसानों के प्रतिनिधि हैं, वे ही कृषि कानूनों के पक्ष में नहीं थे। हैरानी की बात है इस समिति ने दिल्ली की सीमाओं पर आम जन-जीवन ठप कर बैठने वाले किसान संगठनों से बार-बार कहा कि अपनी बात रखें, लेकिन वे नहीं आए।

'शांत' रहने वाले बहुसंख्यक किसानों के साथ गलत हुआ!
रिपोर्ट में कहा गया है कि कृषि कानूनों की वापसी (जो की जा चुकी है) या लंबे वक्त तक निलंबित रखना उन 'शांत' रहने वाले बहुसंख्यक किसानों के साथ अनुचित होगा, जिन्होंने कृषि कानूनों का समर्थन किया है। कानून को लागू करने के दौरान राज्यों को कुछ छूट दी जा सकती है। खेती के बुनियादी ढांचे को मजबूत करने के लिए सरकार को तत्काल कदम उठाने चाहिए। कुल मिलाकर समिति को 19,027 किसानों और उससे जुड़ी संस्थाओं से जवाब मिला, जिनमें से दो-तिहाई से ज्यादा कृषि कानूनों के पक्ष में थे। इस पैनल में घनावत के अलावा कृषि अर्थशास्त्री अशोक गुलाटी और पीके जोशी भी शामिल थे।

'आंदोलनकारियों को नेताओं ने गुमराह किया था'
घनावत ने कहा है कि, 'अधिकतर आंदोलनकारी किसान पंजाब और उत्तर भारत से आए थे, जहां न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) खास मायने रखती है। इन किसानों को समाजवादी और कम्युनिस्ट नेताओं ने गुमराह किया था, जिन्होंने यह झूठ बोला था कि एमएसपी को खतरा है। कानून में एमएसपी के बारे में कुछ भी नहीं कहा गया था।' उन्होंने कृषि कानूनों की वापसी पर कहा कि 'पीएम नरेंद्र मोदी ने इसलिए माफी मांगी, क्योंकि यह एक राजनीतिक फैसला था। वह उत्तर प्रदेश और पंजाब में हारना नहीं चाहते थे।'












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