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आखिर क्या थीं प्रशांत किशोर की वो 4 शर्तें, जिनसे बनते-बनते बिगड़ गई कांग्रेस में एंट्री की बात

नई दिल्ली, 27 अप्रैल। पिछले कुछ समय से जिस तरह से प्रशांत किशोर और कांग्रेस पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के बीच बातचीत चल रही थी उसके बाद माना जा रहा था कि प्रशांत किशोर पूर्ण तौर पर कांग्रेस के साथ जुड़ेंगे पार्टी में नई ऊर्जा के संचार के साथ उसे नए सिरे से खड़ा करेंगे। लेकिन कई दौर की बैठक के बाद यह बातचीत बेनतीजा साबित हुई और जो लोग प्रशांत किशोर के कांग्रेस में शामिल होने को लेकर उम्मीद लगाए बैठे थे उन्हें बड़ा झटका लगा है। एक तरफ जहां प्रशांत किशोर ने पार्टी में शामिल होने के लिए कुछ अहम शर्तें रखीं तो कांग्रेस ने तमाम चर्चा के बाद इन चीजों पर राजी होने से इनकार कर दिया और आखिरकार कांग्रेस और पीके की ओर से सार्वजनिक तौर पर यह ऐलान कर दिया गया है कि दोनों के रास्ते अलग हैं।

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    2017 को दोहराना नहीं चाहते थे पीके

    2017 को दोहराना नहीं चाहते थे पीके

    लेकिन इन तमाम उठापटक, बैठकों के दौर के बीच सवाल यह उठता है कि आखिर प्रशांत किशोर कांग्रेस पार्टी से क्या चाहते थे। आखिर वह ऐसी कौन सी मांग लेकर पार्टी के बीच गए थे जिसपर शीर्ष नेतृत्व राजी नहीं हो सका, जिसके चलते यह पूरी कोशिश विफल हो गई। इन तमाम वजहों को अगर टटोलें तो मुख्य रूप से चार बातें सामने आती हैं जो प्रशांत किशोर कांग्रेस पार्टी से चाहते थे। प्रशांत किशोर 2017 में यूपी चुनाव के समय कांग्रेस पार्टी के साथ जुड़ चुके थे और उस वक्त पार्टी को बुरी हार का सामना करना पड़ा था। लिहाजा इस बार प्रशांत किशोर चाहते थे कि पहले जैसी स्थिति फिर से ना दोहराई जाए, लिहाजा पीके ने अपनी शर्तों के स्वीकार नहीं होने पर अपने रास्ते अलग कर लिए।

     सीधे सोनिया गांधी को रिपोर्ट करना चाहते थे पीके

    सीधे सोनिया गांधी को रिपोर्ट करना चाहते थे पीके

    वहीं इसके अलावा प्रशांत किशोर चाहते थे कि वह पार्टी में सीधे सोनिया गांधी को रिपोर्ट करें, जबकि पार्टी चाहती थी कि प्रशांत किशोर इंपॉवर्ड एक्शन ग्रुप यानि ईएजी का हिस्सा बने, जिसे साफ तौर पर प्रशांत किशोर ने ठुकरा दिया। दरअसल प्रसांत किशोर पार्टी के अन्य नेताओं को रिपोर्ट नहीं करना चाहते थे, जिससे कि उन्हें संगठन स्तर पर मजबूत फैसले लेने में मदद मिले और उनका इसमे कोई हस्तक्षेप ना हो।

    पार्टी के भीतर संवाद का इंचार्ज

    पार्टी के भीतर संवाद का इंचार्ज

    प्रशांत किशोर चाहते थे कि पार्टी की ओर से किए जाने वाले सभी संवाद और संदेश उनके जरिए हो। वह पार्टी के भीतर टिकट बंटवारे की कमान पूरी तरह से अपने हाथ में लेना चाहते थे, वह इसके लिए पार्टी के पास के सभी आंकड़े अपने पास रखना चाहते थे जिससे कि रणनीति को बना सके। लेकिन कांग्रेस पार्टी को पीके की यह मांग वाजिब नहीं लगी। पार्टी को इस बात का डर था कि अगर पीके इसे पूरी तरह से अपने नियंत्रण में लेंगे तो इससे पार्टी की दूसरी इकाई पीसीसी, सीईसी का अस्तित्व खतरे में आएगा।

    क्षेत्रीय दलों के साथ गठबंधन

    क्षेत्रीय दलों के साथ गठबंधन

    वहीं अन्य दलों के साथ गठबंधन के मामले पर प्रशांत किशोर चाहते थे कि वह क्षेत्रीय दलों के साथ पार्टी को जोड़ें। रिपोर्ट की माने तो प्रशांत किशोर केसीआर, जगन मोहन रेड्डी, ममता बनर्जी के साथ बातचीत की अगुवाई करें, उन्हें लगता था कि मोदी को हराने के लिए यह बेहद जरूरी है। लेकिन कांग्रेस पार्टी की सोच इससे बिल्कुल अलग है, पार्टी को लगता है कि इस तरह की डील से क्षेत्रीय राजनीति में कांग्रेस पार्टी अपनी जड़े मजबूत कभी नहीं कर पाएगी।

    लोकसभा चुनाव पर फोकस

    लोकसभा चुनाव पर फोकस

    दरअसल लोकसभा चुनाव में अब सिर्फ दो साल का समय बचा है, यां यूं कहें कि उससे भी कम। ऐसे में प्रशांत किशोर अभी से लोकसभा चुनाव पर ध्यान केंद्रित करना चाहते हैं जबकि कांग्रेस पार्टी प्रशांत किशोर से चाहती थी कि वह आगामी विधानसभा चुनावों पर अपना ध्यान केंद्रित करें जोकि इस साल और अगले साल अलग-अलग राज्यों में होने वाले हैं, जिसको लेकर प्रशांत किशोर राजी नहीं थे।

    टीआरएस का बयान

    टीआरएस का बयान

    गौर करने वाली बात है कि प्रशांत किशोर की कंपनी आई पैक ने हाल ही में तेलंगाना के मुख्यमंत्री केसीआर के साथ करार किया है, ऐसे में कांग्रेस पार्टी को इस बात का भी डर था कि एक तरफ प्रशांत किशोर कांग्रेस के साथ काम करेंगे दूसरी तरफ इनकी संस्था टीआरएस के लिए काम करेगी। हाल ही में टीआरएस के कार्यकारी अध्यक्ष केटी रामाराव ने कहा था कि कांग्रेस निरर्थक संस्था है। देश के लोगों ने उन्हें 75 में से 50 साल का समय दिया, लेकिन देश को कांग्रेस और भाजपा ने निराश किया है।

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