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राजा राम मोहन राय की 250वीं जयंती पर जारी होगा 250 रुपये का सिक्का, जानें क्या होगी खासियत

महान समाज सुधारक राजा राम मोहन राय की 250वीं जयंती पर भारत सरकार ने 250 रुपये की कीमत का एक सिक्का जारी करने का फैसला किया है।

नई दिल्ली, 05 जून : महान समाज सुधारक राजा राम मोहन राय की 250वीं जयंती पर भारत सरकार ने 250 रुपये की कीमत का एक सिक्का जारी करने का फैसला किया है। सरकारी राजपत्र में इस बात की जानकारी दी गई है। सिक्के का वजन लगभग 35 ग्राम होगा। कई धातुओं से मिलाकर इसे बनाया जाएगा।

वित्त मंत्रालय ने जारी की अधिसूचना

वित्त मंत्रालय ने जारी की अधिसूचना

वित्त मंत्रालय ने 4 जुलाई यानी सोमवार को इसके लिए एक अधिसूचना जारी की। केंद्र सरकार ने सिक्का अधिनियम 2011 की धारा 24 की उप-धारा 2 के खंड (डी) और (ई) द्वारा प्रदत्त अपनी शक्ति का प्रयोग करते हुए पहले ही विशिष्ट आयाम, रचना, शीर्षक, डिज़ाइन और वजन को लेकर आदेश दिया है।

सिक्के में 50 प्रतिशत चांदी होगा

सिक्के में 50 प्रतिशत चांदी होगा

सिक्के के विवरण के बारे में जानकारी देते हुए कहा कि यह लगभग 44 मिलीमीटर व्यास (डायमीटर) का होगा। जिसमें 50 प्रतिशत चांदी, 40 प्रतिशत तांबा, और 5 प्रतिशत निकेल और जस्ता का मिश्रण होगा। सिक्के के मुख पर अशोक स्तंभ का सिंह कैपिटल होगा, जिसके नीचे हिंदू में 'सत्यमेव जयते' और बाईं ओर देवनागरी लिपि में 'भारत' शब्द अंकित होगा, जबकि 'इंडिया' शब्द अंग्रेजी में दाईं ओर होगा।

सिक्के पर ये सब होगा अंकित

सिक्के पर ये सब होगा अंकित

सिक्के के किनारे पर लायन कैपिटल के नीचे '₹' का चिन्ह और अंतरराष्ट्रीय अंकों में 250 रुपये का मूल्य भी होगा। सिक्के के दूसरी ओर, सेंटर में राजा राम मोहन राय की एक तस्वीर होगी, जिस पर देवनागरी में 'राजा राम मोहन राय की 250वीं जयंती' और सिक्के की ऊपरी और निचली परिधि पर क्रमशः अंग्रेजी लिपियों का शिलालेख होगा।

22 मई 1772 को हुआ था जन्म

22 मई 1772 को हुआ था जन्म

राजा राम मोहन राय का जन्म 22 मई 1772 को हुआ था। राजा राम मोहन राय एक भारतीय सुधारक और 1828 में ब्रह्म सभा के संस्थापक थे। वह भारतीय उपमहाद्वीप में प्रसिद्ध सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलन के पीछे थे।

बंगाल पुनर्जागरण का जनक

बंगाल पुनर्जागरण का जनक

राम मोहन राय राजनीति, लोक प्रशासन, शिक्षा और धर्म सहित विभिन्न क्षेत्रों में भी अग्रणी थे। इसके अलावा, वह 'सती' और बाल विवाह की प्रथाओं को खत्म करने के अपने प्रयासों के लिए जाने जाते थे और उन्हें "बंगाल पुनर्जागरण का जनक" माना जाता है।

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