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रूस पर पश्चिम के दबाव और अपने हितों के बीच झूल रहा है भारत

नई दिल्ली, 23 मार्च। इसी क्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 22 मार्च को ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन से फोन पर बातचीत की. एक सरकारी प्रेस विज्ञप्ति में बताया गया कि दोनों नेताओं ने यूक्रेन पर विस्तार से चर्चा की और मोदी ने युद्ध की समाप्ति और बातचीत के रास्ते पर लौट आने के लिए बार बार की गई भारत की अपील को दोहराया.

उन्होंने जोर दिया कि भारत का विश्वास है कि अंतरराष्ट्रीय कानून और सभी देशों की टेरिटोरियल अखंडता और संप्रभुता के प्रति सम्मान ही समकालीन वैश्विक व्यवस्था का आधार है. दोनों नेताओं ने भारत-ब्रिटेन द्विपक्षीय संबंधों पर भी चर्चा की और आपसी सहयोग को और बढ़ाने की संभावना पर सहमति व्यक्त की.

भारत से "बहुत निराश"

(पढ़ें: जापान के प्रधानमंत्री के बाद इस्राएल के प्रधानमंत्री भी आएंगे भारत)

मोदी ने जॉनसन को भारत आने का निमंत्रण भी दिया. इस बातचीत को मोदी द्वारा यूक्रेन युद्ध पर भारत के रुख को लेकर ब्रिटेन की चिंताओं को शांत कराने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है.

ब्रिटेन ने भारत के रुख पर निराशा जाहिर की है

अमेरिका की तरह ब्रिटेन ने भी कई बार भारत के रुख से असंतुष्टि का संकेत दिया है और रूस के खिलाफ पश्चिमी देशों की कार्रवाई में साथ देने की अपील की है. बल्कि ब्रिटेन की व्यापार मंत्री ऐन-मेरी ट्रेवेल्यान ने कुछ ही दिनों पहले कहा कि ब्रिटेन भारत के रूख से "बहुत निराश" है.

उसके बाद भारत के रूस से कच्चा तेल खरीदने की खबरों के बीच अमेरिकी विदेश मंत्रालय की वरिष्ठ अधिकारी विक्टोरिया नुलैंड भारत आईं और भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर और विदेश सचिव हर्ष श्रृंगला से मिलीं. उनकी यात्रा के बीच ही अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने वॉशिंगटन में बयान दिया कि यूक्रेन युद्ध के मुद्दे पर भारत का रुख "ढीला" है.

परीक्षा की घड़ी

(पढ़ें: चीन से ज्यादा भारत को होगा यूक्रेन युद्ध का नुकसानः आईएमएफ)

नुलैंड ने भारतीय मीडिया संस्थानों को दिए साक्षात्कार में कहा कि "लोकतांत्रिक देशों को एक साथ रहना चाहिए" और "रूस-चीन एक्सिस भारत के लिए अच्छा नहीं है." 23 मार्च को वॉशिंगटन में विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता नेड प्राइस ने एक ताजा बयान में अमेरिका-भारत साझेदारी पर जोर दिया.

उन्होंने कहा कि भारत क्वॉड देशों के समूह में एक स्वच्छंद और खुले भारत-प्रशांत प्रांत के साझा सपने को साकार करने में अमेरिका के लिए एक आवश्यक पार्टनर है. उन्होंने भी नुलैंड की तरह कहा कि भारत के रूस के साथ ऐतिहासिक रूप से जो सुरक्षा संबंध हैं, अब अमेरिका भारत के साथ उस तरह के संबंधों के लिए तैयार है.

स्पष्ट है कि रूस के प्रति भारत के रुख में बदलाव लाने को लेकर पश्चिमी देशों की बेचैनी बढ़ रही है. ऐसे में भारत के लिए रूस और पश्चिम के बीच संबंधों में संतुलन बनाए रखना मुश्किल होता जा रहा है.

बुधवार 23 मार्च को भारत एक बार फिर परीक्षा की घड़ी का सामना करेगा जब संयुक्त राष्ट्र में यूक्रेन युद्ध पर एक के बाद एक तीन प्रस्ताव लाए जाएंगे. पूर्व में भारत ने रूस की आलोचना करने वाले प्रस्तावों पर मत डालने से खुद को बाहर रखा है. देखना होगा इस बार भारत की क्या रणनीति रहती है.

Source: DW

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