फोन हमारे रिश्तों को कैसे प्रभावित करते हैं

तुर्की में इस्तांबुल स्थित इब्न हल्दून विश्वविद्यालय के थसीन नजीर को आप उनके लेक्चर्स के दौरान फोन चेक करते हुए पकड़ नहीं पाएंगे. नजीर, काउंसलिंग एंड गाइडेंस विभाग में काउंसलर और असिस्टेंट प्रोफेसर हैं. वह सामाजिक संबंधों पर तकनीक के प्रभाव पर शोध कर रहे हैं. उनके शोध में "फबिंग" के प्रभाव का अध्ययन भी शामिल है. यदि आप किसी एक व्यक्ति से बात कर रहे हों और वह व्यक्ति उसी समय अपना फोन भी चेक कर रहा हो या फिर संदेशों को पढ़ रहा हो, तो इसका मतलब आपके साथ फबिंग हो रही है.

How Smartphone is impact on our Relationship?

लेकिन नुकसानरहित लगने वाली यह आदत क्या लोगों के संबंधों को भी वास्तव में प्रभावित कर सकती है? नजीर कहते हैं, "यह आपका कीमती समय ले रही है. हालांकि हम लोग इसे महसूस नहीं करते हैं." कभी कभी हमारे फोन नए संबंध बनाने और पुराने संबंधों को मजबूत करने में भी मददगार होते हैं. फोन की मदद से नए साथी ढूंढ़ने में मदद मिलती है, लोग दूर रहते हुए भी अपने दोस्तों और परिवार को देख सकते हैं और दूर-दराज रह रहे लोगों से बिना किसी खर्च के जुड़ सकते हैं.

फिर भी, व्यक्तिगत बातचीत के दौरान स्मार्टफोन का उपयोग या फिर उसकी उपस्थिति भी बातचीत की गुणवत्ता को कम कर सकती है. यूनाइटेड किंगडम के नार्थम्ब्रिया विश्वविद्यालय में मनोविज्ञान पढ़ाने वाली जेनेवी ब्राउन कहती हैं, "स्मार्टफोन्स हमें अपनों से मेसेज और कॉल्स के जरिए जोड़ते हैं लेकिन जब वे आमने-सामने होते हैं तब यही स्मार्टफोन्स बातचीत में दिक्कत पैदा करते हैं."

अच्छा समय बर्बाद होता है

यह समस्या कितनी गंभीर है, इस बात पर निर्भर करता है कि बातचीत करने वाले लोग किस उम्र सीमा के हैं. साल 2020 में नजीर ने अपने विश्वविद्यालय के नौजवान और उम्रदराज शिक्षकों पर एक सर्वे किया और पूछा कि उनकी कक्षाओं में जब विद्यार्थी फोन का इस्तेमाल करते हैं तो उन्हें कैसा लगता है. नजीर कहते हैं कि छात्रों के इस व्यवहार पर उन लोगों के विचार बिल्कुल अलग थे.

ज्यादा उम्रदराज शिक्षकों का कहना था कि कक्षा में स्मार्टफोन का इस्तेमाल असभ्यता है लेकिन जो युवा शिक्षक थे उनका कहना था कि इस स्थिति में उन्हें खुद के मूल्यांकन की जरूरत है क्योंकि शायद उनके पढ़ाने में कोई कमी हो, जिसकी वजह से कक्षा में विद्यार्थी पूरी तरह से मन नहीं लगा रहा है. लेकिन फबिंग का मसला इससे अलग है क्योंकि उस व्यक्ति पर तब नकारात्मक प्रभाव पड़ता है जब उससे बात करते हुए भी सामने वाला व्यक्ति फोन की ओर देखता रहता है.

ब्राउन के शोध साल 2016 में इमर्जिंग एडल्टहुड नामक पत्रिका में छपे थे. इसके मुताबिक, दोस्तों के वे जोड़े जो ज्यादा समय तक फोन का इस्तेमाल करते हैं, उनकी बातचीत की गुणवत्ता उतनी ही ज्यादा प्रभावित होती है. शोध के मुताबिक, उन लोगों पर इसका सबसे बुरा प्रभाव देखा गया जो फोन पर व्यस्त रहने के दौरान यह भी भूल गए कि जिनसे वे बात कर रहे हैं वो उनके कितने करीबी दोस्त थे.

300 लोगों पर किए गए एक अन्य शोध से, जो कि जर्नल ऑफ एक्सपेरिमेंटल साइकोलॉजी में साल 2017 में छपे थे, पता चलता है कि जो लोग परिवार अथवा दोस्तों के साथ भोजन के वक्त भी अपना फोन सामने रखते हैं, वो अन्य लोगों की तुलना में कुछ ज्यादा विचलित रहते थे और अन्य लोगों की तुलना में उस क्षण का आनंद कम ले पाते थे. लेकिन बहुत से लोग, खासकर युवा वर्ग में तो फोन को हर समय पास रखना जैसे नियम सा हो.

कारण मायने रखता है

जर्मनी की 17 वर्षीय युवती मिलेना डीडब्ल्यू से बातचीत में कहती हैं, "छोटी बातचीत में तो हर व्यक्ति आमतौर पर फोन हाथ में लिए रहता है क्योंकि युवाओं में तो यह सामान्य सी आदत हो चली है. मैं इसे असभ्य व्यवहार नहीं मानती. लेकिन हां, यह मुझे बहुत अच्छा भी नहीं लगता. मैं निजी तौर पर यह पसंद नहीं करती कि जब कोई व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति से बात करते हुए अपने फोन चेक करता रहता है." उनकी 17 वर्षीय मित्र पाउलीन कहती हैं कि इसकी वजह कुछ और भी हो सकती है. वह कहती हैं, "यह सुखद नहीं होता लेकिन व्यक्तिगत तौर पर मुझे यह बुरा भी नहीं लगता. यह इस बात पर निर्भर करता है कि उस वक्त आप कितना जरूरी मेसेज या फिर कुछ अन्य चीज चेक कर रहे हैं."

हाल ही में अमरीका में हुए एक शोध के मुताबिक, जो कि ह्यूमन बिहेवियर एंड इमर्जिंग टेक्नोलॉजी नामक पत्रिका में छपे थे, इसी तरह के निष्कर्ष थे. शोध के मुताबिक, जब कोई व्यक्ति किसी से बात करते वक्त एक अन्य व्यक्ति के साथ फोन पर बात करता है तो पहला व्यक्ति सोचता है कि वह उसका शायद उतना करीबी नहीं है. लेकिन जब किसी महत्वपूर्ण वजह से किसी व्यक्ति ने बातचीत के दौरान फोन का इस्तेमाल किया तो सामने वाले को उतना बुरा भी नहीं लगा. उस वक्त भी जबकि महत्वपूर्ण समूह समान कीमत के फोन का उपयोग कर रहे थे.

संदेश है फोन को प्राथमिकता देना

हाल ही में जब नजीर अपनी मां का स्वास्थ्य परीक्षण कराने के लिए ले गए, डॉक्टर पूरे परीक्षण के दौरान अपना फोन चेक करते रहे. जब वे लोग डॉक्टर के ऑफिस से बाहर निकले, उन्होंने अपनी मां से पूछा कि डॉक्टर के यहां उनका अनुभव कैसा था. नजीर कहते हैं कि उनकी मां ने कहा, "मुझे नहीं लगता कि उसने ठीक से मेरा स्वास्थ्य परीक्षण किया होगा. वह तो पूरे समय अपने मोबाइल में ही व्यस्त था."

नजीर कहते हैं कि किसी के साथ संवाद करना सिर्फ बात करने से कहीं ज्यादा महत्व रखता है. वह कहते हैं, "हम भूल जाते हैं कि जब हम किसी से संवाद कर रहे होते हैं तो हमें न सिर्फ बातचीत पर ध्यान रखना होता है बल्कि शरीर के हाव-भाव भी मायने रखते हैं. जब हम सामने खड़े व्यक्ति की बजाय फोन को प्राथमिकता देने लगते हैं, तो हम उसके अवचेतन में एक संदेश दे रहे होते हैं."

नजीर कहते हैं, "जब आपके सामने ही कोई व्यक्ति फबिंग कर रहा है तो आपके अवचेतन में यह बात घर कर जाती है कि उसकी प्राथमिकता आपकी बजाय उसका मोबाइल है. जब कोई व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति से कोई भावनात्मक कहानी साझा कर रहा होता है और वह व्यक्ति अपने फोन चेक कर रहा होता है तो दूसरा व्यक्ति समझ जाता है कि उसकी कहानी में उसकी कोई दिलचस्पी नहीं है."

आदत को छोड़ना

जो लोग किसी से आमने-सामने बातचीत के दौरान फोन का इस्तेमाल कम करना चाहते हैं, तो उनके लिए कुछ रचनात्मक समाधान भी हैं. कुछ लोग ऐप या फिर इंटरनेट बंद करने वाले यंत्रों का उपयोग करते हैं जबकि दूसरे लोग कुछ समय के लिए फोन को लॉक कर देते हैं. एक कंपनी ने तो इस तरह का एक फिजिकल बैंड डिजाइन भी किया है जो कि स्मार्टफोन के चारों तरफ रिमाइंडर के तौर पर लगाया जा सकता है.

लेकिन ब्राउन कहती हैं कि फोन इस्तेमाल करने वालों के लिए उनका सुझाव होगा कि इसका इस्तेमाल संवाद के लिए होना चाहिए. वह बताती हैं कि कैसे यह बात समझ में आ जाती है कि आप फोन के इस्तेमाल में ज्यादा वक्त दे रहे हैं या फिर अपने दोस्तों और अपने पार्टनर के साथ.

जब फोन पर अक्सर आपका दोस्त या फिर पार्टनर होता है तो उससे बातचीत की शुरुआत में ही आप पूछें कि वह ऐसा क्यों कर रहा है. ब्राउन कहती हैं, "तब आप उनसे यह बात साझा कर सकते हैं कि बातचीत के वक्त उनका स्मार्टफोन इस्तेमाल करना आपको कैसा लगता है और फिर उनके साथ इस समस्या के समाधान पर भी कोई चर्चा कर सकते हैं."

Source: DW

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