ओलंपिक में भारतीय महिलाओं का प्रदर्शन पुरुषों से बेहतर कैसे

नई दिल्ली, 04 अगस्त। भारत ने अब तक टोक्यो ओलंपिक में तीन मेडल सुरक्षित कर लिए हैं. भारोत्तोलन में साइखोम मीराबाई चानू ने रजत पदक जीता. इसके बाद बैडमिंटन में लगातार दूसरी बार पीवी सिंधू ने पदक जीता. इस बार सिंधू को कांस्य से संतोष करना पड़ा हालांकि साल 2016 के रियो ओलंपिक में उन्होंने रजत पदक हासिल किया था. तीसरा पदक सुनिश्चित करने वाली खिलाड़ी हैं, मुक्केबाज लवलीना बोरगोहेन.

तस्वीरों मेंः कैसे कैसे रहे हैं ओलंपिक के मैस्कॉट

इसका मतलब कि अब तक भारत के लिए टोक्यो ओलंपिक में पदक हासिल करने वाली सभी खिलाड़ी महिलाएं हैं. वहीं महिला हॉकी टीम ने तो पहली बार ओलंपिक के सेमीफाइनल में पहुंचकर इतिहास रच दिया है. इतना ही नहीं ओलंपिक में भारतीय खिलाड़ियों के प्रदर्शन की पूरी सूची देखें तो पिछले 8 में से 6 मेडल लड़कियों ने जीते हैं जबकि अब भी ओलंपिक में भेजे जाने वाले भारतीय दल में महिलाओं और पुरुषों की संख्या बराबर नहीं हुई है.भारत की ओर से भी जिन खिलाड़ियों का दल ओलंपिक में भेजा गया है, उसके 127 खिलाड़ियों में से 56 महिलाएं और 71 पुरुष खिलाड़ी हैं. यानी महिलाओं की हिस्सेदारी करीब 45 फीसदी है. वहीं अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक कमेटी (IOC) ने बताया है कि ओलंपिक में इस बार कुल खिलाड़ियों में से 49 फीसदी महिलाएं हैं, जबकि रियो ओलंपिक में 45 फीसदी खिलाड़ी महिलाएं थीं. ग्रेट ब्रिटेन जैसे देशों ने तो इस बार पुरुषों की अपेक्षा ज्यादा महिलाओं को ओलंपिक में भेजा है.मानसिक मजबूती

जानकार कहते हैं कि अगर प्रैक्टिस की बात करें तो ओलंपिक के लिए पुरुष और महिला एथलीट्स की प्रैक्टिस एक ही तरह से हुई है. सभी को एक जैसी सुविधाएं ही उपलब्ध कराई जा रही हैं. हालांकि खेल पत्रकार प्रत्यूषराज कहते हैं, "फिर भी एक वजह हो सकती है, जहां थोड़ा अंतर आ सकता है. वह है, मानसिक मजबूती. हम जानते हैं कि 'ओलंपिक' खेल की सबसे बड़ी अंतरराष्ट्रीय स्पर्धा है और इसमें खिलाड़ियों पर जबरदस्त दबाव होता है. यह दबाव कई बार गलतियां भी करवाता है लेकिन जो खिलाड़ी इससे पार पा जाता है, वह बेहतरीन प्रदर्शन करता है. पीवी सिंधू के लगातार दो ओलंपिक खेलों में मेडल हासिल करने के मामले में हम यह बात देख सकते हैं."

महिला हॉकी टीम पहली बार सेमीफाइनल में पहुंची है

हालांकि वह यह भी कहते हैं कि ऐसा नहीं है कि सभी महिला खिलाड़ियों पर मानसिक दबाव का असर नहीं होता. उनके मुताबिक तीरंदाज दीपिका कुमारी को कई अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में बेहतरीन प्रदर्शन करते देखा गया है लेकिन ओलंपिक में वह इतनी प्रभावशाली होकर नहीं उबर पातीं. ऐसा ही मनु भाकर और कमलप्रीत कौर के साथ हुआ है.

कमलप्रीत कौर ने क्वॉलिफायर में जो प्रदर्शन किया वह उनका व्यक्तिगत सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन था और उन्हें मेडल दिलाने के लिए पर्याप्त था लेकिन वे इसे फाइनल में नहीं दोहरा सकीं. फिर भी काफी हद तक पुरुष खिलाड़ियों की अपेक्षा महिला खिलाड़ियों ने मानसिक मजबूती का बेहतर परिचय दिया है.बढ़ी प्रतिभागिता भी जिम्मेदार

खेल पत्रकार नीरू भाटिया जरा अलग रुख रखती हैं. वह कहती हैं, "सबसे बड़ा अंतर प्रतिभागिता का है. जैसे-जैसे एथलीट्स में महिलाओं की संख्या बढ़ रही है, उसी हिसाब से उनके मेडल भी बढ़ रहे हैं. हर साल किसी एक खेल प्रतियोगिता में महिलाएं पहली बार आ रही हैं. ऐसा भी नहीं कि वे वाइल्ड कार्ड एंट्री हैं, वे इसलिए आ रही हैं क्योंकि उन्होंने क्वॉलीफाई किया है. इस साल जो काम तलवारबाजी में भवानी देवी ने किया, पिछली बात जिम्नास्टिक्स में दीपिका कर्माकर ने किया था. उससे पहले मुक्केबाजी के लिए मैरीकॉम ने किया था. उससे पहले रेसलिंग के लिए फोगाट बहनों ने किया था जबकि तब महिलाओं के लिए कुश्ती जैसे खेल अच्छी नजरों से नहीं देखे जाते थे."

Provided by Deutsche Welle

भाटिया कहती हैं, "ऐसे में अगर अभी तक अगर सिर्फ महिलाओं ने ही मेडल जीते हैं तो यह उनकी बढ़ी प्रतिभागिता का नतीजा है और एक संयोग मात्र है." नीरू भाटिया सहित ज्यादातर जानकार मानते हैं कि महिलाओं के मेडल उनके समाज में हर तरह से हो रहे विकास और शिक्षा में बढ़ोतरी से भी जुड़े हुए हैं. अब कई तरह की रुढ़ियां धीरे-धीरे मिट रही हैं.

हरियाणा से आने वाली लड़कियों के मेडल इसका नतीजा हैं. वहीं पहले के मुकाबले अब कई आर्थिक रूप से कमजोर घरों की लड़कियां भी ओलंपिक में जबरदस्त प्रदर्शन कर रही हैं. कमलप्रीत कौर, सविता पूनिया, रानी रामपाल और नेहा गोयल जैसी खिलाड़ी ऐसे ही परिवारों से आती हैं.

बराबरी के अलावा अवसर भी

जानकार बताते हैं कि पहले जहां ओलंपिक में भारत के पदकों को 'हिट बाई ट्रायल' यानी तुक्का मान लिया जाता था, अब ऐसा नहीं रहा. स्थिति काफी बदल चुकी है. जो खिलाड़ी पदक हासिल कर रहे हैं, वे लगातार बड़ी अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में अपना प्रदर्शन दोहरा रहे हैं. खिलाड़ियों की फिटनेस और डाइट की ट्रेनिंग भी अच्छी हुई है. ओलंपिक के लिए अब सालों-साल तैयारी होती है.

तस्वीरों मेंः भारत को मेडल दिलाने वांली खिलाड़ी

जानकारों के मुताबिक महिला एथलीट भी इस प्रक्रिया से लाभ पा रही हैं. और अगर वे बहुत अच्छा प्रदर्शन करती हैं तो उन्हें पर्सनल कोच और अन्य सुविधाएं भी सरकार की ओर से उपलब्ध कराई जाती हैं. पीवी सिंधू और एमसी मैरीकॉम जैसे खिलाड़ी इसी प्रक्रिया का हिस्सा हैं. हालांकि उनके मुताबिक अब भी भारत को इस दिशा में लंबी दूरी तय करनी है. ऐसा नहीं होता तो इस बार टेनिस के महिला सिंगल्स प्रतियोगिता के लिए ओलंपिक में भेजने के लिए कोई न कोई महिला खिलाड़ी जरूर मौजूद होती.

Source: DW

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