गुटबाजी और अंसतोष में उलझती जा रही हिमाचल भाजपा, दल छोड़ कांग्रेस में जा रहे नेता चुनाव में बन सकते हैं चुनौती

शिमला, 23 जुलाई। अपने अनुशासन और कार्यकर्ताओं की पूछ के लिये मशहूर भारतीय जनता पार्टी इस साल के अंत में होने जा रहे विधानसभा चुनावों से पहले हिमाचल प्रदेश में गुटबाजी और असंतोष में उलझती जा रही है। गुटबाजी के चलते कई भाजपा नेताओं को अपना राजनीतिक भविष्य अब धूमिल होता दिखाई दे रहा है जिसकी वजह से हाशिये पर चल रहे नेता दूसरे दलों में सुरक्षित ठौर ठिकाना तलाशने लगे हैं। हिमाचल भाजपा में मची भगदड़ को लेकर भले ही विपक्षी दल कांग्रेस गदगद हो , लेकिन इन दिनों सवाल उठ रहे हैं कि आखिर सत्तारूढ़ दल से अपने ही लोगों का मोहभंग क्यों हो रहा है और लोग पार्टी क्यों छोड़ रहे हैं? दरअसल, इन दिनों हिमाचल भाजपा पूरी तरह दो गुटों में विभाजित हो गई है और मौजूदा मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर को पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा से मिले वरदहस्त के चलते वे ताकतवर नेता के तौर उभर कर सामने आये हैं। गृह मंत्री अमित शाह व जे पी नड्डा के प्रभाव के चलते पार्टी आलाकमान ने उन्हें अगले चुनाव के लिये भी हरी झंडी दे दी है। पार्टी ने स्पष्ट कर दिया है कि आने वाले चुनाव में प्रमुख चेहरा जय राम ठाकुर ही होंगे।

tussle between Jairam and Dhumal faction in Himachal BJP

लेकिन , सीएम जयराम ठाकुर के बढ़ते प्रभाव के चलते पार्टी के पुराने नेता इन दिनों अपने आप को असुरक्षित महसूस करने लगे है। खासकर पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल के करीबी कई नेता इन दिनों हाशिये पर हैं। यही वजह है कि हिमाचल भाजपा धूमल और नड्डा गुट में एक बार फिर बंटने लगी है। राजनैतिक जानकार रविन्दर सूद मानते हैं कि भाजपा के धूमल और केन्द्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर गुट के करीबी नेता निशाने पर रहे हैं जिससे इस गुट में बेचैनी है। उनके सामने पार्टी छोड़ने के सिवा कोई चारा नहीं है क्योकि प्रेम कुमार धूमल के बेटे अनुराग ठाकुर केन्द्र सरकार मे कबीना मंत्री हैं। जिसके चलते धूमल खुलकर जय राम ठाकुर के खिलाफ बोल नहीं पा रहे हैं। लेकिन उनका मानना है कि इस असंतोष का नुकसान अंत में पार्टी को ही होगा। वह मानते हैं कि आने वाले दिनों धूमल के साथ वफादारी दिखाने वाले कई नेता भाजपा छोड़ कर दूसरे दलों में चले जायेंगे और चुनावों में यही नेता भाजपा के लिए चुनौती बनेंगे।

दरअसल, हिमाचल भाजपा में मचे इस तूफान के पीछे खुद जगत प्रकाश नड्डा ही हैं। नड्डा ने पिछले दिनों अपने हिमाचल प्रवास के दौरान खुलकर टिकट के लिये पार्टी का मापदंड स्पष्ट करते हुये कहा था कि आने वाले चुनावों में पार्टी युवा चेहरों को तरजीह देते हुये कुछ मौजूदा विधायकों के टिकट काट सकती है। उन्होंने पिछले चुनाव में हार का सामना करने वाले नेताओं की दोबारा टिकट की दावेदारी को भी नकार दिया था। अब नेताओं को लगने लगा है कि उन्हें पार्टी टिकट नहीं देगी और इसके चलते पार्टी में असंतोष उभर कर सामने आ रहा हैं। दरअसल , उत्तर प्रदेश में भी भाजपा ने कई सिटिंग विधायकों के टिकट काट कर चौंका दिया था। कुछ ऐसा ही फार्मूला प्रदेश में भी तैयार किया जा रहा है। सत्ता विरोधी लहर से बचने के लिये तैयार किये गये फार्मूले में कई नेता जद में आ सकते हैं। पार्टी नेतृत्व ने स्पष्ट कर दिया है कि मौजूदा विधायकों में से 15 फीसदी विधायकों के टिकट उत्तर प्रदेश व उत्तराखंड की तर्ज पर कट सकते हैं। माना जा रहा है कि इसी डर के चलते भाजपा नेता पर्टी छोड़ रहे हैं।

बताया जा रहा है कि भाजपा ने दो चरणों में आंतरिक सर्वे कराया गया है। जिसमें स्थानीय स्तर पर कुछ विधायकों और जय राम सरकार के काबीना मंत्रियों के खिलाफ जनता में असंतोष होने की बात कही गई है। इस रिपोर्ट के आने के बाद राष्ट्रीय अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा ने सीएम जय राम ठाकुर से बात की है व टिकट काटे जाने की सूरत में प्रभावित होने वाले इलाकों में नये चेहरे तलाशने को कहा गया है। इसी के चलते पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष सौदान सिंह , पार्टी के हिमाचल प्रभारी अविनाश राय खन्ना और सह प्रभारी प्रदेश के विभिन्न चुनाव क्षेत्रों का लगातार दौरा कर पार्टी की स्थिति का जायजा ले रहे हैं। पहाडी प्रदेश में 68 सीटें हैं और 2017 के विधानसभा चुनाव में यहां भाजपा को बड़ी जीत मिली थी। तब भाजपा को 44 सीटों पर जीत हासिल हुई थी । और उसके बाद 2019 के लोकसभा चुनाव में भी वह चारों सीटें जीतने में कामयाब रही थी। लेकिन, बीते साल नवंबर में हुए उपचुनाव में भाजपा तीन विधानसभा सीटों और मंडी लोकसभा सीट पर उपचुनाव में बुरी तरह हारी। उपचुनाव में हार की एक बड़ी वजह गुटबाज़ी को भी माना गया था। कुछ ऐसा ही माहौल अगले चुनावों के लिये तैयार होने लगा है।

पिछले दिनों घटे घटनाक्रम पर नजर दौड़ाएं तो सबसे पहले असंतोष उस समय उभरा , जब जयराम ठाकुर के प्रयासों से पार्टी में दो निर्दलीय विधायकों की एंट्री करवा दी। इसका सीधा नुकसान धूमल गुट को ही हुआ। देहरा में पूर्व मंत्री रविन्दर सिंह रवि भले ही पिछला चुनाव हारे हों, लेकिन वह प्रेम कुमार धूमल के करीबी रहे हैं। दूसरी और जोगेन्दर नगर में प्रकाश राणा की एंट्री से अनुराग ठाकुर के ससुर पूर्व मंत्री गुलाब सिंह ठाकुर की दावेदारी को चुनौती मिली है। पांच बार के विधायक, पूर्व कैबिनेट मंत्री और पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल के करीबियों में शुमार रविन्द्र सिंह रवि के ताजातरीन सियासी तेवरों ने कांगड़ा जिले में भाजपा के भीतर हलचल मचा दी है। अभी तक देहरा की सियासी कर्मभूमि को पोसते-सींचते आए रवि ने बदली परिस्थितियों में सियासी बिसात पर नया दांव चला दिया है। रवि ने हर हाल में चुनाव लड़ने की बात कहकर गेंद भाजपा आलाकमान के पाले में डाल दी है। चुनाव चिन्ह का निर्णय बाद में छोड़ने की बात कहकर पूर्व मंत्री ने इशारों ही इशारों में अपने इरादे भी जाहिर कर दिए हैं। पार्टी में नाराज नेता कहने लगे हैं कि उनकी पार्टी में कोई पूछ नहीं हो रही है। और सारे निर्णय एकतरफा हो रहे हैं। और सीएम जय राम ठाकुर आंतरिक सर्वे के नाम पर अपने विरोधियों को निशाना बनाने लगे हैं।

यह नाराजगी मात्र देहरा और जोगेन्दर नगर हल्कों में ही नहीं है। कई दूसरे चुनाव क्षेत्रों में सीएम के करीबी मौजूदा विधायकों के लिये भी महौल अनूकूल नहीं है। परागपुर में परिवहन मंत्री विक्रम ठाकुर व संजय पराशर के बीच कशमकश चल रही है। तो देहरा में पार्टी में शामिल हुये निर्दलीय विधायक होशियार सिंह के खिलाफ संगठन हो गया है। और पिछला चुनाव हारे रवि हर हाल में चुनाव लडने का एलान कर चुके हैं। वन मंत्री राकेश पठानिया के लिये रणवीर सिंह नुरपूर में मुसीबत बने हैं। धर्मशाला में विशाल नैहरिया का अपनी पत्नी से चल रहा विवाद पार्टी के संकट का कारण बना है और ज्वालामुखी में रमेश धवाला और संगठन मंत्री पवन राणा के बीच का विवाद जगजाहिर है। पालमपुर में इंदु गोस्वामी और त्रिलोक कपूर आपस में उलझे हैं। यही हाल दूसरे जिलो में है। इसमें धूमल खेमे की नाराजगी पार्टी के लिये चुनौती बनती जा रही है। इस महौल को बदलने के लिये पार्टी प्रभारी अविनाश राय खन्ना को नाकामी मिली तो पार्टी ने अपने राष्टरीय उपाध्यक्ष सौदान सिंह को हिमाचल भेज दिया है। अब देखना होगा कि मान मन्नौव्वल कहां तक कामयाब होती है।

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