हिमाचल चुनाव: विद्या स्टोक्स ने वीरभद्र के लिए छोड़ी ठियोग की सीट, जानिए वजह
शिमला। कोटखाई गैंगरेप मर्डर केस में सरकार के खिलाफ शिमला जिला में उठे तूफान का ही असर है कि एक ओर खुद मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह अपनी परंपरागत सीट शिमला ग्रामीण से पलायन करने को मजबूर हुये हैं तो आईपीएच मंत्री विद्या स्टोक्स को 89 साल की उम्र में भी राजनिति का मोह नहीं छूटने के बावजूद चुनावी मैदान से दूर रहने का फैसला लेना पड़ा है। वीरभद्र सिंह सरकार में आईपीएच मंत्री विद्या स्टोक्स ने चुनाव नहीं लड़ने का फैसला लिया है व अपनी ठियोग विधानसभा सीट मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के लिए छोड़ दी है। उनका मानना है कि उनके विधानसभा क्षेत्र में जो करोड़ों के जनकल्याण कार्य प्रगति पर हैं उन्हें वीरभद्र ही पूरा कर सकते हैं। एक समय वीरभद्र सिंह की धुर विरोधी रही विद्या स्टोक्स का इस बार ऐसा मन बदला कि अपनी सीट उन्हें तोहफे में ऐसे उम्मीदवार को देनी पड़ी, जो ठियोग का भी नहीं है।

कोटखाई गैंगरेप केस के बाद बदली राजनीति
दरअसल ठियोग में कोटखाई गैंगरेप मर्डर केस के बाद राजनैतिक हालात इस कदर पेचीदा हो रहे हैं कि लोगों में कांग्रेस के प्रति आक्रोश साफ देखा जा रहा है। इस मामले को निर्णायक मोड़ तक ले जाने में राकेश वर्मा का भी अहम योगदान रहा है। जिसके चलते राकेश वर्मा खासे लोकप्रिय हो गये। अपनी सीट मुख्यमंत्री को तोहफे में देकर हिमाचल सरकार की वरिष्ठ मंत्री विद्या स्टोक्स एक तीर से दो निशाने साधना चाह रही हैं। एक तरफ जहां स्टोक्स सीएम वीरभद्र सिंह को ठियोग से चुनाव लड़ने का न्योता देकर उन्हें खुश करना चाहती हैं, दूसरी तरफ वे अपने विरोधी पूर्व विधायक राकेश वर्मा की राजनीतिक तबाही की भी रणनीति बना रही हैं।
इस रणनीति में कोई भी चुनाव हारे, जीत केवल विद्या स्टोक्स की होगी। किस्सा दिलचस्प है। वर्ष 1993 में पहली बार राकेश वर्मा ने भाजपा का टिकट लेकर ठियोग में विद्या स्टोक्स को विधानसभा चुनाव में हराया था। तब वर्मा ने खुद को धरतीपुत्र करार दिया था क्योंकि स्टोक्स कोटगढ़ की मूल निवासी थीं ठियोग की नहीं। इसकी टीस स्टोक्स के जुबान पर अब तक है। वर्मा परिवार वीरभद्र का भी करीबी रहा है। भाजपा अगर वर्मा को टिकट देती है तो इस सीट पर मुकाबला कांटे का होगा। सूत्रों की मानें तो अब स्टोक्स इस नई रणनीति से इस परिवार से पुराना बदला भी चुकाना चाहती हैं। स्टोक्स 90 साल की उम्र पार करने वाली हैं ।पिछले कुछ दिनों तक स्टोक्स यही कहती रहीं कि वे ठियोग से विधानसभा चुनाव आगे भी लड़ने जा रही हैं, लेकिन उन्होंने नए तेवर दिखाए हैं।

वीरभद्र के लिए क्यों छोड़ी सीट?
तीन बार ठियोग से एमएलए बन चुके राकेश वर्मा चाहे भाजपा में रहे हों या फिर दो बार दो निर्दलीय विधायक ही रहे हों,उनके पारिवारिक संबंध वर्ष 2012 तक वीरभद्र के साथ अच्छे ही रहे हैं। पिछले चुनाव में धूमल समेत अन्य भाजपा नेताओं से मजबूत रिश्ते बनाकर उन्होंने दोबारा भाजपा का टिकट लेकर फिर ठियोग से स्टोक्स के खिलाफ चुनाव लड़ा। करीब दो दशक की तनातनी के बाद स्टोक्स का वीरभद्र से संबंधों में सुधार हुआ। इसका नतीजा ये निकला कि वीरभद्र के सहयोग से स्टोक्स ठियोग में वर्मा को हराने में कामयाब हुईं। अब स्टोक्स ने दोबारा राकेश वर्मा के राजनीतिक खात्मे के लिए नया दांव खेला है।
हलांकि, पहले स्टोक्स इस बात को स्वीकार करती रहीं कि उन्होंने सीएम को ठियोग से चुनाव लडऩे को कहा है। लेकिन कांग्रेस का दूसरा खेमा भी सक्रिय हो गया। उन्होंने स्टोक्स पर दबाव बनाया है कि वे सीट छोडऩे का खुलेआम प्रचार न करें। इसके बाद स्टोक्स बोलीं कि अभी उन्होंने ठियोग सीट पर कोई आखिरी फैसला नहीं लिया है। उधर सीएम वीरभद्र सिंह भी शतरंज के मोहरे बिछा रहे हैं। उन्होंने अपने पत्ते नहीं खोले हैं। वे खुद कह रहे हैं कि उनके पास ठियोग के अलावा अर्की विधानसभा क्षेत्र भी दूसरा विकल्प हो सकता है। इसलिए उन्होंने इस ऑफर पर अपना रुख अभी साफ नहीं किया है।

वीरभद्र क्या राहुल के खिलाफ भी लड़ूंगा चुनाव: राकेश वर्मा
ठियोग के पूर्व विधायक राकेश वर्मा ने कहा वीरभद्र ही क्यों, अगर भाजपा राहुल गांधी से भी चुनाव लडऩे का आदेश देगी, तो मैं चुनाव लडू़ंगा। पार्टी का चुनाव लडऩे का या अन्य तरह से सेवा करने का जो भी आदेश होगा, वह मंजूर है। भारतीय जनता पार्टी 75 साल में रिटायर कर देती है, मगर कांग्रेस पार्टी उम्मीदवारों की शुरुआत ही 84 साल की उम्र में करती है। इससे बड़ा मजाक और क्या होगा। कांग्रेस डूबती नाव है, जो इतिहास की तरफ जा रही है। सीएम तो शिमला में तारकोल बिछाने के भी शिलान्यास कर रहे हैं।












Click it and Unblock the Notifications