हिमाचल चुनाव: आपराधिक छवि के उम्मीदवारों की संख्या बढ़ी

भारत में चुनाव

हिमाचल प्रदेश विधान सभा की सभी 68 सीटों पर चुनाव 12 नवंबर को होंगे और मतगणना आठ दिसंबर को होगी. 55 लाख मतदाताओं वाले इस प्रदेश में 2017 में हुए पिछले चुनावों में बीजेपी ने 44 सीटें जीतीं थी जबकि कांग्रेस ने सिर्फ 21. इस बार इन दोनों पार्टियों के अलावा आम आदमी पार्टी भी चुनाव जीतने की उम्मीद लगाए बैठी है.

सभी पार्टियों ने कुल मिला कर इस बार 412 उम्मीदवार उतारे हैं, जिनमें से अधिकांश राष्ट्रीय पार्टियों से हैं और कुछ क्षेत्रीय पार्टियों से. चुनाव में 99 निर्दलीय सदस्य भी अपनी किस्मत आजमा रहे हैं. चुनावी सुधारों के लिए काम करने वाली संस्था एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) ने सभी प्रत्याशियों के चुनावी हलफनामों का अध्ययन किया है.

हत्या जैसे गंभीर आपराधिक मामले

एडीआर के मुताबिक पिछले चुनावों के मुकाबले इस बार ऐसे उम्मीदवारों की संख्या बढ़ गई है जिनके खिलाफ आपराधिक मामले और गंभीर आपराधिक मामले दर्ज हैं. जहां 2017 में ऐसे उम्मीदवारों की संख्या 61 (18 प्रतिशत) थी, इस बार इनकी संख्या 94 (23 प्रतिशत है).

इनमें से 50 (12 प्रतिशत) उम्मीदवार तो ऐसे हैं जिनके खिलाफ हत्या जैसे गंभीर आपराधिक मामले दर्ज हैं. 2017 में ऐसे उम्मीदवारों की संख्या 31 (नौ प्रतिशत) थी. आपराधिक पृष्ठभूमि के ये उम्मीदवार लगभग सभी पार्टियों में हैं.

एडीआर ने बीजेपी के 68 उम्मीदवारों के हलफनामों को देखा और पाया कि उनमें से 12 (18 प्रतिशत) उम्मीदवारों के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज हैं. कांग्रेस के 68 उम्मीदवारों में से ऐसे 36 (53 प्रतिशत) उम्मीदवार हैं. 'आप' के 67 उम्मीदवारों में ऐसे उम्मीदवारों की संख्या 12 (18 प्रतिशत) है.

गंभीर आपराधिक मामलों का सामना कर रहे उम्मीदवार भी काफी बड़ी संख्या में हैं. कांग्रेस के पास ऐसे 17 (25 प्रतिशत) उम्मीदवार हैं, बीजेपी के पास छह (नौ प्रतिशत), 'आप' के पास भी छह (नौ प्रतिशत) और सीपीएम के पास पांच (कुल 11 का 46 प्रतिशत) हैं.

मनमानी करती हैं पार्टियां

कुल 412 उम्मीदवारों में कम से कम दो उम्मीदवार ऐसे हैं जिनके खिलाफ हत्या के मामले दर्ज हैं और तीन ऐसे हैं जिनके खिलाफ हत्या की कोशिश के मामले दर्ज हैं. कम से कम पांच उम्मीदवार ऐसे हैं जिनके खिलाफ महिलाओं के खिलाफ अपराध के मामले दर्ज हैं.

68 निर्वाचन क्षेत्रों में से नौ (13 प्रतिशत) क्षेत्र ऐसे हैं, जहां तीन या तीन से ज्यादा उम्मीदवार ऐसे हैं जिनके खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज हैं. एडीआर ऐसे क्षेत्रों को रेड अलर्ट निर्वाचन क्षेत्र कहती है.

फरवरी 2020 में सुप्रीम कोर्टने राजनीतिक दलों को कहा था कि उन्हें आपराधिक मामलों का सामना कर रहे लोगों को अपना उम्मीदवार देने का कारण बताना होगा. उन्हें यह भी बताना होगा कि ऐसे लोगों को क्यों नहीं उम्मीदवार बनाया जा सका जिनके खिलाफ कोई आपराधिक मामले दर्ज नहीं हैं.

एडीआर के मुताबिक 2021-22 में कम से कम 10 राज्यों में हुए चुनावों में देखा गया कि पार्टियों ने इन दिशानिर्देशों का पालन नहीं किया और चयन के ठोस कारण नहीं दिए.

Source: DW

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