Haryana Result: कैसे क्षेत्रीय दलों के लिए बज गई खतरे की घंटी? कांग्रेस के सहयोगियों में बढ़ी बेचैनी

Haryana Election Result 2024: हरियाणा में मतदाताओं ने जो जनादेश दिया है, उससे प्रदेश के क्षेत्रीय दलों का एक तरह से काम तमाम हो गया है। न तो चौटाला परिवार (INLD,AAP) की दाल गली और न ही आजाद समाज पार्टी (ASP) जैसी नई पार्टियों को ही उभरने का मौका मिला। यहां तक कि राष्ट्रीय बन चुकी आम आदमी पार्टी (AAP) को भी उनकी जगह बताने का काम किया है।

हरियाणा की राजनीति में चार दशकों से ज्यादा समय तक पूर्व पीएम चौधरी देवीलाल के परिवार का दबदबा रहा। 2018 में उनके परिवार की पार्टी पहले इंडियन नेशनल लोक दल (INLD) और जनननायक जनता पार्टी (JJP) में बंट गई, अब वोटरों ने उन्हें एक तरह से राजनीतिक हाशिए पर धकेल दिया है।

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चौटाला परिवार की दोनों पार्टियों की करारी हार
चौटाला परिवार के दोनों दलों में एक ने बीएसपी और दूसरे ने आजाद समाज पार्टी के साथ गठबंधन किया था। उन्हें उम्मीद थी कि वह दलित वोट जुटाने में मदद करेंगे।

आईएनएलडी दो सीटें जीतने में तो सफल हुई, लेकिन गठबंधन के सीएम उम्मीदवार अभय चौटाला भी अपने गढ़ में अपनी हार नहीं बचा सके। अलबत्ता उनकी पार्टी को 55 सीटों पर लड़ने के बाद 4.14% वोट जरूर मिले हैं, जो कि पिछली बार से करीब 2% अधिक है

आईएनएलडी को बीएसपी से गठबंधन के बाद इतने वोट भी तब मिले हैं, जब पिछले साल अभय चौटाला ने सभी 90 विधानसभा सीटों को कवर करने वाली 215 दिनों की पदयात्रा निकाली थी।

वहीं जेजेपी के वोट तो 14.8% से घटकर एक फीसदी से भी कम रह गए हैं और पूर्व डिप्टी सीएम दुष्यंत चौटाला अपने परिवार के गढ़ उचान कलां में भी अपनी जमानत नहीं बचा सके और पांचवे स्थान पर खिसक गए।

दलित वोट की दावेदार पार्टियों की भी हुआ बुरा हाल
इन दोनों ही दलों की सहयोगियों क्रमश: बीएसपी और आजाद समाज पार्टी का भी खाता नहीं खुला। बीएसपी को 35 सीटों पर लड़ने के बाद 1.82% वोट मिले और चंद्रशेखर आजाद की पार्टी 12 सीटों पर लड़कर भी चुनाव आयोग के वोट शेयर के आंकड़ों में अन्यों की लिस्ट में शामिल होकर गुमनाम हो गई।

कई अन्य छोटे दलों का भी काम तमाम
हरियाणा ने इस बार सिर्फ दोनों वंशवादी पार्टियों और बीएसपी, एएसपी को ही धूल नहीं चटाया है। हरियाणा लोकहित पार्टी के गोपाल कांडा और हरियाणा जन सेवक पार्टी के बलराज कुंडू को भी सियासी तौर पर निपटाने का काम कर दिया है।

केजरीवाल को हरियाणा ने भी दिया झटका
आम आदमी पार्टी सुप्रीमो अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली शराब घोटाले के आरोपों में जेल जाने के बावजूद फंसाए जाने का खूब रोना रोया, खुद को हरियाणा का लाल बताने की भी कोशिश की, लेकिन पार्टी फिर भी 1.79% वोटों पर ही सिमट गई। जबकि, हरियाणा की सीमाएं उनकी आम आदमी पार्टी शासित दिल्ली और पंजाब से ही लगी हुई हैं।

हरियाणा में 80% वोट और 85 सीटें बीजेपी-कांग्रेस को मिली
हरियाणा के वोटरों ने 90 सीटों में से 85 सीटें बीजेपी और कांग्रेस को देकर, स्पष्ट तौर पर छोटे और क्षेत्रीय दलों के लिए रेड सिंग्नल ऑन कर दिया है। प्रदेश के 80% वोट इन्हीं दलों को गए हैं। इस तरह से राज्य की राजनीति अब सीधे तौर पर कांग्रेस और बीजेपी वाली विचारधाराओं में विभाजित हो चुकी है।

हरियाणा में क्षेत्रीय दलों के साथ होने से कांग्रेस के सहयोगियों में बेचैनी
हरियाणा में कांग्रेस सत्ता से जरूर बहुत पीछे छूट गई है, लेकिन क्षेत्रीय दलों की कीमतों पर उसके जो वोट बढ़े हैं और सीटों में भी बढ़ोतरी हुई, उससे महाराष्ट्र, झारखंड समेत अन्य राज्यों में भी उसके सहयोगी दलों का माथा ठनकने लगा है।

महाराष्ट्र में लोकसभा चुनावों में कांग्रेस का प्रदर्शन सबसे बेहतर रहा था। लेकिन, अब शिवसेना (यूबीटी) ने हरियाणा में उसकी हार के बाद उसे सीधे तौर पर निशाने पर लेना शुरू कर दिया है। इसकी वजह से दोनों दलों के नेताओं के बीच तू-तू-मैं-मैं वाली स्थिति पैदा होने लगी है।

इनका लक्ष्य एक है कि कांग्रेस बड़ा भाई बनना छोड़ दे। शायद इस वजह से कि वह अकेले बीजेपी से मुख्य मुकाबला करती न दिखे। उद्धव ठाकरे की पार्टी के सांसद संजय राउत ने कहा भी है, 'बिना क्षेत्रीय पार्टी की मदद से कोई भी पार्टी राज नहीं कर सकती। बीजेपी हो या फिर चाहे कांग्रेस।....'

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